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क्यों कुछ Impossible नहीं होता, ये example यही बताता है

गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड का हर नया संस्करण असंभव माने जाने वाले चमत्कारों से भरा होता है, जो हमें याद दिलाता है कि इस दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • पीके खुराना, हैपीनेस गुरु 

स्वीडिश मूल के धावक गुंडर हैग एक प्रतिभाशाली धावक थे, जिन्होंने धावक के रूप में एक दर्जन से भी ज्यादा नए रिकार्ड बनाए. सन् 1945 में उन्होंने 4 मिनट और डेढ़ सेकंड से कुछ कम समय (4:1.4 मिनट) में एक मील की दूरी तय की. उनके बनाए रिकॉर्ड की धूम इस कदर थी कि उस वक्त के ट्रेनर, साइकोलॉजिस्ट और डॉक्टर ये कहते थे कि इससे कम समय में एक मील की दूरी तय करना मानव शरीर की क्षमता के बाहर होने के कारण “असंभव” है. अगले 9 साल तक यह रिकॉर्ड बरकरार रहा, लेकिन सन् 1954 में एक क्रांति हुई. इंग्लैंड के हैरो में जन्मे सर रोजर गिलबर्ट बैनिस्टर ने 3 मिनट और साढ़े उनसठ सेकंड से भी कुछ कम समय (3:59.4 मिनट) में यह दूरी पूरी कर दिखाई. सर बैनिस्टर की इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद एक और चमत्कार हुआ. उनका रिकॉर्ड सिर्फ 46 दिनों में ही टूट गया तथा एक अन्य धावक ने उनसे भी कम समय में यह दूरी तय कर ली, और फिर कुछ ही समय में 26 अलग-अलग धावकों ने 66 बार चार मिनट से कम समय में एक मील की दूरी तय करके दिखाई.

यह चमत्कार क्यों हुआ, कैसे हुआ?
गुंडर हैग ने जब लगभग चार मिनट में एक मील की दूरी तय की तो एथलीट, उनके कोच और मनोवैज्ञानिकों ने यह मान लिया कि यह उपलब्धि मानवीय शारीरिक क्षमता की सीमा है और इससे कम समय में इस दूरी को तय नहीं किया जा सकता. “असंभव” के इस अवरोध के कारण धावकों में एक प्रकार की “मानसिक विकलांगता” ने घर कर लिया और धावकों ने इस रिकॉर्ड को तोड़ने का प्रयास ही बंद कर दिया. सर रोजर गिलबर्ट बैनिस्टर एक जूनियर डॉक्टर होने के साथ-साथ धावक भी थे और उन्हें गुंडर हैग के तत्कालीन विश्व रिकॉर्ड और इससे जुड़े मिथक की जानकारी थी. डॉक्टर के रूप में वे नर्वस सिस्टम की प्रतिक्रियाओं पर शोध कर रहे थे और उनका दृढ़ विश्वास था कि चार मिनट की सीमा मात्र एक मानसिक अवरोध है और इसे तोड़ा जा सकता है. वे इस झांसे में नहीं आये कि यह मानवीय शारीरिक क्षमता की सीमा है और इसलिए उन्होंने इस रिकॉर्ड को तोड़ने के लिए अपने आप को मानसिक रूप से तैयार किया और रिकॉर्ड तोड़ दिखाया. “असंभव” के अवरोध का मिथक जैसे ही टूटा, कई लोग आसानी से चार मिनट से कम समय में यह दौड़ पूरी करने लगे. जिस उपलब्धि को पहले असंभव मान लिया गया था, वह अब पहुंच के भीतर थी. सफलता उनकी पहुंच में है, इस बात के प्रत्यक्ष उदाहरण ने शेष सभी धावकों को भी बेहतर रिकॉर्ड बनाने के लिए प्रेरित किया.

कमजोरियों को छिपाने वाला शब्द
“असंभव” एक ऐसा शब्द है जो हमने अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए गढ़ लिया है. दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है. आदमी जहाज खा जाता है, आदमी ऐसा करंट बर्दाश्त कर लेता है जिसके संपर्क में आने मात्र से हमारे हृदय की धड़कन बंद हो सकती है, आदमी अपने शरीर के मुलायम अंगों की सहायता से लोहे को मोड़ सकता है, आदमी असहनीय माने जाने वाले दर्द को सह सकता है. गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड का हर नया संस्करण असंभव माने जाने वाले चमत्कारों से भरा होता है जो हमें याद दिलाता है कि इस दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है.

परिवर्तन दिमाग से शुरू होते हैं
हमें यह समझना चाहिए कि परिवर्तन दिमाग से शुरू होते हैं, या यूं कहें कि दिमाग में शुरू होते हैं. यह ध्यान देने की बात है कि सोच को बदलना एक प्रणालीगत (सिस्टेमैटिक) कार्य है, जो कई चरणों में पूरा होगा. यह असंभव नहीं है. युगबोध का यह एक बड़ा परिवर्तन है. उल्लेखनीय है कि परिवर्तन की मानसिक यात्रा हमें सफलता की ओर ले चलती है. यदि हमें जीवन की बाधाओं से पार पाना है और सफल होना है तो हमें इस मानसिक यात्रा में भागीदार होना पड़ेगा जहां हम नये विचारों को आत्मसात कर सकें और किसी भी अवरोध को अवरोध मानने की मानसिक विकलांगता से बच सकें. इसी से हम सफल होंगे, समाज सफल होगा, देश सफल होगा.       


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