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नेताजी का असली परिचय: याद तो बहुत आएंगे...जब भी दोस्ती की बात होगी

जिससे नेताजी दो-तीन बार मिल लिए और अगर कभी वो कहीं फंस गया तो उसकी सहायता पक्की.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 years ago

अकु श्रीवास्तव
(संपादक, नवोदय टाइम्स)

नेताजी का जाना दोस्ती शब्द को नए आयाम देने वाले नेता के रूप में हमेशा ज्यादा और बड़ा रहेगा. न जाने कितने सुदामा मित्रों को मुलायम सिंह ने पहचान दी, रुतबा दिया, पद दिया और वक्त जरूरत पर लक्ष्मी जी की कृपा भी कराई. आप मुलायम सिंह यादव को एक जमीनी नेता कह सकते हैं. आप उन्हें कुछ क्रांतिकारी कदमों के लिए याद कर सकते हैं.

गरीबों की जरूर करते थे मदद
आप उन्हें लोकतंत्र का नायक भी कह सकते हैं. आप उन्हें यदुवंशियों की अस्मिता को उच्चतम स्तर पर ले जाने वाला कह सकते हैं, लेकिन सच तो यह है कि उन्हें आज से पचास साल बाद भी जब तक उन्हें जानने वाला एक समर्थक, सैफई ऐसे कई गांवों से जुड़ाव रखने वाला रामलाल, रामपाल या राजाराम जिंदा रहेगा तब तक वो बताता रहेगा कि नेताजी ने उनके साथ जो भला किया, घर की कम से कम एकाध पीढ़ी तो नहीं कर पाएगी. यानी जिससे नेताजी दो-तीन बार मिल लिए और अगर कभी वो कहीं फंस गया तो उसकी सहायता पक्की. गरीब हो तो और पक्की. थोड़ा बहुत दोस्त हो तो हर बार पुराने परिचय को याद दिलाने की जरूरत नहीं पड़ती. यही वजह थी कि समाज के किसी भी क्षेत्र में उनके दोस्त मिल जाएंगे. राजनीति के कट्टर दुश्मन भी उनके दोस्त हो सकते हैं और रहे. जिन पत्रकारों ने थोड़ा बहुत भी फील्ड में काम किया, वो अपने को उनका मित्र होने का दावा कर सकते थे और जरूरत पड़ी तो उन्होंने उसको निभाया भी.

हाथ को दबा कर पूछ लेते- सब ठीक?
साल, दो साल, पांच साल आप न भी मिलें तो भी जब मिलते, शायद सबके हाथ को दबा कर पूछ लेते- सब ठीक? और अगर आपने कुछ कह दिया तो जाते वक्त उनकी आंखें आपको ढूंढ़ रही होती थीं और कई बार ऐसा भी हुआ कि उनकी कार में उनके/उनकी प्रमुख सचिव, जो उनके साथ कार में बैठने के लिए साथ-साथ रहते थे/थीं, उनको वो कार से हटा देते और कहते आप दूसरी कार में आओ और यह हमारे साथ जाएंगे. वापसी के दौरान कार में घर पहुंचने के पहले "मित्र" की बात सुनते और कार से उतरते ही अपने उसे दिन के ड्यूटी अफसर को पर्याप्त निर्देश दे देते और साफ कहते जब काम हो जाए तो उन्हें बताया जाए. घर में जीवन, मरण या खुशी के मौके पर उनका फोन आना सामान्य बात रहती रही है. कोई और जरूरत हो तो बताना, उनका दूसरा वाक्य होता.

राजनीति में अपने दल में उन्होंने दूसरी पंक्ति खड़ी की और उसे पर्याप्त सम्मान दिया. जनेश्वर मिश्र, मोहन सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा आदि इसके बड़े उदाहरण रहे और उन्होंने दल के लिए तीसरी पंक्ति की लंबी चौड़ी फौज तैयार की.

निंदक उनको अपने तरीके से याद कर सकते हैं. राजनैतिक विरोधियों में एक भी ऐसा मिलना मुश्किल है, जिसकी जरूरत पर उन्होंने मदद न की हो. 

याद तो आएंगे नेताजी..जब भी दोस्ती की बात होगी. 

(रेखांकन- साभार मनोज सिंहा)
 


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