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अमेरिकी टैरिफ का भारतीय टेक्सटाइल और परिधान उद्योग पर असर और रणनीतियां

हाल ही में अमेरिका ने इन भारतीय सामानों पर जो टैक्स (टैरिफ) लगाया है, वह एक तरह से दोधारी तलवार की तरह है. इससे भारत को कुछ फायदा मिल सकता है, लेकिन साथ ही इसमें कई चुनौतियां भी छुपी हुई हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

अमेरिका भारतीय टेक्सटाइल और परिधान (कपड़ा) उद्योग के लिए एक बहुत ही अहम निर्यात बाजार है, जहां हर साल करीब 10 अरब डॉलर का माल भेजा जाता है. लेकिन हाल ही में अमेरिका ने इन भारतीय सामानों पर जो टैक्स (टैरिफ) लगाया है, वह एक तरह से दोधारी तलवार की तरह है. इससे भारत को कुछ फायदा मिल सकता है, लेकिन साथ ही इसमें कई चुनौतियां भी छुपी हुई हैं. इससे कई चिंताएं उठ रही हैं — जैसे कि इन कपड़ों के दाम बढ़ने की वजह से अमेरिका में इनकी मांग घट सकती है, अमेरिकी खरीदार अब सस्ते दाम की मांग करेंगे जिससे भारतीय कंपनियों का मुनाफा कम हो सकता है, और भारत की निर्यात क्षमता अभी इतनी तेज़ नहीं है कि वह अचानक ज़्यादा माल भेज सके.

इसके अलावा, ये जो टैक्स बढ़ाए गए हैं, अगर लोगों को लगने लगे कि ये सिर्फ थोड़े समय के लिए हैं, तो कंपनियां उत्पादन बढ़ाने के लिए ज़रूरी निवेश करने से बच सकती हैं. शुरुआत में कुछ लोगों को उम्मीद थी कि भारत की स्थिति बेहतर है क्योंकि भारत पर 26% टैक्स लगा है, जबकि उसके मुकाबले बांग्लादेश पर 37%, वियतनाम पर 46% और कंबोडिया पर 49% टैक्स लगाया गया है. लेकिन ये उम्मीदें जल्दी साबित हो सकती हैं, क्योंकि इसके पीछे कुछ गहरी और अहम वजहें छुपी हैं:

1. भारत को दिखने वाला फायदा बनाम असली लागत का फर्क:

हालांकि बांग्लादेश के मुकाबले भारत में आयात शुल्क 11% कम है, फिर भी भारतीय उत्पाद महंगे हो सकते हैं क्योंकि भारत में उत्पादन की मूल लागत लगभग 10-12% ज़्यादा है। नीचे दिए गए उदाहरण से समझिए कि कैसे भारत की उच्च उत्पादन लागत, कम टैक्स के फायदे को खत्म कर सकती है. जिन प्रोडक्ट्स पर पहले 16.5% टैक्स लगता था, उनमें अगर भारत का FOB (मूल एक्सपोर्ट प्राइस) बांग्लादेश से सिर्फ 9% ज़्यादा भी हो, तो भारतीय सामान फिर भी महंगा ही पड़ेगा. ज्यादातर मामलों में, भारत का FOB प्राइस बांग्लादेश से सिर्फ 7.2% से 8.3% तक ज़्यादा हो सकता है ताकि दोनों देशों के प्रोडक्ट की अंतिम कीमत बराबर रह सके. अगर इससे ज़्यादा हुआ, तो भले ही भारत पर टैक्स कम हो, उसका सामान फिर भी महंगा पड़ेगा.

इसके अलावा, बांग्लादेश में उत्पादन क्षमता भारत से ज़्यादा है, और बड़ी कंपनियां सिर्फ मामूली लागत के फर्क के लिए अपनी सप्लाई चेन (आपूर्ति प्रणाली) बदलना नहीं चाहतीं. इसलिए भारत के लिए कई प्रोडक्ट कैटेगरी में बांग्लादेश से बड़ी हिस्सेदारी छीनना फिलहाल मुश्किल है. हालांकि भारत को कुछ अन्य देशों की तुलना में थोड़ा फायदा हो सकता है, लेकिन अगर भारत को इस मौके से बड़ा फायदा उठाना है, तो उसे खास प्रोडक्ट्स की विशेषज्ञता और उत्पादन क्षमता को बढ़ाना होगा.

2. मुनाफे पर दबाव:

लागत के फर्क के अलावा, अब भारतीय कंपनियों पर अमेरिका के खरीदारों का दबाव भी बढ़ेगा कि वे अपने प्रोडक्ट्स की कीमतें कम करें ताकि बढ़े हुए टैक्स का असर थोड़ा कम हो सके. रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी खरीदार पहले से किए गए ऑर्डरों पर भी 15-20% तक की छूट मांग रहे हैं. यह भारतीय कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि वे पहले से ही बहुत कम मुनाफे पर काम कर रही हैं. ऐसा भी हो सकता है कि टैक्स का बोझ तीन हिस्सों में बांटा जाए — थोड़ा हिस्सा भारतीय विक्रेता उठाए, थोड़ा अमेरिकी खरीदार और थोड़ा ग्राहक (कंज़्यूमर). लेकिन इस तरह के समझौते में भी भारतीय कंपनियों की प्रति यूनिट कमाई कम हो जाएगी. इसके अलावा, कुछ अन्य एशियाई देशों की फैक्ट्रियां शायद थोड़े समय के लिए टैक्स का कुछ हिस्सा खुद उठा लें, ताकि वे अपने अमेरिकी ग्राहकों के साथ बिज़नेस बनाए रख सकें.

3. इस मौके का पूरा फायदा उठाने में अंदरूनी चुनौतियाँ:

ऐसा लगता है कि भारत की इंडस्ट्री इस अच्छे मौके का पूरा फायदा नहीं उठा पाएगी, क्योंकि उसे पहले से ही कुछ बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है — जैसे कि कच्चे माल की कीमतें बहुत ज़्यादा हैं, ज़्यादातर कंपनियां कुछ ही तरह के प्रोडक्ट्स बना रही हैं (product basket बहुत सीमित है), और काम करने वाले मज़दूरों से जुड़ी समस्याएं भी हैं.

4. कम समय में मांग में उतार-चढ़ाव बनाम लंबे समय का असर:

अमेरिका द्वारा टैक्स बढ़ाने से अगले कुछ महीनों में कपड़ों की मांग कम हो सकती है, क्योंकि अमेरिकी ग्राहकों को कपड़े महंगे मिलेंगे. वहां पहले से ही महंगाई बढ़ी हुई है, और अब कपड़े और महंगे हो जाने से लोग कम खरीदारी कर सकते हैं. शुरुआत में अमेरिकी खरीदार नए ऑर्डर देना रोक सकते हैं, ताकि वे पहले समझ सकें कि टैक्स बढ़ने से ग्राहकों की मांग पर क्या असर होगा. साथ ही वे पहले भेजे गए माल (जो टैक्स लागू होने से पहले भेजा गया था) का स्टॉक खत्म करना चाहेंगे. इससे पूरी सप्लाई चेन में स्टॉक धीरे-धीरे खत्म हो सकता है. जब ये शुरुआती अनिश्चितता कम हो जाएगी और स्टॉक कम पड़ने लगेगा, तब फिर से मांग बढ़ सकती है.

यह भी ध्यान देने की बात है कि कुछ ब्रांड्स और रिटेलर्स ने पहले से ही अंदाज़ा लगाकर ज़्यादा स्टॉक जमा कर लिया होगा, जिससे शुरू में नए ऑर्डर आने में देरी हो सकती है क्योंकि वे पहले से मौजूद माल को बेचने में लगे होंगे. साथ ही, कई ब्रांड्स अभी तुरंत अपनी सप्लाई चेन की रणनीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं करना चाहेंगे. वे पहले देखना चाहेंगे कि ये टैक्स लंबे समय तक रहते हैं या नहीं, और इनका असली असर क्या होगा.

रणनीतिक उपाय: लागत पर नियंत्रण और बाजार में विविधता

इस चुनौतीपूर्ण माहौल में भारतीय टेक्सटाइल और परिधान उद्योग को अपनी प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए दो बातों पर खास ध्यान देना होगा — लागत को कम करना और नए निर्यात बाजारों की तलाश करना. बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच कंपनियों को हर उस रास्ते की तलाश करनी होगी जिससे वे अपने खर्च कम कर सकें.

Wazir Advisors कंपनियों को इस नए भू-राजनीतिक माहौल में आगे बढ़ने के लिए पूरी तरह से रणनीतिक और संचालन संबंधी मदद दे सकता है. हम कंपनियों को एक स्पष्ट दृष्टिकोण (विजन) बनाने और उसे ज़मीन पर लागू करने में मदद करते हैं. हमारी सेवाओं में शामिल हैं- कच्चे माल की बर्बादी को कम करना, कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए विशेष ट्रेनिंग, lean manufacturing (कम खर्च में ज़्यादा उत्पादन) लागू करना, क्वालिटी कंट्रोल मज़बूत करना, फालतू खर्चों को घटाना, सही ऑटोमेशन और डिजिटल टूल्स को अपनाना और पूरी सप्लाई चेन को बेहतर बनाना.
 


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