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सरकार की गलत नीतियां, आर्थिक संकट और भयभीत बाजार

हम भले ही दुनिया की छह बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक हों, मगर जब नागरिकों की स्थिति बदहाली की होगी, तो यह भविष्य के लिए कभी अच्छे संकेत नहीं हो सकते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

अजय शुक्ला
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

केंद्रीय खाद्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि बढ़ती महंगाई और लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए कुछ विशिष्ट खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में रियायत अवधि मार्च 2023 तक बढ़ा दी गई है. सीबीआईसी (केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड) ने खाद्य तेलों की घरेलू जरूरतों को पूरा करने और बढ़ती खुदरा कीमतों पर काबू रखने के लिए 31 अगस्त, 2022 को यह निर्णय लिया था. वहीं, आरएसएस के संगठन स्वदेशी जागरण मंच के एक कार्यक्रम में संघ के सहसरसंघ चालक दत्तात्रेय होसबाले ने माना कि देश में बढ़ती ग़रीबी, बेरोज़गारी और आर्थिक विषमता संकट का माहौल बना रही है. उन्होंने कहा कि ऐसा माहौल तैयार करना चाहिए, जिससे उद्यमशीलता को बढ़ावा मिले ताकि नौकरी के जरूरतमंदों को सुयोग्य नौकरी दी जा सके. उन्होंने कहा, ''देश में ग़रीबी दानव की तरह खड़ी है. यह महत्वपूर्ण है कि हम इस दानव को ख़त्म करें. अब भी 20 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा से नीचे हैं. यह आंकड़ा दुखी करने वाला है. 23 करोड़ लोग हर दिन 375 रुपए से भी कम कमा रहे हैं. चार करोड़ लोगों के पास कोई काम नहीं है. श्रम शक्ति सर्वे का कहना है कि बेरोज़गारी दर 7.6 फ़ीसदी है."

कोर सेक्टर में उत्पादन गिरा
होसबाले का कथन और देश की सरकार की महंगाई रोक पाने में असफलता के बीच देश में बढ़ती आर्थिक विषमता हमें संकट का आभास कराती है. हम भले ही दुनिया की छह बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक हों, मगर जब नागरिकों की स्थिति बदहाली की होगी, तो यह भविष्य के लिए कभी अच्छे संकेत नहीं हो सकते हैं. आंकड़े बताते हैं कि देश के शीर्ष एक फीसदी अमीरों के पास राष्ट्र की 54 फीसदी आय है, दूसरी तरफ़ देश की 40 फीसदी आबादी के पास महज़ 13 फीसदी. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के बड़े हिस्से में लोगों को साफ पानी और पोषण युक्त भोजन भी नहीं मिल रहा है. आपसी कलह और ख़राब शिक्षा व्यवस्था के कारण भी ग़रीबी बढ़ रही है. सरकार की अक्षमता भी ग़रीबी बढ़ने का एक बड़ा कारक है. किसी भी कारोबार और उद्यमशीलता के लिए अमन-चैन और माहौल की जरूरत होती है, मगर वह उद्योगों के लिहाज से काफी खराब हो गया है. यही वजह है कि कोर सेक्टर में उत्पादन लगातार गिरता जा रहा है. वाणिज्य मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल अगस्त में देश के आठ मुख्य उत्पादन क्षेत्रों में गिरावट देखने को मिली. इसकी गति 3.3 फीसदी की दर पर पहुंच गई, जो जुलाई में 4.5 फीसदी पर थी. अब त्योहारी सीजन शुरू हो चुका है. भारी खरीद की उम्मीद में उत्पादन भी बढ़ा है मगर उसके सापेक्ष न रोजगार बढ़े और न ही कारोबार. वजह साफ है कि कोर सेक्टर में भी यह बढ़त स्थायी नजर नहीं आ रही. यही कारण है कि वो आंशिक श्रम से बूते ही काम करना चाहते हैं. 

व्यापार में अविश्वास
पिछले साल यानी अगस्त 2021 में यह ग्रोथ 12.2 फीसदी की दर से हो रही थी, वहीं नवंबर 2021 में यह सिर्फ 3.2 फीसदी रह गई थी, जबकि त्योहारी सीजन था. व्यापार में अविश्वास ने घर कर लिया है, जिससे लोग कम से कम खर्च में अधिक से अधिक की सोच पर काम कर रहे हैं, जो बाजार और रोजगार दोनों के लिए संकट के संकेत हैं. इस बीच, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 50 बेसिस पॉइंट में रेपो रेट बढ़ा दिया है. पांच माह में चौथी बार रेपो रेट में इज़ाफा किया गया है. वजह बताई गई कि महंगाई पर काबू पाने के लिए, मगर महंगाई काबू में नहीं आ रही. अब रेपो रेट 5.9 फीसदी हो गई है. आरबीआई के गवर्नर ने रेपो रेट बढ़ाते वक्त दो चिंताएं भी जाहिर कर दीं, पहली, वित्त बाजार घबराया हुआ है. भयंकर उतार-चढ़ाव से निवेशक डरे हुए हैं. दूसरी चिंता, वैश्विक अर्थव्यवस्था नए तूफान की तरफ़ बढ़ रही है, जो भविष्य में बड़े संकट पैदा कर सकती है. हमारी अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.2 फीसदी के अनुमान से घटकर 7 फीसदी पर आ गई है. बैंकों की सरप्लस नकदी 1.5 लाख करोड़ से भी कम हो चुकी है.

बड़े संकट की आहट
महंगाई बढ़ना और रुपये की गिरावट न रोक पाना, इसे बड़े संकट के रूप में अर्थशास्त्री देख रहे हैं. रेपो रेट बढ़ाने के बाद भी महंगाई 6% के ऊपर ही रहेगी. आरबीआई ने खुद मान लिया कि सभी उपायों के बाद भी महंगाई 2024 की पहली तिमाही (आम चुनाव) से पहले 5 फीसदी से नीचे नहीं आने वाली है. केंद्र सरकार ने प्राकृतिक गैस के दामों में 40 फीसदी का इज़ाफ़ा किया है. 2019 के चुनाव के बाद से ये तीसरा इज़ाफ़ा है. इसका असर भी महंगाई और बेरोजगारी पर गहरा पड़ने वाला है. सीधा असर किसान और आमजन की जरूरतों पर पड़ेगा. प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल ट्रांसपोर्ट सेक्टर, खाने-पीने की चीज़ों पर होगा. इसके कारण खाद महंगी होगी और किसानों की कमर टूटेगी. कृषि क्षेत्र ने ही हमारी अर्थव्यवस्था को कोविड महामारी के दौर में बचाया था. इसका प्रभाव पाइप लाइन गैस पर भी पड़ेगा और वो भी महंगी होगी. चूंकि इनका उपयोग उद्योगों में भी होता है, तो आप समझ सकते हैं कि उत्पादन महंगा होने से हर वस्तु की कीमत बढ़ेगी. गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई से जूझ रहा आवाम ऐसी स्थिति में अराजकता और अपराध में लिप्त हो सकता है, जिससे कारोबारी माहौल और भी खराब होगा. 

ऑटो सेक्टर पर भी असर
आप वाहनों की बिक्री के आंकड़े देख लीजिए, भारत दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा वाहन बाजार है मगर पिछले कुछ सालों से भारत में दुपहिया वाहनों की बिक्री 10 साल के निचले स्तर पर है, तो तिपहिया वाहनों की बिक्री 19 साल में सबसे कम है. सियाम के मुताबिक, बीते वित्त वर्ष में विभिन्न श्रेणियों में वाहनों की कुल बिक्री घटकर 1,75,13,596 इकाई रह गई, जो 2020-21 में 1,86,20,233 इकाई पर थी. वाहनों की थोक बिक्री की रफ्तार बीते वित्त वर्ष 2021-22 में सुस्त रही थी. बीते वित्त वर्ष में वाहनों की कुल थोक बिक्री छह फीसदी गिरी है. मौजूदा दौर में अमीर और अमीर, गरीब और भी गरीब हो गया. दुपहिया-तिपहिया वाहनों की ख़रीद और एंट्री लेवल की कारों की बिक्री बहुत घटी है. वहीं, 10 लाख रुपये से ऊपर या प्रीमियम सेगमेंट की कारें, पिछले वित्त वर्ष में इससे कम कीमत की कारों के मुकाबले पांच गुना ज्यादा तेजी से बिकी हैं.

सरकार की गलत नीतियां
आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार टूट रहा है. हालात ये हैं कि जितने भी उपाय किए गए, वो कारगर साबित नहीं हुए. क्योंकि वित्त बाजार की समस्यों की जड़ सरकार की नीतियों से जुड़ी है. भारत का विदेशी मुद्रा भंडार पिछले एक महीने में बहुत तेज़ी से घटा है, 2 सितंबर 2022 को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 553.105 बिलियन डॉलर था, जो 23 सितंबर को समाप्त हुए कारोबारी सप्ताह में घटकर सिर्फ 537.518 अरब डॉलर रह गया है. तीन हफ्ते में ही 16 अरब डॉलर की कमी विदेशी मुद्रा भंडार में आई है. पहले कभी इतनी तेज़ी से देश का विदेशी मुद्रा भंडार नही घटा था. एक साल पहले 3 सितम्बर 2021 को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 642.45 बिलियन डॉलर था. एआईबीईए के महासचिव सीएच वेंकटचलम ने कहा है कि सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के कारण देश का विदेशी मुद्रा भंडार कम होता जा रहा है. हमारा आयात लगातार बढ़ रहा है, जबकि निर्यात घटता जा रहा है. देश का व्यापार घाटा लगातार बढ़ना भी चिंताजनक है. अगस्त में देश का आयात 37.28% बढ़कर 61.9 अरब डॉलर रहा, वहीं निर्यात मामूली रूप से 1.62 फीसदी बढ़कर 33.92 अरब डॉलर रहा. पिछले साल अगस्त में यह 11.71 अरब डॉलर था, जो चालू वित्त वर्ष के अगस्त में 27.98 अरब डॉलर हो गया. अगर हम विदेशी मुद्रा भंडार और कारोबारी माहौल को नहीं सुधार सके तो समस्याओं का समाधान नहीं होगा. अर्थशास्त्री रघुराम राजन पहले ही कह चुके हैं कि अगर बेरोजगारी को काबू नहीं किया तो समस्या विकराल हो जाएगी.


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