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केतन पारेख स्कैम 2.0: 18 महीने तक कुंभकर्ण की तरह क्यों सोई रही SEBI, क्या रही वजह?

शेयर बाजार ऑपरेटर केतन पारेख की कहानी में, SEBI 18 महीने तक सोई रही. इस दौरान केतन पारेख और उसका नेटवर्क छिपकर अपनी गड़बड़ियों को छुपाने और अपने निशान मिटाने में कामयाब रहा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

पलक शाह

 

जैसे कुंभकर्ण को मीठा खाने का बहुत शौक था, वैसे ही सेबी (SEBI) को 'एक्स-पार्टी ऑर्डर' जारी करने का बहुत शौक है. ये आदेश सेबी को यह ताकत देते हैं कि वह बिना सुनवाई किए किसी आरोपी के बैंक खाते फ्रीज कर दे या उनकी ट्रेडिंग बंद कर दे. ऐसा करना प्राकृतिक न्याय (Natural justice) के सिद्धांतों के खिलाफ है, क्योंकि सुनवाई बाद में होती है. कोर्ट और न्यायाधिकरण ने सेबी को चेतावनी दी है कि वह ऐसे आदेश केवल आपातकालीन स्थिति में ही जारी करे.

'एक्स-पार्टी' आदेश आमतौर पर यौन शोषण, उत्पीड़न या बच्चे की कस्टडी जैसे मामलों में जारी होते हैं. लेकिन सेबी ने इन्हें छोटे निवेशकों को बाजार के दुरुपयोग से बचाने के नाम पर इस्तेमाल किया है. इसके बावजूद, जब केतन पारेख (KP) और उनकी फ्रंट-रनिंग गतिविधियों की बात आई, तो सेबी ने ऐसा कदम उठाने में देरी की.

सेबी के एक अधिकारी, कमलेश वर्श्नेय, ने हाल ही में यह कहा कि केतन पारेख कोई आम इंसान नहीं हैं. लेकिन सवाल है कि जून 2023 में जानकारी होने के बाद भी सेबी ने केतन पारेख और उनके नेटवर्क पर 'एक्स-पार्टी' आदेश जारी करने में 18 महीने क्यों लगा दिए? क्या केतन पारेख और उनके नेटवर्क ने 65 करोड़ रुपये का अवैध लाभ कमाया, सच है, या घोटाला इससे भी बड़ा है?

केतन पारेख को 2003 में 14 साल के लिए बैन किया गया था क्योंकि उन्होंने 2000-01 में 'K-10 स्टॉक्स' के जरिए बड़ा घोटाला किया था. पिछले 20 सालों से यह चर्चा है कि केतन पारेख ने छुपकर, फ्रंट कंपनियों के जरिए बाजार में खेल जारी रखा है. 2008 में इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की एक रिपोर्ट में केतन पारेख का नाम सामने आया था, लेकिन तब की कांग्रेस सरकार और वित्त मंत्रियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया. यह दिखाता है कि केतन पारेख के पास कितना राजनीतिक प्रभाव है.

SEBI के रेड्स के पीछे की कहानी

आमतौर पर, सेबी (SEBI) अगर किसी गड़बड़ी या रैकेट से जुड़ी गंभीर जानकारी जुटाती है, तो वह तुरंत "एक्स-पार्टी आदेश" जारी करती है. यह आदेश छापों से पहले या बाद में बिना देरी किए जारी किए जाते हैं. ऐसा ही यूट्यूब इनफ्लुएंसर्स के मामले में हुआ, जहां सेबी ने पहले एक्स-पार्टी आदेश जारी किया और फिर संदिग्धों पर छापा मारा. ये आदेश बहुत लंबे होने की जरूरत नहीं होती, कुछ लाइनों में भी जारी किए जा सकते हैं, अगर सेबी के पास शुरुआती सबूत हों, जो उसके हाई-टेक निगरानी तंत्र से मिलते हैं.

तो फिर सवाल यह है कि जून 2023 में छापे मारने के 18 महीने बाद भी सेबी ने केतन पारेख  और उनके नेटवर्क के खिलाफ 'एक्स-पार्टी' आदेश जारी करने में देरी क्यों की? सेबी ने यह आदेश 3 जनवरी 2025 को जारी किया. अगर मामला इतना गंभीर था कि 18 महीने बाद भी आपातकालीन आदेश जारी करना पड़ा, तो फिर सेबी कुंभकर्ण की तरह क्यों सोई रही? यह सवाल दिल्ली की राजनीति और मुंबई के बाजारों में चर्चा का विषय बना हुआ है.

सेबी ने केतन पारेख और उनके नेटवर्क पर शिकंजा जून 2023 में कसा, जब उसने कोलकाता और मुंबई में कई जगह छापे मारे. यह कार्रवाई 2024 के राष्ट्रीय चुनावों से कुछ महीने पहले हुई थी. इस ऑपरेशन में सेबी के करीब 75 अधिकारी शामिल थे. उन्होंने 6 लोगों पर कार्रवाई की, जिनमें एक हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल (HNI) भी था, जो मुंबई के नारिमन पॉइंट के महंगे बिजनेस डिस्ट्रिक्ट में फैमिली ऑफिस चलाता है, उसे घंटों पूछताछ के लिए बैठाया गया. 

सेबी की तलाशी और जब्ती के दौरान फोन चैट रिकॉर्ड मिले, जिनसे हवाला के जरिए धन के लेन-देन और मुनाफे के बंटवारे की जानकारी मिली. ये चैट्स केतन पारेख से जुड़े कई लोगों और ऑपरेटर्स के बीच की बातचीत दिखाती हैं. छापों में लैपटॉप, दस्तावेज और अन्य सबूत भी जब्त किए गए. अब वही फोन चैट और रिकॉर्ड्स सेबी के 188-पेज के आदेश का हिस्सा हैं, जो केतन पारेख और उनके नेटवर्क के खिलाफ जारी हुआ. इसमें सिंगापुर में रहने वाले रोहित सालगांवकर और उनकी कंपनी जैसे प्रमुख नाम भी शामिल हैं. कहा जाता है कि सेबी के अधिकारियों की एक टीम सिंगापुर भी गई थी, ताकि सालगांवकर और उनकी कंपनी से जुड़े डेटा जुटा सके.

SEBI कब करती है ऐसे छापे?  

सेबी (SEBI) ऐसे छापे तब करती है जब उसका सर्विलांस सिस्टम किसी संदिग्ध गतिविधि, जैसे फ्रंट-रनिंग या बाजार के दुरुपयोग, को पकड़ता है और इसमें शामिल पार्टियों की पहचान करता है. सेबी का सर्विलांस सिस्टम अल्गोरिदम और एआई से लैस है, जो फ्रंट-रनिंग जैसे बाजार दुरुपयोग की सूचना देता है. उदाहरण के लिए, " Buy Buy Sell" या " Sell Sell Buy" जैसे पैटर्न फ्रंट-रनिंग के क्लासिक संकेत हैं. ऐसे कई फिक्स्ड पैरामीटर हैं, जो सेबी को गड़बड़ियों का पता लगाने में मदद करते हैं.  

केतन पारेख के फ्रंट एंटिटीज ने अमेरिकी फंड Tiger Global के ट्रेड्स को फ्रंट-रन किया था. यही अलर्ट सेबी को इन पार्टियों को ट्रैक और उन पर छापे मारने की वजह बना. लेकिन सवाल यह है कि सेबी ने तब 'एक्स-पार्टी' आदेश क्यों नहीं जारी किया ताकि खुदरा निवेशकों को बाजार के दुरुपयोग से बचाया जा सके? और अगर सेबी को तब ऐसा जरूरी नहीं लगा, तो अब जनवरी 2025 में क्यों लगा?  

छापों से यह साफ हो जाता है कि सेबी को 18 महीने पहले ही फ्रंट-रनिंग ऑपरेशन और इसमें शामिल पार्टियों की जानकारी थी. छापे के दौरान, सेबी ने केतन पारेख के मोबाइल फोन को ट्रैक किया, जिसकी जानकारी उसे KP की पत्नी के मोबाइल नंबर से मिली थी. यह नंबर केतन पारेख ने 15 मार्च 2023 को एक विज़िटर स्लिप पर लिखा था. इस आधार पर, सेबी ने मार्च से जून 2023 के बीच केतन पारेख की मोबाइल एक्टिविटी पर नजर रखी और फिर छापे मारे.

जून 2023 में, सेबी के वरिष्ठ अधिकारियों से मिली जानकारी के आधार पर, एक रिपोर्टर ने पहली बार इस मामले को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्विटर) पर पोस्ट किया. इसके बाद Sunday Guardian और Zee Business जैसे मीडिया प्लेटफॉर्म ने इसे प्रकाशित किया. लेकिन इसके बावजूद सेबी ने 18 महीने तक कुछ नहीं कहा, ऐसा क्यों?  

2023 की खबरों से पता चला कि मुंबई और कोलकाता में केतन पारेख के नियंत्रण वाली संस्थाओं को विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के ऑर्डर की जानकारी पहले से ही मिल रही थी. सेबी के सिस्टम ने देखा कि एक ही सेट की संस्थाएं FPI के ऑर्डर आने से पहले ही शेयर खरीद और बेच रही थीं. सेबी ने इन संस्थाओं का प्रोफाइल तैयार किया, छापे मारे, इलेक्ट्रॉनिक सबूत जब्त किए और संदिग्ध लोगों से पूछताछ की, लेकिन फिर 18 महीने तक मामला ठंडा पड़ा रहा.

सेबी के एक पूर्व बोर्ड सदस्य ने कहा कि "यह साफ है कि जो तथ्य और डेटा सेबी ने हालिया आदेश में इस्तेमाल किए, वे 2023 में छापों के समय भी उपलब्ध थे. इतने गंभीर मामले में सेबी ने तेज और सख्त कार्रवाई नहीं की, जिससे निवेशकों के हितों को नुकसान हुआ. इस देरी ने 'एक्स-पार्टी' आदेश के उद्देश्य को ही बेकार कर दिया." 

एक और बड़ा मामला, जो म्युचुअल फंड ट्रेड्स की फ्रंट-रनिंग से जुड़ा है, उसमें भी छापे मारे गए, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिखी. केतन पारेख और उसके नेटवर्क के खिलाफ 'एक्स-पार्टी' आदेश में देरी से सेबी की सुस्ती पर गंभीर सवाल उठते हैं. 18 महीने तक, जब सेबी चुप थी, केतन पारेख शायद आराम से अपनी गड़बड़ी जारी रख सकता था, और जनता को इसकी खबर तक नहीं होती. सेबी अब जांच के घेरे में है, क्योंकि उसकी सुस्ती कुंभकर्ण की नींद से भी ज्यादा लग रही है.

(लेखक- पलक शाह, BW रिपोर्टर. पलक शाह ने "द मार्केट माफिया-क्रॉनिकल ऑफ इंडिया हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कबाल दैट वेंट स्कॉट-फ्री" नामक पुस्तक लिखी है. पलक लगभग दो दशकों से मुंबई में पत्रकारिता कर रहे हैं, उन्होंने द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन जैसी प्रमुख वित्तीय अखबारों के लिए काम किया है).
 

 


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