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क्या अडानी समूह का लेनदेन और कारोबार पूरी तरह से स्क्रिप्टेड है?

अर्थशास्त्री जानते हैं कि कोई भी बाजार वास्तव में इतनी अच्छी तरह से काम नहीं करता. विक्रेताओं की कीमतों और मात्रा को प्रभावित करने की क्षमता सर्वव्यापी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • अजय शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार

हिंडनबर्ग रिसर्च ने जब अडानी समूह के लेनदेन और कारोबार का विस्तृत खुलासा किया, तब हमारे पास आश्चर्य करने का कोई कारण नहीं था. अडानी समूह का अप्रत्याशित तेजी से हुआ विकास यूं ही तो नहीं हो सकता था. वजह, कठोर परिश्रम और बेहतरीन कारोबारी रणनीति तो सभी कारोबारी घराने करते हैं, किसी को कुछ सफलता मिलती है तो किसी को कुछ अधिक मगर अचानक किसी कारोबारी का उल्कापिंड की तरह चमकना सामान्य नहीं होता है. अडानी समूह का मुनाफा अचानक चार अंकों में पहुंच गया. निवेश पर 200 फीसदी से अधिक के रिटर्न का वादा करने जैसा. ऐसे वादे सामान्य कारोबार में नहीं होते. शायद तभी, काफी समय से अपेक्षित आरोपों की लंबी सूची सार्वजनिक हुई, जिस पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं. पहली में इसे भारत से जलन रखने वाले विदेशी हमले के रूप में प्रचारित किया गया. कहा गया, राष्ट्र (अडानी का व्यापार साम्राज्य) आगे बढ़ता रहेगा. दूसरी प्रतिक्रिया यह थी कि यह क्रोनी कैपिटलिज्म है और बड़े पूंजीपतियों के साथ शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व के मधुर संबंधों का जीता जागता उदाहरण. इस प्रतिक्रिया में कहा गया कि यह स्वार्थी गठजोड़ भारत की प्रतिष्ठा को बर्बाद करने के साथ ही अर्थव्यवस्था को डेंट लगाने वाला होगा. अगर वास्तव में ऐसा होता है, तो सरकार कारोबारी को बचाकर बाहर निकाल देती है मगर ऐसा भी देखने को नहीं मिला.

जांच...जानकारी...साजिश
इन अतिवादी, बल्कि पूर्व नियोजित, प्रतिक्रियाओं को एक तरफ छोड़ देता है, तो पहली बात जो सामने आती है, वह यह कि दूध को पानी से कैसे अलग किया जाए? दोनों ओर के वास्तविक-दावों को कैसे खोजा जाए? इसे हल करने का एकमात्र तरीका आरोपों और खंडन की विस्तार से जांच करना ही है. यही एकमात्र तार्किक तरीका है. यह भी सच है कि जांच में समय लगता है. इसके अलावा, अधिकांश मामलों में, वर्षों की जांच के बाद भी कोई ठोस, जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हो पाती. कालांतर में ये साजिश की कहानियां बनकर रह जाती हैं. चाहे बोफोर्स हो, राफेल सौदा हो या पेगासस, सभी में क्या हुआ? कोई भी अत्यधिक प्रतिक्रिया के साथ सहज नहीं हो सकता है, और न ही कोई यह उम्मीद भी कर सकता है कि सच्चाई का परीक्षण या खुलासा किया जाएगा. तो फिर क्या हो सकता है? एक तरीका यह हो सकता है कि उस व्यवस्था को तोड़ा जाए, जिससे यह प्रकरण सामने आया. गौतम अडानी की अभूतपूर्व वृद्धि की कहानी, उच्चतम स्तर पर राजनीतिक नेताओं के साथ उनके घनिष्ठ संबंध. जिस तरह से वित्तीय संपत्तियों और क्रेडिट बाजारों को धोखा दिया गया हो? नियामक कैसे चूक गए? या दूसरे तरीके से देखा जाये.

स्वायत्त सुधार तंत्र आवश्यक
अर्थशास्त्री जानते हैं कि कोई भी बाजार वास्तव में इतनी अच्छी तरह से काम नहीं करता. विक्रेताओं की कीमतों और मात्रा को प्रभावित करने की क्षमता सर्वव्यापी है. दरअसल, आर्थिक बाजारों का कोई सामान्य सिद्धांत नहीं है, सिवाय इसके कि कीमतें और मात्राएं खरीदारों और विक्रेताओं के आदान-प्रदान के माध्यम से उभरती हैं. मूल बिंदु लाभ को अधिकतम करना है, यदि संभव हो, तो दूसरों की कीमत पर भी. चूंकि एक आदर्श प्रतिस्पर्धी बाजार में हेरफेर असंभव है, इसलिए एक स्वायत्त सुधार तंत्र होना चाहिए, जो आपूर्ति को मांग के बराबर करता है. इसलिए, कुछ विशेषज्ञों ने अडानी को मंदी और बाजार सुधारों के रूप में संदर्भित किया है. यदि ऐसा है, तो यह निश्चित रूप से किसी स्वायत्त चैनल के माध्यम से संभव नहीं है. यह फर्मों के एक खोजी अध्ययन से ही शुरू किया गया माना जाएगा. अडानी समूह के खिलाफ विशिष्ट आरोप कुछ शेल कंपनियों को फर्जी अकाउंटिंग, धन और स्टॉक के माध्यम से स्थानांतरित करने के लिए टैक्स हेवन में स्थित ऑफ-शोर शेल कंपनियों के उपयोग आदि में छिपे हैं. अडानी समूह के शेयरों की कीमतों में हेरफेर करने और उन्हें बढ़ाने के लिए इन संसाधनों का उपयोग करना, और फिर वित्तीय संस्थानों से बड़े कर्ज लेकर इन बढ़े हुए मूल्य के शेयरों का उपयोग करने जैसा खेल है.

कुछ असाधारण-असामान्य नहीं
अडानी समूह पर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में इसी तरह के आरोप लगाए गए हैं. अगर ये आरोप सही हैं तो उसमें कुछ असाधारण-असामान्य नहीं किया गया. अगर हिंडनबर्ग, या कोई अन्य शोध फर्म इस तरह की खोजी परियोजनाओं को हाथ में लेती है, तो दुनिया भर में बहुत बड़ी संख्या में बड़ी, मध्यम और छोटी कंपनियों को अलग-अलग खुराक और डिग्री में ऐसा ही करते देखा जाएगा. नियंत्रण से बाहर होने वाली ऐसी प्रथाओं के खिलाफ जांच की पहली पंक्ति, एक सूचीबद्ध इकाई में ऑडिट फंक्शन है. स्पष्ट रूप से, अडानी मामले में, ऑडिटरों ने अपने स्वयं के आर्थिक लाभ को आगे बढ़ाने के लिए अवसरवादी व्यवहार किया होगा या आश्चर्यजनक रूप से मूर्ख रहे होंगे. इसे देखकर आर्थर एंडरसन और एनरॉन की यादें दिमाग में ताजा हो आती हैं. सुरक्षा की दूसरी पंक्ति में संस्थागत नियामक है. बाजार नियामक अक्सर अपने कार्यों में और खुलासे की जांच करने की क्षमता में अदूरदर्शी साबित होते हैं. संभव है कि इस मामले में भी कुछ ऐसा ही रहा हो. सुरक्षा की तीसरी पंक्ति में मुखबिर तंत्र है. एक खाता अधिकारी, जो जानता है कि किस तरह का जुआ चल रहा है, सीटी क्यों नहीं बजाता? एक छोटे व्हिसल ब्लोअर के खिलाफ बड़े व्यवसाय की ताकत की तुलना नहीं की जा सकती. एक मुखबिर को खरीदा जा सकता है, या पलक झपकते ही गायब किया जा सकता है.

मेगालोमानिया वास्तविक है
सुरक्षा की चौथी पंक्ति में कॉर्पोरेट प्रशासन के प्रभारी व्यवसाय इकाई में लोगों की नैतिक छानबीन शामिल है. हेरफेर करने वाले अधिकारी अक्सर यह सुनिश्चित करते हैं कि बोर्ड को पूरी तस्वीर का अधूरा सीन ही देखने को मिले. अन्य मामलों में, बोर्ड इस उम्मीद में अपनी आंखें बंद करना ठीक समझते हैं कि निकट भविष्य में बेहतर होगा और लंबे समय में सब कुछ भुला दिया जाएगा. यहीं पर कॉर्पोरेट नैतिकता काम आती है. बोर्डरूम में, विनियामक या कानूनी बाधाएं हैं. उनका उल्लंघन करना एक अवैध कार्रवाई के समान होता है. इसके अलावा ऐसी स्थितियां हैं, जहां कोई स्पष्ट कानून नहीं हैं, न ही कोई स्पष्ट सही या गलत है. यह वह जगह है, जहां व्यक्तिगत नैतिकता को आमतौर पर इस दावे से युक्तिसंगत बनाया जाता है कि समाज की अधिक भलाई के लिए व्यक्तिगत लाभ को बढ़ाना आवश्यक है. अगर उद्योगपति देश की अर्थव्यवस्था को आगे ले जा रहे हैं, तो शेयर वैल्यूएशन को थोड़ा धक्का देने में बुराई क्या है? मेगालोमानिया वास्तविक है, शायद यही वजह है कि अडानी सोचते हैं कि उनके व्यवसाय पर हमला, भारत पर हमला है.

नेताओं से करीबी रिश्ते 
अंत में, अपने साम्राज्य के विशाल आकार के अलावा, अडानी ने जो ध्यान आकर्षित किया है, उसका एक महत्वपूर्ण कारण सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व के साथ उनके करीबी लंबे रिश्ते हैं. हालांकि, यह भी कोई नई बात नहीं है. पूंजीवाद अनिवार्य रूप से Cronyism (दोस्तवाद) पर आधारित है. माना जाता है कि राजनेताओं की मदद के बिना, कोई भी टाइकून शीर्ष पर नहीं आ सकता. आ जाये तो लंबे समय तक टिक नहीं सकता. राज्य हमेशा बड़े व्यापार की बिक्री शक्ति रहा है. एक सहजीवी संबंध है. व्यवसाय को सरकार के समर्थन और आशीर्वाद की आवश्यकता होती है, जबकि राजनेताओं को चुनाव जीतने के लिए व्यवसाय से वित्तीय योगदान की आवश्यकता होती है. बड़ा व्यवसाय और बड़ी राजनीति हमेशा से बहुत ही आरामदायक सहयोगी रहे हैं. अडानी की कहानी में हम जो देखते हैं वह पूंजीवाद के शार्टकट का एक नकारात्मक चेहरा है. जब कोई कारोबार तपाकर बनाया जाता है, तो हमें सकारात्मक चेहरा देखने को मिलता है. भारत वैश्विक बाजार में आगे बढ़ रहा है. जिसके पास सभी तरह की अधिक शक्ति है, वही अडानी की तरह जीतता है, इसमें सही गलत कहां हैं? यह भी सच है कि पूंजीवाद बंधुआ नहीं होता है.


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