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Gossip & Tales: SEBI प्रमुख के स्वागत में सूफी कॉन्सर्ट का आयोजन

जब Sebi प्रमुख मंच पर आईं, तो "तुझको चलना होगा" गाना बजाया गया. इक्विटी बुल्स दबाव में, स्टॉक मार्केट्स ने 'अमन की आशा' पर ध्यान दिया, और MCX की सुनहरी दौड़ जारी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

पलक शाह

 

स्टॉक एक्सचेंजों के बीच दौड़  

NSE और BSE के बाद, अन्य एक्सचेंज जैसे MSEI, MCX, और NCDEX भी नए इक्विटी इंडेक्स लॉन्च करने की होड़ में हैं. इसका कारण है SEBI का नया नियम, जो NSE के डेरिवेटिव्स मार्केट में दबदबे को चुनौती दे सकता है. हाल ही में, SEBI ने एक एक्सचेंज को हर हफ्ते केवल एक साप्ताहिक इंडेक्स डेरिवेटिव एक्सपायरी की अनुमति दी है. इसका सीधा असर NSE पर पड़ा, जिसने अपने लोकप्रिय Nifty और Bank Nifty के वीकली एक्सपायरी कॉन्ट्रैक्ट्स से भारी ट्रेडिंग वॉल्यूम आकर्षित किया था. इस नियम के कारण, NSE को Bank Nifty के वीकली एक्सपायरी कॉन्ट्रैक्ट्स वापस लेने पड़े.

इस मौके को बाकी एक्सचेंज भुनाने की तैयारी कर रहे हैं. हाल ही में, MSEI ने अपने इंडेक्स SX40 पर वीकली एक्सपायरी डेरिवेटिव मार्केट में संभावनाओं को देखते हुए प्रमुख स्टॉक ब्रोकर्स के प्रमोटरों से 138 करोड़ रुपये जुटाए. Groww के प्रमोटर्स, Zerodha के कामथ ब्रदर्स की Rainmatter Investments, Securicorp Securities India और Share India Securities ने MSEI में निवेश किया. हालांकि, एक बड़े शेयरधारक ने नकारात्मक वोटिंग की, फिर भी MSEI ने सस्ते दाम पर नए निवेशकों को शेयर बेचने में सफलता पाई. कुछ सरकारी बैंकों ने, जो बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं, वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया. अब MSEI के पास बड़े ब्रोकर्स का समर्थन है, जो खुदरा ट्रेडिंग वॉल्यूम का 50-60% कंट्रोल करते हैं.

उसी तरह, MCX और NCDEX भी वीकली इंडेक्स ट्रेडिंग में शामिल हो सकते हैं, प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है. दूसरी ओर, BSE के शेयर की कीमत नए ऊंचाई पर पहुंच रही है, भले ही बाजार का माहौल कमजोर हो. सीधी बात यह है कि SEBI के नियमों ने किसी के लिए मुश्किलें पैदा की हैं तो किसी के लिए नए मौके.

AIBI: बिजनेस इवेंट या सूफी म्यूजिक कॉन्सर्ट?  

स्टॉक ब्रोकिंग समुदाय को SEBI ज्यादा तवज्जो नहीं देता लगता. पिछले 10-15 सालों में, ज्यादातर SEBI के प्रमुख AMFI (एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स ऑफ इंडिया) और AIBI (एसोसिएशन ऑफ इन्वेस्टमेंट बैंकर्स ऑफ इंडिया) के इवेंट्स में तो गए, लेकिन ANMI (स्टॉक ब्रोकर्स का संगठन) या BSE ब्रोकर्स फोरम के इवेंट्स में शायद ही गए हों. ये वही ब्रोकर्स हैं जो मार्केट में लोगों को लाने का काम करते हैं. इस हफ्ते, मौजूदा SEBI प्रमुख माधबी पुरी बुच AIBI के इवेंट में शामिल हुईं. लेकिन वहां टॉप 10 या 20 इन्वेस्टमेंट बैंकर तक मौजूद नहीं थे, जो आमतौर पर AIBI के इवेंट्स में देखने को मिलता है.

ये इवेंट जियो सेंटर में हुआ, जहां सुबह 9:30 बजे SEBI चीफ के आने तक करीब 90 मिनट तक सूफी म्यूजिक बजता रहा. जब SEBI प्रमुख मंच पर आईं, तो एक टीवी एंकर ने उनकी जमकर तारीफ की और 1970 के दशक की फिल्म 'सफर' का गाना "तुझको चलना होगा, तुझको चलना होगा" बजाया. गाने की ये लाइनें उनके लिए सही बैठती हैं, क्योंकि उनकी पोस्ट का कार्यकाल मार्च में रिन्यू होना है. शायद, स्टॉक ब्रोकर्स को भी अपने इवेंट्स में गाना-बजाना शुरू करना चाहिए, ताकि वे AMFI और AIBI के प्रभाव को चुनौती दे सकें और SEBI के बड़े अधिकारियों को आकर्षित कर सकें.

SEBI के कर्मचारियों की नौकरी पर खतरा  

हमने सुना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते असर से नौकरियां खत्म हो रही हैं. अब यह खतरा SEBI के कर्मचारियों पर भी दिख रहा है. हाल ही में हुए AIBI कॉन्फ्रेंस में SEBI की प्रमुख ने बताया कि कैसे रेगुलेटर AI को अपना रहा है और फाइलिंग से लेकर डॉक्यूमेंट्स की जांच और नियमों पर टिप्पणी तक के प्रोसेस को ऑटोमेट कर रहा है. इसका मतलब यह है कि जब कंपनियां जानकारी छुपाएंगी या नियम तोड़ेंगी, तो इसका दोष इंसानों पर नहीं, बल्कि AI पर डाला जाएगा. आने वाले समय में, यह SEBI के कई कर्मचारियों की जरूरत को खत्म कर सकता है.

कैसे इक्विटी बुल्स को दबाया गया? 

भारत में स्टॉक मार्केट का माहौल बेहद खराब है, और इसका सबसे ज्यादा फायदा बियर्स ने उठाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पुराने भाषणों में घरेलू और विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजार में निवेश करने के लिए प्रेरित किया था. लेकिन इसके विपरीत, मार्च पिछले साल, SEBI प्रमुख माधबी पुरी बुच ने कहा कि छोटे और मिड-कैप स्टॉक्स की वैल्यूएशन में जरूरत से ज्यादा उछाल है. उनके इस बयान के बाद कई नियम लागू हुए, जिससे ट्रेडिंग वॉल्यूम कम हुआ और बाजार का माहौल नकारात्मक हो गया.  

बाजार में चर्चा है कि म्यूचुअल फंड्स (MFs) के खरीदने और बेचने से जुड़े नियमों ने सबसे ज्यादा असर डाला। SEBI और AMFI (एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स ऑफ इंडिया) द्वारा बनाए गए SOPs (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) ने MF ट्रेडिंग को मुश्किल बना दिया है और लालफीताशाही का डर पैदा कर दिया है. म्यूचुअल फंड ट्रेडर्स अब इस डर से स्टॉक्स नहीं खरीदते, जिनकी कीमत दिन के VWAP (वॉल्यूम-वेटेड एवरेज प्राइस) से ज्यादा अलग हो, क्योंकि इससे नियमों का उल्लंघन हो सकता है और वे रेगुलेटरी जांच के चक्र में फंस सकते हैं.

इसके अलावा, बियर्स के पक्ष में बने नियमों में शामिल हैं:  

1. मार्जिन से जुड़े नियमों को सख्त करना.
2. डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के लॉट साइज बढ़ाना. 
3. उन स्टॉक्स की सूची को सीमित करना जिन्हें क्लियरिंग कॉरपोरेशन द्वारा कोलेटरल के रूप में स्वीकार किया जा सकता है.

यह सब तब हुआ जब बाजार अपने ऑल-टाइम हाई के करीब था। इसके अलावा, 1,000 से ज्यादा स्टॉक्स को ASM (अतिरिक्त निगरानी) और GSM (ग्रेडेड निगरानी) जैसे सेगमेंट्स में रखा गया, जहां ट्रेडिंग पर पाबंदियां लगी होती हैं. अब बाजार के बुल्स उम्मीद कर रहे हैं कि कुछ निवेशक और टैक्स-फ्रेंडली उपाय किए जाएंगे, जो बाजार की इस गिरती भावना को दोबारा जगा सकें.

MCX की सुनहरी दौड़ जारी  

जब से SEBI ने इक्विटी डेरिवेटिव्स पर सख्ती शुरू की है, MCX के शेयर की कीमत तेजी से बढ़ रही है, और इसका प्राइस-टू-अर्निंग रेश्यो आसमान छू रहा है. जबकि SEBI का पूरा ध्यान इक्विटी डेरिवेटिव्स पर पाबंदी लगाने पर है, कमोडिटी डेरिवेटिव्स में सट्टेबाजों को पूरी छूट मिल रही है. भारत में तेल और प्राकृतिक गैस के कॉन्ट्रैक्ट्स की डिलीवरी नहीं होती, लेकिन यह साफ है कि इक्विटी डेरिवेटिव्स पर लगी पाबंदियों ने कमोडिटी मार्केट में सट्टेबाजी को बढ़ावा दिया है.

इक्विटी डेरिवेटिव्स के लॉट साइज बढ़ा दिए गए हैं, लेकिन बड़े ब्रोकर्स, जो रिटेल ग्राहकों को सेवा देते हैं, अब कमोडिटी ट्रेडिंग की ओर रुख कर रहे हैं. कमोडिटी में मिनी कॉन्ट्रैक्ट्स का लॉट साइज सिर्फ 1 लाख रुपये है, जबकि इक्विटी डेरिवेटिव्स में न्यूनतम लॉट साइज 15 लाख रुपये का है. क्या SEBI को याद है कि वह कमोडिटी डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग को भी रेगुलेट करता है?

स्टॉक मार्केट्स ने 'अमन की आशा' पर ध्यान दिया  

'अमन की आशा' का विचार शुरू में पाकिस्तान की ISI ने एक धोखाधड़ी भरी रणनीति के रूप में पेश किया था. इसका मकसद भारत में शांति और दोस्ती की झूठी उम्मीद जगाना था, जबकि 'हजार कट' की नीति के तहत आतंकवाद का इस्तेमाल जारी रखा. इस पहल को कांग्रेस-नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान कुछ नौकरशाहों ने समर्थन दिया था. लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के सत्ता में आने पर इसे खारिज कर दिया गया, जिससे पाकिस्तान की स्थिति एक भिखारी जैसी हो गई. फिर भी, भारत में कुछ भोले लोग अब भी 'अमन की आशा' के विचार से जुड़े हुए हैं.

हाल ही में सेबी के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सिक्योरिटीज मार्केट्स (NISM) द्वारा आयोजित 'संवाद' नामक एक कार्यक्रम में, शशि कृष्णन, जो पहली बार NISM के डायरेक्टर के रूप में सार्वजनिक रूप से सामने आए, ने भारत-पाकिस्तान रिश्तों पर गुलज़ार की एक कविता सुनाई. उन्होंने यह कहते हुए एक संदेश दिया कि जिन्होंने दोनों देशों की जनता को विभाजित किया, वे हवा और पानी को अलग नहीं कर सके जो उन्हें जोड़ता है.  

कृष्णन ने ग्रो के प्रमोटर और उद्यमी ललित केशरे के साथ अपनी बातचीत का भी जिक्र किया. ग्रो म्यूचुअल फंड वितरण के लिए एक प्रमुख प्लेटफॉर्म बन गया है. हालांकि, दर्शकों के बीच ग्रो के सॉफ़्टवेयर गड़बड़ियों को लेकर शिकायतों की चर्चा भी हो रही थी. यह NISM कार्यक्रम NSE, BSE, और डिपॉजिटरी NSDL और CDSL के संयुक्त प्रयास से आयोजित हुआ. जब SEBI प्रमुख इस कार्यक्रम में भाषण दे रही थीं, तो BSE के सीईओ ET Now को इंटरव्यू दे रहे थे, और NSDL के सीईओ कार्यक्रम से अनुपस्थित थे.

(लेखक- पलक शाह, "द मार्केट माफिया - क्रॉनिकल ऑफ इंडिया’s हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कबाल दैट वेंट स्कॉट-फ्री" किताब के लेखक हैं. पलक शाह पिछले दो दशकों से मुंबई में पत्रकारिता कर रहे हैं. उन्होंने द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन जैसे प्रमुख पिंक पेपरों में काम किया है. वह 19 साल की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग से जुड़े थे, लेकिन कुछ सालों में इस क्षेत्र में काम करने के बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि अपराध की संरचना बदल चुकी थी और वह संगठित गिरोह, जैसा कि मुंबई ने 80 के दशक में देखा था, अब अस्तित्व में नहीं थे.  'व्हाइट मनी' अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को समझने के उनके जुनून ने पलक को वित्त और नियामकों की दुनिया में पहुंचा दिया.)
 


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