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एनर्जी सस्टेनेबिलिटी की ओर भारत के बढ़ते कदम, एथेनॉल मिश्रण निभाएगा अहम योगदान

एथेनॉल उद्योग खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा नहीं है, बल्कि यह कृषि क्षेत्र के लिए वरदान है. यह ऐसे अनाज से आमदनी का साधन बनाता है, जिन्हें इस्तेमाल या भंडारण नहीं किया जा सकता.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

भारत की एनर्जी सिक्योरिटी और सस्टेनेबिलिटी पॉलिसी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम है. एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ना और अनाज (जैसे मक्का और चावल) से बनाया जाता है. लेकिन कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि एथेनॉल उद्योग से खाद्य सुरक्षा को खतरा हो सकता है. यह तर्क गलत है और वास्तविकता पर आधारित नहीं है.

भारत खाद्य की कमी वाला देश नहीं है, बल्कि खाद्य अधिशेष (Surplus) वाला देश है. 2014-15 से 2023-24 तक, भारत में चावल और गेहूं का उत्पादन 30% से ज्यादा बढ़ा है, और मक्का का उत्पादन 56% बढ़ा है. भारत ने अनाज आयातक से निर्यातक बनने की बड़ी उपलब्धि हासिल की है। 2023-24 में, भारत ने चावल का 164 लाख टन (उत्पादन का 12%) निर्यात किया. भारत में अनाज का उत्पादन उसकी खपत से कहीं ज्यादा है. हर साल भारत में अनाज की खपत लगभग 2,000 लाख टन होती है, जबकि उत्पादन 3,000 लाख टन होता है, इससे पता चलता है कि अनाज की पर्याप्त आपूर्ति है.  

इतना उत्पादन होने के बावजूद, भारत ने सुनिश्चित किया है कि सभी नागरिकों को अनाज मिल सके. भारतीय खाद्य निगम (FCI) सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए अनाज वितरित करता है और बफर स्टॉक बनाए रखता है. वर्तमान में, एफसीआई के पास चावल का स्टॉक उसके तय मानकों से तीन गुना ज्यादा है. इतना ज्यादा स्टॉक संभालना मुश्किल हो सकता है. लंबे समय तक स्टोर करने से अनाज में कीड़े लग सकते हैं या वह खराब हो सकता है. उदाहरण के लिए, कर्नाटक, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और असम को दिए गए चावल में यह समस्या देखी गई.  

FCI के गोदामों में अतिरिक्त स्टॉक को लंबे समय तक रखने से FCI और अर्थव्यवस्था पर महत्वपूर्ण लागतें आ सकती हैं. इनमें भंडारण लागत में वृद्धि, क्षति का जोखिम, अनाज उगाने में खर्च किए गए संसाधनों की बर्बादी और अवसर लागत शामिल हैं, जहां इस स्टॉक का उपयोग अन्य आवश्यक उद्देश्यों के लिए किया जा सकता था.

इन चुनौतियों के समाधान के कई तरीके हैं. पहला, खराब गुणवत्ता वाले अनाज की पहचान के लिए गुणवत्ता नियंत्रण प्रक्रिया को और मजबूत किया जाए. ऐसा अनाज जिसे मानव उपभोग के लिए अयोग्य पाया गया हो, उसे एथेनॉल जैसे व्यावसायिक उपयोगों के लिए भेजा जा सकता है. दूसरा, भंडारण और लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाया जाए ताकि अनाज खराब न हो. तीसरा, दीर्घकालिक दृष्टिकोण से, किसानों को चावल जैसे अनाज का अधिक उत्पादन रोकने के लिए फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित किया जाए.

जब तक ये समाधान पूरी तरह लागू नहीं होते, मौजूदा अतिरिक्त अनाज, खासकर टूटा और खराब चावल, तुरंत एथेनॉल उद्योग जैसे उपयोगों में लगाया जा सकता है. एथेनॉल उद्योग मक्का पर निर्भर करता है, लेकिन पहले यह टूटे और खराब चावल का भी उपयोग करता था. अगर इसे फिर से यह चावल दिया जाए, तो इससे मक्का के आयात की आवश्यकता कम होगी और मक्का की कीमतों पर दबाव घटेगा. मौसमी आपूर्ति और मांग में उतार-चढ़ाव के कारण फसल कटाई के समय अतिरिक्त अनाज भी एक समस्या बनता है, इस चावल को एथेनॉल जैसे अन्य उपयोगों के लिए भेजा जा सकता है. 

भारत ने अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल की है. अब इस उपलब्धि को सही तरीके से प्रबंधित करना जरूरी है. टूटे, खराब या मानव उपयोग के लायक न रहे चावल को एथेनॉल जैसे उपयोगों में लाना एक सही कदम है. इस संदर्भ में, एथेनॉल उद्योग खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा नहीं है, बल्कि यह कृषि क्षेत्र के लिए एक वरदान है, क्योंकि यह अनाज को आय का स्रोत बनाता है, जिसे अन्यथा बर्बाद होना पड़ता. 

डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और यह जरूरी नहीं है कि प्रकाशन के विचारों से मेल खाते हों.

(लेखक- शोभनाबेन महेन्द्रसिंह बारैया, लोकसभा सांसद और शिक्षा, महिलाएं, बच्चे, युवा और खेल से जुड़ी प्रमुख संसदीय समितियों की सदस्य)
 


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