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डॉ. मनमोहन सिंह: एक शानदार रिफॉर्मर लेकिन कमजोर कम्युनिकेटर
डॉ. मनमोहन सिंह इतने विनम्र और सीधे थे कि उन्होंने संचार की प्रभावशीलता की चिंता नहीं की. दुर्भाग्यवश, यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह निस्संदेह एक महान उदारीकरणकर्ता (Liberaliser) थे. लेकिन भारत में बहुत कम लोग जानते हैं कि वे "परिणाम-उन्मुखता (Results-Orientation)" यानी काम को पूरा करने के प्रति कितने समर्पित थे. हालांकि, उनका काम पूरा करने का तरीका श्रम-प्रधान या व्यक्तिगत प्रणाली पर आधारित नहीं था. बल्कि, वे प्रबंधन प्रणालियों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करते थे, जो वादों और प्रदर्शन के बीच के अंतर को कम कर सके.
डॉ. मनमोहन सिंह का निधन निश्चित रूप से भारत के लिए एक बहुत बड़ी राष्ट्रीय क्षति है. यह उन अनगिनत लोगों के लिए व्यक्तिगत क्षति भी है जिनके जीवन को उन्होंने व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों रूपों में प्रभावित किया. हालांकि, ये दोनों पहलू अक्सर जुड़े रहते हैं, लेकिन ऐसा कम ही होता है कि कोई व्यक्ति केवल एक ही क्षेत्र में प्रभावित हो. मैं उन लोगों में से हूं जिनके जीवन को उन्होंने मुख्य रूप से पेशेवर क्षेत्र में छुआ.
मैंने भारत सरकार में डॉ. मनमोहन सिंह के अधीन दो बार काम किया. पहली बार, 1990-94 में जब वे भारत के वित्त मंत्री थे और मैं भारत सरकार में आर्थिक सलाहकार के रूप में नियुक्त था. दूसरी बार, 2009-2014 में जब वे भारत के प्रधानमंत्री थे और मैं भारत सरकार में सचिव के रूप में कार्यरत था. इन दोनों बार मैं एक बाहरी प्रवेश का उदाहरण था. 1991 में, मैं इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, कोलकाता में एक प्रोफेसर था, जब मैंने भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार के रूप में कार्यभार संभाला. 2009 में, मैंने वर्ल्ड बैंक में सीनियर इकोनॉमिस्ट के पद से इस्तीफा देकर भारत सरकार में सचिव के रूप में काम करना शुरू किया.
डॉ. मनमोहन सिंह की भारत की अर्थव्यवस्था को उदार बनाने की भूमिका तो सब जानते हैं, लेकिन उनके द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र को परिणाम-उन्मुख (Results-Orientation) बनाने के लिए किए गए प्रयासों को बहुत कम लोग समझते हैं. मैं उनकी इन्हीं महत्वपूर्ण उपलब्धियों को रेखांकित करना चाहता हूं, वे प्रणाली निर्माण में महारथी थे.
सरकार के उच्चतम स्तरों पर अपने इन दोनों कार्यकालों के दौरान, उन्होंने भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र को परिणाम-उन्मुख (Results-Orientation) बनाने के लिए क्रांतिकारी नीतियों की शुरुआत की. 1991 में, IMF के भारी दबाव के बावजूद, उन्होंने केवल उन्हीं सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण किया, जहां निजी क्षेत्र पहले से मौजूद था और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिल सकता था.
जैसे, मॉडर्न बेकरीज़, VSNL, BALCO जैसी कंपनियों का निजीकरण (Privatised) किया गया. लेकिन बाकी सार्वजनिक उपक्रमों को औद्योगिक नीति संकल्प 1991 (Industrial Policy Resolution of 1991) के तहत एमओयू (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) की नीति में रखा गया. एमओयू सार्वजनिक उपक्रमों के प्रबंधन और भारत सरकार के बीच किए गए प्रदर्शन अनुबंध हैं, जिसमें प्रबंधन ने सरकार को स्पष्ट परिणाम देने का वादा किया.
डॉ. मनमोहन सिंह ने समझा कि समस्या प्रबंधन में नहीं बल्कि सरकार के आलसी रवैये में थी. 1991 में शुरू की गई एमओयू नीति आज भी जारी है. इसके तहत, सरकार ने स्पष्ट लक्ष्यों को परिभाषित किया और प्रदर्शन को बोनस से जोड़ा. इससे सार्वजनिक उपक्रमों की लाभप्रदता और प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार हुआ. यही कारण है कि एमओयू प्रणाली आज भी भारत सरकार की आधिकारिक नीति है.
CPSEs का नेट प्रॉफिट
2009 में, जब डॉ. मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री थे, मुझे भारत सरकार द्वारा कैबिनेट सचिवालय में भारत सरकार के सचिव के रूप में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया. मेरा काम, प्रदर्शन प्रबंधन (Performance Management) संभालना था. इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए, मैंने वर्ल्ड बैंक से इस्तीफा देकर भारत सरकार में शामिल होने का फैसला किया.
मुझे 2008 में प्रस्तुत "द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग" (Second Administrative Reform Commission) की दसवीं रिपोर्ट की एक महत्वपूर्ण सिफारिश को लागू करना था. इस रिपोर्ट का शीर्षक था: "कार्मिक प्रशासन का पुनर्निर्माण" (Refurbishing of Personnel Administration). इसमें यह सिफारिश की गई थी (और सरकार ने इसे स्वीकार किया) कि हर साल विभागीय मंत्री और मंत्रालय/विभागों के सचिवों के बीच "वार्षिक प्रदर्शन समझौते" (Annual Performance Agreements) किए जाएं.
इन समझौतों में वित्तीय वर्ष के लिए स्पष्ट, मापने योग्य, प्राप्त करने योग्य, प्रासंगिक, और समयबद्ध (SMART) लक्ष्य और उद्देश्य शामिल होने चाहिए. इस नीति को स्वीकार करने और लागू करने के लिए साहस और स्पष्टता की आवश्यकता थी, जिसे केवल एक परिणाम-उन्मुख प्रधानमंत्री ही कर सकते थे.
इस नीति को "परिणाम-ढांचा दस्तावेज़" (Results-Framework Document, RFD) के नाम से लागू किया गया. 2009 से 2014 तक के प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार, इसने सरकार के कामकाज पर सकारात्मक प्रभाव डालना शुरू कर दिया था. यहां RFD के प्रभाव के कुछ उदाहरण दिए गए हैं, जिन्होंने सरकार के कामकाज को बेहतर बनाया.
आखिर में, मैं डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल से जुड़ी एक बड़ी विडंबना साझा करना चाहता हूं. मई 2010 में, इंडिया टुडे ने यूपीए (UPA) पर एक कवर स्टोरी प्रकाशित की. इसमें यूपीए को 'अंडर परफॉर्मिंग एलायंस' (Under Performing Alliance) कहा गया, इसमें सभी मंत्रियों की प्रदर्शन रैंकिंग दी गई थी.
संयोग से, उसी समय हमने 'रिजल्ट्स-फ्रेमवर्क डॉक्यूमेंट' (RFD) नीति के पहले पूरे साल का आकलन पूरा किया. यह नीति मंत्रियों (जो जनता की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं) और मंत्रालय के सचिव (जो उस विभाग के मुख्य कार्यकारी होते हैं) के बीच एक प्रदर्शन समझौता था. RFD में विभाग के उद्देश्य, उन्हें हासिल करने के लिए किए जाने वाले कार्य, और सफलता को मापने के लिए लक्ष्य और मानदंड स्पष्ट रूप से तय किए गए थे.
यह शायद द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की पहली सिफारिश थी जिसे तत्कालीन सरकार ने न केवल स्वीकार किया, बल्कि पूरी तरह लागू भी किया. वास्तव में, मुझे वर्ल्ड बैंक से लाकर इस नीति को लागू करने के लिए नियुक्त किया गया था. हालांकि, इंडिया टुडे द्वारा बनाई गई मंत्रियों की प्रदर्शन रैंकिंग, कैबिनेट सचिवालय के प्रदर्शन प्रबंधन विभाग (Performance Management Division) द्वारा तैयार की गई रैंकिंग से मेल नहीं खाती थी. सांख्यिकी विशेषज्ञ दो रैंकिंग की समानता मापने के लिए स्पीयरमैन रैंक कोरिलेशन (Spearman Rank Correlation) का उपयोग करते हैं.
जैसा कि नीचे दिखाया गया है, स्पीयरमैन रैंक का मान 0.02 था, जो बताता है कि दोनों रैंकिंग में कोई संबंध नहीं था. जब मैंने इंडिया टुडे के मैनेजिंग एडिटर से संपर्क किया, तो उन्होंने बताया कि इंडिया टुडे की रैंकिंग केवल धारणा (perception) पर आधारित थी, लोगों से इंटरनेट-आधारित सर्वेक्षण भरवाया गया था. वहीं, RFD रैंकिंग विभिन्न विभागों द्वारा रिजल्ट्स-फ्रेमवर्क डॉक्यूमेंट में किए गए वादों के आधार पर उनकी उपलब्धियों के आधिकारिक डेटा पर आधारित थी. फिर इस धारणा (perception) के विरोधाभास को कैसे समझा जाए? आधिकारिक, विश्वसनीय डेटा यह बताता है कि लगभग अस्सी विभागों ने प्रदर्शन पर आधारित वादे किए, जिन्हें न केवल सरकार बल्कि एक स्वतंत्र गैर-सरकारी कार्यबल द्वारा भी जांचा और मंजूरी दी गई.
इसका उत्तर डॉ. मनमोहन सिंह की एक बड़ी कमजोरी में छुपा है – संचार कौशल. प्रधानमंत्री के प्रदर्शन की धारणा तीन चीजों पर निर्भर करती है: (1) लक्ष्य हासिल करना (2) इंटरफेस प्रबंधन की गुणवत्ता (3) संचार (communication). डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में ऊपर दिए गए पहले दो पहलुओं को प्रभावी ढंग से संभाला जा रहा था. एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रणाली (RFD) थी, जो भारत सरकार के सचिवों को लक्ष्य प्राप्त करने के लिए जिम्मेदार ठहराती थी.
इसके अलावा, भारत सरकार ने नागरिकों से जुड़ाव को सुधारने के लिए दो बहुत प्रभावी प्रणालियां लागू की थीं: (1) हर विभाग को एक नागरिक चार्टर (citizen's charter) तैयार करने के लिए कहा गया था, जिसमें न केवल विभाग द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं, बल्कि उन सेवाओं के मानकों को भी स्पष्ट किया गया था, (2) शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Redress Mechanism - GRM). हालांकि, इन पहलों के प्रभावी संचार की कमी थी. डॉ. मनमोहन सिंह इतने विनम्र और सीधे थे कि उन्हें संचार की प्रभावशीलता की चिंता नहीं थी और यही उनकी कमजोरी साबित हुई.
लेखक-डॉ. प्रजापति त्रिवेदी, वर्तमान में प्रबंधन विकास संस्थान (MDI) में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं. उन्होंने डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भारत सरकार में कैबिनेट सचिवालय में सचिव और जब डॉ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे, तब सार्वजनिक उद्यम विभाग में भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार के रूप में कार्य किया.
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