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DHFL और पिरामल की डील: सुप्रीम कोर्ट का फैसला ठीक या है विवादास्पद?

आलोचकों का कहना है कि यह फैसला कॉर्पोरेट दिग्गजों को कानूनी खामियों का फायदा उठाने की अनुमति देता है, जिससे बैंकों और जमाकर्ताओं की कीमत पर भारी मुनाफा हो रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

पलक शाह

 

1 अप्रैल, 2025 को एक महत्वपूर्ण फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने पिरामल ग्रुप द्वारा दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (DHFL) के अधिग्रहण को मंजूरी दे दी, जिससे इंसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड (IBC), 2016 की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे. आलोचकों का कहना है कि यह फैसला कॉर्पोरेट दिग्गजों को कानूनी खामियों का फायदा उठाने की अनुमति देता है, जिससे बैंकों और जमाकर्ताओं की कीमत पर भारी मुनाफा हो रहा है.

IBC: क्या यह उधारी का रास्ता है या संपत्ति की लूट?

2016 में लागू किया गया IBC भारत में दिवालिया कंपनियों के समाधान की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए था. लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह असल में कंपनियों को ठीक करने के बजाय संपत्ति लूटने का एक साधन बन गया है. DHFL का मामला यह दिखाता है कि कैसे बड़ी कंपनियां सिस्टम का फायदा उठाकर खुद को लाभ पहुंचा सकती हैं. 

DHFL का पतन और पिरामल का प्रवेश

DHFL, जो पहले एक प्रमुख हाउसिंग फाइनेंस कंपनी थी, ने ₹87,000 करोड़ के बैंक लोन जमा किए थे और फिर इसे राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) में दिवालियापन की प्रक्रिया के लिए भेजा गया. समाधान प्रक्रिया के दौरान, पिरामल ग्रुप ने DHFL को ₹38,000 करोड़ में खरीद लिया, जो कि इसमें शामिल संपत्तियों के मुकाबले एक बड़ी छूट थी.

जो बात हैरान करने वाली थी, वह यह थी कि पिरामल ने ₹47,000 करोड़ के संपत्ति-समर्थित लोन को केवल ₹1 पर मूल्यांकित किया. इस कदम से पिरामल को इन लोन से भविष्य में होने वाली किसी भी वसूली पर विशेष अधिकार मिल गए, जिससे बैंकों और जमाकर्ताओं के नुकसान की कीमत पर पिरामल को बड़ा मुनाफा हुआ.

क्या नियमों का गलत इस्तेमाल हुआ?

पिरामल ग्रुप ने IBC के कुछ नियमों का ऐसा इस्तेमाल किया, जिससे उन्हें सस्ते में बड़ा फायदा मिला. ये रहे कुछ मुख्य बिंदु:

• संपत्तियों की कम कीमत लगाना: DHFL के पास बहुत बड़ी संपत्तियां थीं, लेकिन उसके कई अहम लोन की कीमत बहुत कम कर दी गई, इससे पिरामल को बहुत सस्ते दाम में ये लोन मिल गए.

• वसूली पर पूरा कंट्रोल: जिन लोन की कीमत सिर्फ ₹1 लगाई गई थी, अगर भविष्य में उनसे पैसा वापस आता है, तो सारा पैसा सिर्फ पिरामल को मिलेगा. इस वजह से बैंक और जमाकर्ताओं को फायदा नहीं, बल्कि नुकसान होगा.

• पारदर्शिता की कमी: ₹47,000 करोड़ के लोन की वैल्यू कैसे तय की गई, इस पर साफ जानकारी नहीं दी गई. इससे शक होता है कि पूरी प्रक्रिया बड़ी कंपनियों के हित में की गई.

• जल्दी मंजूरी मिलना: मुंबई NCLT ने इस डील को बहुत जल्दी मंजूरी दे दी, जबकि इसमें कई गड़बड़ियाँ साफ दिख रही थीं, लोगों का मानना है कि ये फैसला कॉरपोरेट कंपनियों को फायदा देने के लिए था, जनता या बैंकों की भलाई के लिए नहीं.

कानूनी झगड़े और पिरामल को मिले पक्ष में फैसले

पहले मुंबई NCLT ने पिरामल ग्रुप को DHFL का अधिग्रहण मंजूर किया, और पिरामल को सभी वसूली अधिकार दिए. लेकिन, नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने इस फैसले को पलट दिया, और इसे बैंकों और फिक्स्ड डिपॉजिट धारकों के लिए अन्यायपूर्ण करार दिया.

हालांकि, इस नुकसान के बावजूद, पिरामल को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली, जिसने NCLAT के फैसले को पलट दिया और पिरामल को DHFL का अधिग्रहण करने की अनुमति दी. इस फैसले ने पिरामल को DHFL की संपत्तियों पर नियंत्रण तो दिया ही, साथ ही उसे कानूनी तरीके से उन लोन की वसूली करने का अधिकार भी दे दिया, जिन्हें उसने पहले कम कीमत पर लिया था.

कौन जीता और कौन हारा?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ, पिरामल अब ₹47,000 करोड़ में से बहुत सारा पैसा वापस पा सकता है, जिसे उसने पहले ₹1 पर लिखा था. इस डील में सबसे बड़े हारने वाले बैंक और जमाकर्ता हैं, जिन्हें DHFL को अच्छा भरोसा देकर बड़ी रकम उधार दी थी, लेकिन उन्हें बहुत बड़ा नुकसान हुआ.

समीक्षकों का कहना है कि यह मामला IBC प्रक्रिया में बड़ी खामियों को उजागर करता है. इसके बजाय कि यह प्रक्रिया न्यायपूर्ण समाधान दे, यह दिखता है कि यह मुसीबत में फंसी कंपनियों से संपत्तियां सस्ते दामों पर बड़ी कंपनियों को ट्रांसफर करने का रास्ता बन गई है. बैंकिंग क्षेत्र, जो पहले ही बुरे लोन से जूझ रहा है, इस फैसले से और कमजोर हुआ है, जबकि जमाकर्ताओं का विश्वास भी कम हो सकता है.

न्यायालयों की भूमिका: मददगार या न्यायकर्ता?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने ये कठिन सवाल खड़े कर दिए हैं कि IBC प्रक्रिया में अदालतों की भूमिका क्या है? हालांकि कोर्ट ने कानूनी नियमों के अनुसार फैसला दिया, लेकिन अब इससे एक ऐसी मिसाल (Precedent) बन गई है, जहां बड़ी कंपनियां सस्ते दामों पर संपत्तियां खरीद सकती हैं, और बाद में उनसे भारी मुनाफा कमा सकती हैं. इससे लोगों को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा है कि क्या अदालतें सिर्फ कानून देख रही हैं, या न्याय भी कर रही हैं?

बड़ी तस्वीर: क्या कॉरपोरेट मुनाफा जनता के हित से बड़ा है?

DHFL-पिरामल मामला अकेला नहीं है, ऐसी ही घटनाएँ IBC (इंसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड) के अन्य मामलों में भी देखने को मिली हैं, जहां बड़ी कंपनियां संकट में पड़ी संपत्तियां सस्ते दामों पर खरीदकर बाद में उनसे बड़ा मुनाफा कमा लेती हैं. इससे भारत के दिवालियापन नियमों की प्रभावशीलता और न्यायसंगतता पर सवाल उठ रहे हैं. अगर ये ट्रेंड्स जारी रहे, तो IBC एक ऐसा सिस्टम बन सकता है जो कुछ बड़े कॉर्पोरेट्स को फायदा पहुंचाए, जबकि बैंक, जमाकर्ता और छोटे निवेशक पीछे रह जाएं. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या IBC वास्तव में अर्थव्यवस्था की सेवा करता है, या यह सिर्फ कॉर्पोरेट मुनाफे के लिए एक औजार बनकर रह गया है?

(लेखक- पलक शाह, "द मार्केट माफिया - क्रॉनिकल ऑफ इंडिया’s हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कबाल दैट वेंट स्कॉट-फ्री" किताब के लेखक हैं. पलक शाह पिछले दो दशकों से मुंबई में पत्रकारिता कर रहे हैं. उन्होंने द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन जैसे प्रमुख पिंक पेपरों में काम किया है. वह 19 साल की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग से जुड़े थे, लेकिन कुछ सालों में इस क्षेत्र में काम करने के बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि अपराध की संरचना बदल चुकी थी और वह संगठित गिरोह, जैसा कि मुंबई ने 80 के दशक में देखा था, अब अस्तित्व में नहीं थे.  'व्हाइट मनी' अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को समझने के उनके जुनून ने पलक को वित्त और नियामकों की दुनिया में पहुंचा दिया.)
 

 


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