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संविधान में सुधार से पहले जरूरी है संसद की आचार संहिता, न्यायपालिका, कार्यपालिका में बदलाव

कोई भी संविधान तभी प्रभावी होता है जब इसे चलाने वाले लोग अपनी जिम्मेदारियां समझें. तभी संसद, न्यायपालिका और कार्यपालिका बेहतर काम कर सकते है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

किसी भी कानूनी दस्तावेज़, चाहे वह किसी देश का संविधान ही क्यों न हो, आखिरकार सिर्फ एक दस्तावेज़ होता है. इसे असली ताकत तब मिलती है जब इसे ईमानदारी से लागू किया जाए, न कि केवल इसे बनाने वालों की मूल सोच से, जैसा कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर – जो हमारे संविधान के मुख्य निर्माताओं में से एक थे – ने कहा था, एक खराब लिखा गया संविधान भी अच्छा साबित हो सकता है अगर इसे लागू करने वाले लोग अच्छे हों. इसके विपरीत, एक बेहतरीन लिखा गया कानून भी निष्प्रभावी हो सकता है अगर इसे लागू करने वाले लोग इसके मूल सिद्धांतों को न मानें. 

संविधान में बदलाव को गलत न समझें

संविधान को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए उसमें लचीलापन होना चाहिए और समय के साथ बदलावों को स्वीकार करना चाहिए. इसलिए, संविधान में बदलाव (संविधान संशोधन) को नकारात्मक नजरिए से नहीं देखना चाहिए, खासकर जब यह समाज को नई परिस्थितियों के अनुसार ढालने के लिए किया जाए. यही कारण है कि संविधान में बदलाव के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया दी गई है.  

संसद की गिरती साख

लेकिन संविधान संशोधन हमारे लिए सबसे बड़ी चिंता नहीं होनी चाहिए. संसद के हाल ही में संपन्न सत्र ने एक बड़ी समस्या की ओर इशारा किया: हमारे सांसदों की गंभीरता की कमी. सालों से लगातार विरोध और बाधाओं ने संसद को लगभग निष्क्रिय बना दिया है. संसद, जो गंभीर विचार-विमर्श के लिए है, अब अंदर से ही बाधित होकर अपने मूल कार्य को पूरा नहीं कर पा रही है. विपक्ष यह नहीं समझता कि अगर वह संसद को काम नहीं करने देगा, तो वह सरकार को बिना किसी जवाबदेही के छोड़ देगा.

पहला सुधार: सांसदों के लिए आचार संहिता

इसलिए, सबसे पहली आवश्यकता है कि हमारे सांसदों के लिए एक आचार संहिता बनाई जाए. उन्हें इसके लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, खासकर जब संसद चलाने में प्रति मिनट 2.5 लाख रुपये खर्च होते हैं! दूसरी बड़ी सुधार न्यायपालिका से जुड़ी है. यह और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे संसद में बहस के लिए उठाए जाने चाहिए थे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका क्योंकि बहस सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में बदल गई. हम एक सुनहरा मौका गंवा बैठे, जिसमें नागरिक और राज्य के बीच के संबंधों और न्यायपालिका की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हो सकती थी. 

दूसरा सुधार: न्यायपालिका में सुधार

हमारे संविधान की प्रस्तावना में सभी नागरिकों को “न्याय – सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक” देने की बात कही गई है. लेकिन यह कैसे संभव है जब वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में 71,411, उच्च न्यायालयों में 60 लाख, और निचली अदालतों में 4.1 करोड़ मामले लंबित हैं? एक केस को अंतिम निर्णय तक पहुंचने में सालों या दशकों लग जाते हैं. जज लंबी-लंबी व्याख्याएं देते हैं, लेकिन ठोस राहत देने या वास्तविक नुकसान की भरपाई करने में देर कर देते हैं. इससे गलत करने वाले सालों तक अपने गलत कामों के साथ बच निकलते हैं. अनुबंधों को लागू करने में देरी कानून के शासन की मूल अवधारणा को नुकसान पहुंचाती है. यह विफलता देश को आर्थिक वृद्धि और विदेशी निवेश के मामले में भारी नुकसान पहुंचाती है. 

संसद में बहस के दौरान हमें उम्मीद थी कि हमारे सांसद इस स्थिति में सुधार के उपायों पर चर्चा करेंगे. क्या हमें और अधिक जजों की जरूरत है? क्या अदालत की प्रक्रियाओं को सुधारने की जरूरत है? क्या मुकदमों को जल्दी निपटाने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए? क्या अदालत में स्थगन (Adjournments) की संख्या पर सीमा लगनी चाहिए? क्या जजों को बेहतर बुनियादी ढांचा मिलना चाहिए? क्या हाल ही में आपराधिक कानूनों में हुए बदलाव – जैसे भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, जो पुराने कानूनों की जगह ले रहे हैं – मदद करेंगे?  

तीसरा सुधार: कार्यपालिका की जवाबदेही

एक सार्थक बहस संसद के बाहर भी बड़े पैमाने पर चर्चा को प्रेरित कर सकती थी, और न्यायपालिका तथा सरकार को इस पर कार्रवाई करने के लिए मजबूर कर सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. तीसरा सुधार एक विशाल, अनियंत्रित कार्यपालिका से संबंधित है. यह एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन यह मुख्य रूप से हमारी निष्क्रिय न्यायपालिका और संसद का परिणाम है. कार्यपालिका का प्रदर्शन तभी सुधरेगा जब राज्य के अन्य दो अंग – न्यायपालिका और संसद – बेहतर काम करेंगे और इसे जवाबदेह ठहराएंगे. 

अंत में, सुधार की शुरुआत खुद से

आखिरकार, कोई भी संविधान उतना ही अच्छा है जितने अच्छे लोग उसे चलाते हैं. संवैधानिक सुधार तभी सफल होगा जब इसके साथ-साथ लोगों का दृष्टिकोण और व्यवहार भी बदले. राज्य के तीनों अंग तभी बेहतर काम करेंगे जब उनके लोग अपने संवैधानिक कर्तव्यों को समझें, निष्पक्ष रहें, और अपनी सीमाओं का सम्मान करें. जैसा कि कन्फ्यूशियस ने कहा था, राज्य का सुधार व्यक्ति के सुधार से शुरू होता है!

(लेखक- हरदयाल सिंह, इनकम टैक्स के मुख्य आयुक्त रह चुके हैं और "मोरल कंपास- फाइंडिंग बैलेंस एंड पर्पस इन एन इम्परफेक्ट वर्ल्ड" (हार्पर कॉलिन्स इंडिया, 2022) के लेखक हैं.)
 


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