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जलवायु संकट पर दुनिया से मुंह चुराने की एक और असफल कोशिश है 'Baku COP29'

COP-29 का समापन, मामूली प्रगति के साथ, अमीर देशों ने 2035 तक हर साल 300 अरब डॉलर जुटाने का वादा किया. इसे भारत सहित विकासशील देशों ने नाकाफी और अनुचित करार दिया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

COP-29 (क्लाइमेट चेंज सम्मेलन) का आयोजन बाकू में हुआ और 24 नवंबर को इसका अंत हो गया, लेकिन पिछले COP-28 की तरह, इस बार भी कुछ खास हासिल नहीं हुआ. ऊर्जा भंडारण और ट्रांसमिशन ग्रिड्स पर कुछ समझौते हुए, लेकिन जलवायु आपदाओं के बढ़ते खतरे के सामने जश्न मनाने जैसा कुछ नहीं था. आखिरी दिन का माहौल (24 नवंबर) काफी खराब रहा. इसे सिर्फ असफलता नहीं, बल्कि "विश्वासघात" कहा गया, जैसा कि एलडीसी (कम विकसित देशों) के समूह ने कहा. भारत ने अंतिम समझौते के पहले अपनी बात रखने की कोशिश की, लेकिन मेजबान देश के अध्यक्ष मोख्तार बाबायेव ने उनकी बात सुने बिना घोषणा कर दी कि "अमीर देश 2035 तक हर साल $300 बिलियन जुटाएंगे."  
 
यह 11 साल तक इतनी छोटी और नाकाफी रकम जुटाने का वादा, एक क्रूर मजाक जैसा लगा. भारत ने तुरंत इस "अनुचित तरीकों से बनाए गए समझौते" को खारिज कर दिया. अन्य विकासशील देशों ने भी यही कहा. ये देश भारत की ओर उम्मीद लगाए बैठे थे कि वह ‘ग्लोबल साउथ’ का नेता होने के नाते उनकी मांगें पूरी करवाएगा. इन देशों ने सम्मेलन की शुरुआत में हर साल 1.3 ट्रिलियन डॉलर की वित्तीय मदद की मांग की थी. लेकिन इन सभी विरोधों को सिर्फ रिकॉर्ड में शामिल किया गया, कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.

भारत ने सच में जलवायु परिवर्तन पर काम करने में बेहतरीन रिकॉर्ड दिखाया है. यह G-20 का अकेला देश है जो पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा करने में सही प्रगति कर रहा है. 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य, इंटरनेशनल सोलर अलायंस का नेतृत्व, इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को बढ़ावा, और उद्योग में ऊर्जा दक्षता बढ़ाने के मजबूत कार्यक्रम भारत के शानदार काम को दिखाते हैं. भारत ने दुनिया को साबित कर दिया है कि "सतत विकास और आर्थिक वृद्धि साथ-साथ हो सकते हैं."

कुछ देशों ने इस मामूली आश्वासन पर खड़े होकर ताली बजाई. यूरोपीय संघ (EU) के जलवायु दूत ने खुद की तारीफ करते हुए कहा,  "COP29 को जलवायु वित्त (Climate Finance) में नए युग की शुरुआत के रूप में याद किया जाएगा. EU इसका नेतृत्व करेगा और हमें विश्वास है कि सालाना 1.3 ट्रिलियन डॉलर का महत्वाकांक्षी और व्यावहारिक लक्ष्य हासिल होगा."

पहले दिन से ही इस लंबे सम्मेलन से ज्यादा उम्मीद नहीं थी, क्योंकि मेजबान देश ने कई फॉसिल फ्यूल (पारंपरिक ईंधन) उद्योग के प्रमुखों को वीआईपी मेहमान के रूप में बुलाया था. उनकी शुरुआती स्पीच में "फॉसिल फ्यूल को भगवान का तोहफा" बताया गया. बाकू की 30 किलोमीटर लंबी मरीना में इन भारी-भरकम एजेंडों और भाषणों को ठिकाने लगाने के लिए काफी जगह है!

पहली COP (Conference of Parties) 1995 में बर्लिन में आयोजित हुई थी. यह सम्मेलन UNFCCC (United Nations Framework Convention on Climate Change) के तहत जलवायु परिवर्तन पर निर्णय लेने का सबसे बड़ा मंच है. 1997 में हुए क्योटो प्रोटोकॉल पर लगभग 200 देशों ने हस्ताक्षर किए थे. इसका उद्देश्य था, सभी देशों से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती की गारंटी लेना, प्रगति पर निगरानी रखना और गरीब देशों को फॉसिल ईंधन से नवीकरणीय ऊर्जा में बदलाव के लिए अमीर देशों से फंड दिलवाना.  

इसका उदार उद्देश्य था पृथ्वी के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना. इससे ज्यादा गर्मी बढ़ने पर मानव और पशु/समुद्री जीवन, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरे होंगे. लेकिन, दुर्भाग्य से, प्रगति बहुत धीमी रही है. अब तक की 29 COPs, जो दुनिया भर में हुईं, केवल भव्य आयोजनों के रूप में देखी गईं. हजारों प्रतिनिधि, राज्य प्रमुख, सरकारें, और बाहर प्रदर्शनकारी; शानदार भाषण, बड़े-बड़े एजेंडे, लंबी बहसें, भव्य भोज, और द्विपक्षीय बैठकों से भरी रहीं. लेकिन, "ऊर्जा परिवर्तन के लिए खरबों डॉलर कौन देगा?" इस पेचीदा सवाल का अब तक हल नहीं हुआ. 

बाकू में, संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने इसे "जलवायु विनाश की मास्टर क्लास" कहा. 2024 में वैश्विक उत्सर्जन में 1.3 प्रतिशत वृद्धि हुई (UNEP रिपोर्ट 2023). अगर यह दर जारी रही, तो 2100 तक पृथ्वी का तापमान 3.1 डिग्री बढ़ जाएगा, और हम सब एक जली हुई दुनिया में रहेंगे. फिर भी, यूनाइटेड किंगडम ने 1990 के मुकाबले 2035 तक 81% उत्सर्जन घटाने का बड़ा लक्ष्य रखा है. उन्होंने अपना आखिरी कोयला आधारित पावर प्लांट बंद कर दिया है और 2030 तक गैस प्लांट्स भी पूरी तरह बंद करने की योजना है. इसके अलावा, नए कोयला और गैस भंडार की खोज के लिए लाइसेंस देना भी बंद किया जाएगा.

1985 में, ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे ने पहली बार पृथ्वी की ओज़ोन परत में एक बड़ा छेद खोजा. इसके बाद 1987 में मॉन्ट्रियल बैठक हुई, जिसमें 197 देशों ने एक प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए. इसे अब तक का सबसे सफल वैश्विक पर्यावरणीय कदम माना जाता है. इस प्रोटोकॉल ने लगभग 100 रसायनों के उपयोग और उत्पादन पर प्रतिबंध लगाया, जो ओज़ोन परत को नुकसान पहुंचाते थे. ये रसायन मुख्य रूप से एयर कंडीशनिंग, रेफ्रिजरेशन और इन्सुलेशन फोम में उपयोग होते थे, जैसे हाइड्रो क्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFCs) और क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs). 

उस समय, कई अमीर यूरोपीय देशों ने स्वेच्छा से चार संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों – UNEP, UNDP, UNIDO और वर्ल्ड बैंक – के माध्यम से इन रसायनों को बदलने के लिए धन प्रदान किया. मेरी कंपनी को भी UNDP से फंड मिला था, जिससे हमने पोलियो+ अभियान के लिए वैक्सीन कैरियर और कोल्ड बॉक्स बनाने में इस्तेमाल होने वाले फोमिंग एजेंट्स को बदल दिया.  दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका ने मॉन्ट्रियल और क्योटो प्रोटोकॉल दोनों को मंज़ूरी नहीं दी है. जलवायु परिवर्तन पर कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ (COP) की बैठकें कई देशों में हुई हैं (भारत में 2002 में COP-8 भी हुई थी), लेकिन कभी अमेरिका में नहीं. यह तब और विडंबना बन जाती है जब 1990 में अमेरिका का वैश्विक उत्सर्जन में 36 प्रतिशत हिस्सा था!

पर्यावरणविद चंद्र भूषण ने COP29 के नतीजों पर टिप्पणी करते हुए गांधीजी के 1942 के कुख्यात क्रिप्स मिशन की आलोचना का जिक्र किया है. गांधीजी ने इसे "डूबते बैंक का पोस्टडेटेड चेक" कहा था, और चंद्र भूषण मानते हैं कि यह COP29 के परिणाम को पूरी तरह से दर्शाता है. वह आगे कहते हैं, "यह आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि विकसित देशों ने 2009 में यह वादा किया था कि वे 2020 तक हर साल $100 बिलियन देंगे. लेकिन यह लक्ष्य वे दो साल बाद 2022 में पूरा कर सके, और तब भी – इसे और खराब करने के लिए – 70% धनराशि बहुपक्षीय ऋणों के रूप में बाजार दरों पर दी गई! जिन देशों को अरबों देने में दिक्कत हुई उनसे खरबों की उम्मीद करना कभी भी व्यावहारिक नहीं था."

UNEP की एक रिपोर्ट कहती है कि "वर्तमान आर्थिक व्यवस्था वास्तव में विकासशील देशों की जलवायु कमजोरियों से लाभ कमा रही है." यानी, उन्हें ग्रांट (अनुदान) देने की बजाय ऋण दिया जाता है, और फिर उन पर ब्याज चुकाने का बोझ डाल दिया जाता है. अमीर देश भूल जाते हैं कि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है और यह उन्हें भी नुकसान पहुंचाती है. लेकिन उनके पास इन चुनौतियों से निपटने के साधन हैं, जबकि गरीब देशों के पास नहीं. वे यह भी भूल जाते हैं कि इस समस्या को उन्होंने खुद अपने तेजी से औद्योगिकीकरण के कारण पैदा किया, जबकि विकासशील देशों ने तो अब जाकर मैन्युफैक्चरिंग पर ध्यान देना शुरू किया है.

एक आम इंसान के लिए, अब तक सभी COP बैठकों में असली समस्या यह रही है कि अमेरिका और अन्य अमीर देश विकासशील देशों को जीवाश्म ऊर्जा को छोड़ने में मदद करने के लिए खर्च उठाने से इनकार करते हैं. वे हमेशा इस बात पर जोर देते हैं कि सबसे बड़े GHG (ग्रीनहाउस गैस) उत्सर्जक देशों – जैसे चीन, अमेरिका, भारत, EU, रूस, इंडोनेशिया, ब्राजील, जापान, ईरान और कनाडा – को अपने उत्सर्जन के अनुपात में फंड देना चाहिए, न कि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के आधार पर!

वास्तव में, हम एक देश के रूप में ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) के तीसरे सबसे बड़े उत्सर्जक हैं, लेकिन प्रति व्यक्ति आधार पर (टन में GHGs) तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है. UNEP की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, हमारा आंकड़ा 4,140 है – जो दुनिया के कुल उत्सर्जन का केवल आठ प्रतिशत है. यही सवाल – ‘प्रति व्यक्ति उत्सर्जन या प्रति देश उत्सर्जन?’ – पिछले तीन दशकों से सभी COP बैठकों में विवाद का कारण रहा है. 

अमीर देशों ने अपने औद्योगिकीकरण के जरिए सबसे ज्यादा नुकसान किया है. उन्हें अब ज्यादा मैन्युफैक्चरिंग की ज़रूरत नहीं है, लेकिन भारत जैसे विकासशील देशों को अभी अपनी बुनियादी ढांचा और मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां बढ़ानी हैं, जिससे उनका उत्सर्जन बढ़ेगा. अमीर देश अपनी "ऐतिहासिक जिम्मेदारी" के प्रति पूरी तरह से लापरवाह हैं. उन्होंने पृथ्वी के वातावरण में अरबों टन CO2 जमा कर दी है और अब गरीब देशों द्वारा किए जा रहे थोड़े से उत्सर्जन पर बहस कर रहे हैं.

आशा है कि COP-30 में बेहतर समझदारी दिखेगी और अमीर देश ‘प्रति व्यक्ति’ के सिद्धांत को स्वीकार करेंगे और उसी आधार पर योगदान देंगे. यह उनके लिए अपने पुराने पापों का प्रायश्चित करने का मौका है. दुनिया की 91-92 प्रतिशत आबादी – विकासशील देशों में रहने वाले (83 प्रतिशत) और अत्यंत गरीबी में जीने वाले (8.5 प्रतिशत) – न्याय की प्रार्थना कर रहे होंगे.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

(लेखक- कृष्ण कालरा, भारतीय कैंसर सोसाइटी, दिल्ली की प्रबंध समिति के सदस्य हैं और राजीव गांधी कैंसर संस्थान और अनुसंधान केंद्र की गवर्निंग काउंसिल के सदस्य रह चुके हैं. वह एआईएमए (AIMA) के पूर्व अध्यक्ष हैं और IIMC के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के पूर्व सदस्य भी रहे हैं.)
 


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