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क्या अब देश के वित्तीय हालात सर्वे से जानेंगे हम?

मौजूदा वक्त में देश की अर्थव्यवस्था चंद पूंजीपतियों के हाथ में सिमटती जा रही है और आम नागरिक के हाथ से सब निकलता जा रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • अजय शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार

पिछले लंबे वक्त से हम आपको देश की आर्थिक दशा और उसके आमजन पर पड़े प्रभाव से अवगत करा रहे हैं. मुख्य विपक्षी दल के नेता राहुल गांधी से लेकर देश दुनिया के तमाम अर्थशास्त्री जो भारत के प्रति सहनुभूति रखते हैं, भी वास्तविक हालात बयां कर रहे हैं. अब ऐसे सर्वे सामने आए हैं, जो इस चिंता को और भी अधिक बढ़ाने वाले हैं. एक देश में बेरोजगारी की दर और दूसरी आमजन की आमदी की सर्वे रिपोर्ट. मौजूदा वक्त में देश की अर्थव्यवस्था चंद पूंजीपतियों के हाथ में सिमटती जा रही है और आम नागरिक के हाथ से सब निकलता जा रहा है. एक ताजा सर्वे रिपोर्ट वित्तीय सुरक्षा सूचकांक मनी9 की सामने आई है. यह भारत का पहला राज्य रैंकिंग नागरिक वित्तीय सुरक्षा संस्था है. यह सर्वे स्पष्ट करता है कि भारत कैसे कमाता है, खर्च करता है और बचाता है. इस व्यक्तिगत वित्त सर्वे ने देश की वित्तीय व्यवहार की गतिशीलता के बारे में आंखें खोलने वाले तथ्यों का खुलासा किया है. सर्वे में स्पष्ट किया गया है कि भारत में लगभग 69 फीसदी परिवार मौजूदा वक्त में वित्तीय असुरक्षा और असमानता का संघर्ष झेल रहे हैं.

इसलिए और चिंताजनक हुए हालात
हमने आपको पिछले सप्ताह बताया था कि लेखा महानियंत्रक ने अपने आकड़ों में स्पष्ट किया था कि चालू वित्तवर्ष की पहली छमाही (अप्रैल से सितंबर) के बीच सरकार ने 18.24 ट्रिलियन रुपए खर्च किए हैं, जिससे भारत का राजस्व घाटा तब भी बढ़ा जबकि देशवासियों की जेब से अधिकतम कर वसूला गया. जो वित्तीय हालात को और भी चिंताजनक बनाता है. यह सरकार के अकुशल वित्तीय प्रबंधन को भी स्पष्ट करता है. राजकोषीय घाटे के नतीजे, आने वाले वित्तीय बोझ का प्रतीक हैं. हमारी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी वैश्विक मंच मान चुकी हैं कि डॉलर मजबूत होने से रुपया कमजोर हुआ है. वित्तीय सुरक्षा सूचकांक मनी9 के सर्वे से उन तथ्यों को बल मिला है, जिसकी आशंका लगातार हम व्यक्त करते रहे हैं. कोरोना महामारी के बाद देश आर्थिक तौर पर जर्जर हुआ है, भले ही सरकार के करीबी कुछ पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों की कमाई भले तेजी से बढ़ी हो मगर आमजन की कमाई पर नकारात्मक असर ज्‍यादा हुआ है.

औसत मासिक कमाई 23 हजार
मनी9 फाइनेंशियल सिक्‍योरिटी इंडेक्‍स के सर्वे के मुताबिक, देश के 69 फीसदी परिवार वित्‍तीय असुरक्षा की स्थिति में हैं. देश के लोगों की कमाई, खर्च और बचत में भारी अंतर आया है. चालू वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही के आखिरी माह यानी सितंबर 2022 में हुए सर्वे में पाया गया कि, देश के 4.2 सदस्‍यों वाले परिवार की औसत मासिक कमाई 23 हजार रुपए है. सबसे चिंताजनक यह है कि 46 फीसदी परिवारों की मासिक कमाई 15 हजार रुपए से भी कम है. देश के 20 राज्‍यों के 1,154 शहरी इलाकों और 100 जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े 31,510 हजार परिवारों पर किए गए सर्वे में यह तथ्य सामने आया है. यह सर्वे मई से सितंबर, 2022 के बीच किया गया. सर्वे से यह भी पता चला कि सिर्फ 3 फीसदी परिवारों की कमाई उच्‍च वर्ग में आती है, जिससे वे विलासिता का जीवन जीते हैं. कोरोनाकाल में यह खाई और भी गहरी हो गई. अधिकतर जरूरतमंदों की हैसियत बचत करने की भी नहीं है. वहीं, 70 फीसदी लोग बचत के लिए बैंकों की सावधि जमा, बीमा, पोस्‍ट ऑफिस बचत योजनाओं और सोने पर अधिक भरोसा करते हैं. बैंकों और पोस्‍ट ऑफिस की योजनाओं को विकल्प के रूप में 64 फीसदी लोग अपना धन लगाने को मजबूर हैं.

बेरोजगारी दर में बढ़ोत्तरी
सीएमईआई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी) के ताजा आंकड़े इस सर्वे रिपोर्ट का समर्थन करते नजर आते हैं. इसके मुताबिक, चालू वित्तीय वर्ष के पिछले माह यानी अक्टूबर 2022 में, भारत की बेरोजगारी दर सितंबर की 6.4 फीसदी से बढ़कर 7.8 फीसदी हो गई है. तकरीबन सवा फीसदी से अधिक बढ़ गई है. यही नहीं ट्विटर जैसी कंपनी अपने नेटवर्क में वर्कफोर्स कम करने में जुट गई है, जो छंटनी और कमाई के मामले में अपने कर्मचारियों को कमजोर कर रही है. उसका घाटा भी बढ़ा है. सीएमआई के आंकड़ों से पता चलता है कि देश के शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 7.2 फीसदी से 7.7 फीसदी हो गई. वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में यह 5.8 फीसदी से बढ़कर 8.04 फीसदी हो गई है. यह श्रम भागीदारी के लिए नकारात्मक संदेश है. आपको याद होगा कोरोना महामारी काल में यानी अक्टूबर 2020 और 2021 में ग्रामीण बेरोजगारी 7 फीसदी और दर 7.7 फीसदी रही थी. महामारी से पहले ही अक्टूबर 2019 में यह 8.1 प्रतिशत थी. बड़े महानगरों में कोलकाता और मुंबई नौकरियों में सुधार हुआ मगर दिल्ली सहित आईटी सेक्टर की गति धीमी हुई है. जिससे हैदराबाद, बेंगलुरु और पुणे के टेक हब में भी भर्ती धीमी हुई है. पिछले साल के मुकाबले इसी अवधि में 18 फीसदी की गिरावट आई है. दूरसंचार और स्वास्थ्य सेवाओं में भी भर्तियों में गिरावट देखने को मिली है.

सामाजिक-आर्थिक खाई भी बढ़ी
दुनिया की तमाम यकीनी संस्थाओं के वैश्विक इंडेक्स में भारत लगातार नीचे जा रहा है. इसी कारण सामाजिक आर्थिक खाई भी बढ़ी है, जिससे आपराधिक घटनाओं में भी इजाफा देखा जा रहा है. आमदनी घटने और रोजगार के अभाव में लोग जीवन के प्रति निराशा हो रहे हैं और गलत रास्ते अपना रहे हैं. संसद में दिए गए केंद्र सरकार के जवाब में यह बात सामने आ चुकी है. एक बड़ी समस्या भारत के कृषि उत्पादन में आई गिरावट भी है, जिससे परिवारों को कुपोषण का शिकार होना पड़ रहा है. दूसरी तिमाही में धातु और खनन कंपनियों को दूसरी तिमाही में तगड़ा झटका लगा है. इनके मुनाफे में गिरावट का कारण इन कंपनियों के संचालन खर्च में बढ़ोत्तरी के साथ बिक्री में गिरावट हुई है. जिससे इन क्षेत्रों में रोजगार भी कम हुआ है. इस तिमाही में बिजली और ईंधन खर्च 8.8 फीसदी हो गया है. दूसरी तरफ, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने अपनी डिजिटल करेंसी की शुरुआत कर दी है. वित्तीय क्षेत्र में भी दूसरे तमाम क्षेत्रों की ही तरह डिजिटलीकरण थोपा जा रहा है. बैंक शाखाएं बंद हो रही हैं और नकदी को नीचे धकेला जा रहा है. नकदी को खत्म करने के लिए ही उसके लेनदेन को खत्म किया जा रहा है, क्योंकि इससे बड़े पूंजीपतियों को लाभ मिलता है. नकदी विहीन राज्य में आमजन के लिए तमाम व्यवहारिक संकट सामने आ जाते हैं. नकदी, ही व्यक्तिगत स्वायत्तता का आखिरी प्रतीक बचा है.

अर्थशास्त्रियों को इस बात के चिंता 
अर्थशास्त्रियों की चिंता यह है कि सरकार मूल रोग का इलाज करने की दिशा में काम करने के बजाय वोटबैंक की राजनीति को साधने पर खर्च करके न सिर्फ अपना बल्कि देश के आम नागरिक और अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचा रही है. पता नहीं क्यों, सरकार के नीति नियंता स्वयं अपने आंकड़ों से सच निकालकर वास्तविक समस्या को हल नहीं कर रहे. वित्त मंत्रालय आंकड़ों-सर्वे में से बदहाल अर्थव्यवस्था को जान पाता है. शायद यही वजह है कि आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास कहने को मजबूर हो गए कि महंगाई पर काबू पाना उनके बस में नहीं है. इस साल रिजर्व बैंक ने महंगाई को काबू में करने के लिए 4 बार रेपो रेट की वृद्धि की थी. मॉनेटरी पॉलिसी का ध्यान महंगाई को काबू में लाना है, मगर वो इस पर काम ही नहीं कर रहे. जरूरत आंकड़ों का गहनता से अध्ययन करने के बाद देश की अर्थव्यवस्था को जमीनी तौर पर मजबूत करने के लिए काम करने की है. सर्वे रिपोर्ट्स से सच जाना जा रहा हो, तो तय है कि अथॉरिटीज को कुछ दिखता नहीं है. राज्यों की अर्थव्यवस्थाएं भी भारी कर्जे से चल रही हैं. देश के बड़े पूंजीपति भी पूंजीबाजार और बैंकों से जमकर कर्ज उठा रहे हैं, जिससे राज्यों पर कर्ज बहुत बढ़ चुका है. यही सोच घातक हो रही है.
 


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