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वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत स्थिर, कूटनीति से संभली ऊर्जा सप्लाई
प्रदीप भंडारी लिखते हैं, भारत आज न केवल वैश्विक व्यवधानों से उबरने वाला देश है, बल्कि एक आत्मविश्वासी और सक्षम राष्ट्र के रूप में अपनी राह खुद तय कर रहा है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 month ago
प्रदीप भंडारी
पिछले कई दशकों में पश्चिम एशिया में देखे गए सबसे बड़े वैश्विक तनावों में से एक के बीच. जहां ब्रेंट क्रूड कुछ समय के लिए 120 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया. यूरोपीय शहरों में ईंधन के लिए लंबी कतारें लग गईं. और 85 से अधिक देश पेट्रोल की कीमतों में 10 से 68 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी से जूझ रहे हैं. भारत एक उल्लेखनीय स्थिरता के द्वीप के रूप में खड़ा है. पेट्रोल की कीमतें जस की तस बनी हुई हैं. एलपीजी सिलेंडर बिना किसी रुकावट के 33 करोड़ घरों तक पहुंच रहे हैं. और दो पूरी तरह लदे भारतीय ध्वज वाले टैंकर अभी-अभी सुरक्षित रूप से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को पार कर चुके हैं. जो 92.700 मीट्रिक टन रसोई गैस मुंद्रा और कांडला बंदरगाहों तक लेकर जा रहे हैं.
यह सब संयोग से नहीं हुआ. यह सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शी. धैर्यपूर्ण और सिद्धांत आधारित कूटनीति का परिणाम है. एक रणनीतिक स्वायत्तता का मॉडल. जिसे दुनिया अब प्रशंसा के साथ देख रही है.
बातचीत जिसने दिए परिणाम
जब 28 फरवरी को युद्ध शुरू हुआ. जिससे हॉर्मुज जलडमरूमध्य बंद हो गया. तो दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग लगभग रातोंरात शांत हो गया. सैकड़ों जहाज ईरान और ओमान के बीच संकरे समुद्री मार्ग में फंस गए. लेकिन भारत के लिए. प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिक्रिया तत्काल और दृढ़ थी.
उन्होंने व्यक्तिगत रूप से ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन से संपर्क किया. पश्चिम एशिया की “गंभीर स्थिति” पर चर्चा की. और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा तथा वस्तुओं और ऊर्जा के निर्बाध आवागमन को नई दिल्ली की प्राथमिकता में सबसे ऊपर रखा. साथ ही. भारत के विदेश मंत्री ने अपने ईरानी समकक्ष सैयद अब्बास अराघची के साथ 28 फरवरी. 05 मार्च. 10 मार्च और फिर गुरुवार रात कई दौर की फोन वार्ताएं कीं. इस निरंतर और उच्च आवृत्ति वाली बातचीत ने एक स्पष्ट संदेश दिया. भारत महत्वपूर्ण समय में संवाद से पीछे नहीं हटेगा.
परिणाम तेज और ठोस रहे. शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के दो एलपीजी टैंकर. शिवालिक और नंदा देवी. सुरक्षित रूप से हॉर्मुज जलडमरूमध्य पार कर चुके हैं. और अब भारतीय तटों की ओर बढ़ रहे हैं. भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फतहाली ने इसे साफ शब्दों में कहा. “भारत एक मित्र है.”
यह कूटनीतिक सफलता अचानक नहीं मिली. भारत ने कोच्चि बंदरगाह पर IRIS Lavan को शरण दी. और बाद में 50 से अधिक गैर-आवश्यक क्रू सदस्यों को ईरान वापस भेजा. जबकि बाकी को पूरा समर्थन दिया गया. राजदूत फतहाली ने कहा कि भारत का समन्वय “सहज” था. और नई दिल्ली ने ईरान के अनुरोध को स्वीकार किया “जबकि दुर्भाग्यवश कुछ अन्य देशों ने सहयोग से इनकार कर दिया.”
भारत की मानवीयता ही उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत साबित हुई.
भारतीय घरों की जरूरतें
भारत ने जो हासिल किया है. उसका वास्तविक प्रभाव रसोई स्तर पर सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है. पूरी दुनिया में एलपीजी हॉर्मुज संकट से सबसे अधिक प्रभावित ऊर्जा उत्पाद के रूप में उभरा है. जहां अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने 1.5 मिलियन बैरल प्रति दिन की आपूर्ति बाधित होने का अनुमान लगाया है.
भारत में. जो अपनी अधिकांश एलपीजी खाड़ी देशों से आयात करता है. सरकार की कूटनीतिक सक्रियता ने यह सुनिश्चित किया है कि 33 करोड़ घरों को बिना किसी बाधा के रसोई गैस मिलती रहे. दिल्ली में 14.2 किलोग्राम के एलपीजी सिलेंडर की घरेलू कीमत 913 रुपये है. जो 2013 में यूपीए सरकार के दौरान 1.014 रुपये की तुलना में कम है. जबकि उस समय कोई बड़ा वैश्विक संकट नहीं था.
साथ ही. भारत में पेट्रोल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं. जो अमेरिका में 22 प्रतिशत. कनाडा में 21 प्रतिशत. यूरोप के अधिकांश हिस्सों में 15 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया व चीन में 11 प्रतिशत की वृद्धि के विपरीत है.
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 728 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक है. जिससे यह दुनिया के शीर्ष चार भंडार रखने वाले देशों में शामिल है. इसकी तुलना 1990–91 के खाड़ी युद्ध संकट से करें. जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर मात्र 1.2 अरब डॉलर रह गया था. जो केवल दो से तीन सप्ताह के आयात के लिए पर्याप्त था. और सरकार को 67 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था. आज भारत उसी क्षेत्रीय संकट का सामना मजबूती के साथ कर रहा है. न कि कमजोरी के साथ.
वर्तमान संकट में भारत की मजबूती ऊर्जा नीति में दीर्घकालिक संरचनात्मक बदलाव का भी परिणाम है. पिछले एक दशक में भारत ने अपने ऊर्जा आयात स्रोतों में विविधता लाई है. प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत जिन देशों से कच्चा तेल और ऊर्जा खरीदता है. उनकी संख्या लगभग 26 से बढ़कर करीब 40 हो गई है.
इस विविधता ने किसी एक क्षेत्र या आपूर्तिकर्ता पर निर्भरता कम की है. और भू-राजनीतिक झटकों के दौरान भारत को अधिक लचीलापन दिया है. अमेरिका और लैटिन अमेरिका से लेकर अफ्रीका और मध्य पूर्व तक. भारत की ऊर्जा साझेदारियां अब कई महाद्वीपों में फैली हुई हैं. जिससे पारंपरिक मार्गों में बाधा आने पर भी आपूर्ति स्थिर बनी रहती है.
कोविड समानता, संकट में प्रदर्शन करने वाली सरकार
भारतीय शासन के विद्यार्थियों को एक पैटर्न दिखेगा. कोविड-19 महामारी के दौरान. जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हुईं. भारत ने घरेलू मजबूती और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का वही संतुलन दिखाया जो आज दिखाई दे रहा है. तब भी. और अब भी. नई दिल्ली ने आम नागरिकों के लिए आपूर्ति सुनिश्चित करने को प्राथमिकता दी. आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रण में रखा. और द्विपक्षीय कूटनीति के माध्यम से कठिन वैश्विक परिस्थितियों का सामना किया.
भारत का दृष्टिकोण दीर्घकालिक कूटनीति और संतुलित संवाद की ताकत को दर्शाता है. जहां कई पश्चिमी देशों ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य में नौसेना तैनात करने पर विचार किया. वहीं भारत ने विश्वास, विश्वसनीयता और निरंतर संवाद के बल पर बिना एक भी युद्धपोत भेजे अपने जहाजों की आवाजाही जारी रखी.
यह बढ़ती विश्वसनीयता अब वैश्विक स्तर पर भी स्वीकार की जा रही है. फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने हाल ही में कहा कि दुनिया को युद्धविराम की जरूरत है. और भारत अमेरिका और ईरान के बीच शांति स्थापित करने में भूमिका निभा सकता है.
यह क्षण पश्चिम एशिया में भारत की रणनीतिक नीति की प्रभावशीलता को दर्शाता है. विभिन्न शक्तियों के साथ संतुलित संबंध और खुले संवाद ने भारत को संघर्ष के बीच भी अपने हित सुरक्षित रखने में सक्षम बनाया है.
एक ऐतिहासिक तुलना भी उल्लेखनीय है. 1951 में स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि उत्तर और दक्षिण कोरिया के युद्ध ने भारत में महंगाई बढ़ा दी थी. और इसका असर आम लोगों पर पड़ा था.
सात दशक बाद. एक और बड़े वैश्विक संकट के दौरान. भारत ने अधिक मजबूती और दूरदर्शिता के साथ प्रतिक्रिया दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ने ऊर्जा स्रोतों में विविधता. मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और सक्रिय कूटनीति के माध्यम से अपने नागरिकों को वैश्विक अस्थिरता से बचाया है.
परिणामस्वरूप, भारत आज केवल वैश्विक संकटों से उबरने वाला देश नहीं. बल्कि एक आत्मविश्वासी और सक्षम राष्ट्र के रूप में अपनी राह खुद तय कर रहा है.
अस्वीकरण. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं. और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों
अतिथि लेखक- प्रदीप भंडारी
(प्रदीप भंडारी भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं.)
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