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Air Force Day Special: आपदा में घिरा उत्तराखंड, हर तरफ तबाही और वो रेस्क्यू ऑपरेशन
भारतीय वायु सेना दिवस हर साल 8 अक्टूबर को मनाया जाता है. आज वायु सेना अपना 90वां स्थापना दिवस मना रही है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
भारतीय वायु सेना (Indian Air Force) जंग के मैदान से लेकर रेस्क्यू अभियानों तक देश की उम्मीदों पर खरी उतरती रही है. हमारी वायु सेना का शानदार और गौरवपूर्ण इतिहास रहा है. आज यानी 8 अक्टूबर को भारतीय वायु सेना अपना 90वां स्थापना दिवस मना रही है. 'एयरफोर्स डे' के मौके पर रिटायर्ड विंग कमांडर हंसा दत्त लोहानी ने अपने उस अनुभव को BW हिंदी के साथ साझा किया, जब वह केदारनाथ आपदा के दौरान राहत एवं बचाव दल का हिस्सा था. जिसे हम उन्हीं के शब्दों में आपके सामने रख रहे हैं.
चक्कर लगाते हेलीकॉप्टर
केदारनाथ आपदा से उत्तराखंड को बहुत बड़ा घाव मिला. इस दौरान मुझे राहत व बचाव कार्य करने का पुण्य प्राप्त हुआ था. पवित्र मंदिर के चारों ओर होटलों व दुकानों का घेरा बन चुका था, दो मंजिल ऊंचा, पत्थर से बना लगभग एक हजार साल पुराना मंदिर इन आधुनिक ईंट सीमेंट की इमारतों में विलीन हो गया था. जलेबी की तरह गोल चक्कर लगाते हेलीकॉप्टर, पक्का पगडंडी मार्ग, घोड़े खच्चरों की दिन रात टप-टप के सामने पंद्रह किलोमीटर का पैदल सफर व दस हजार फीट की ऊंचाई गौंण हो गई थी. अभी तक एक ही बार तीसरा नेत्र खुलने की कहानी सुनी थी जब आग बरसी और कामदेव भस्म हो गए. तीसरा नेत्र फिर खुल गया, यह दूसरी बार था - अब पानी बरसा, बरसा, बरसता ही रहा और फिर सैलाब फूट पड़ा.
तहस-नहस हो गया था तंत्र
कल-कल करती धाराओं ने देखते ही देखते भोलेनाथ की खुली जटाओं सा विकराल रूप धर लिया, कुछ पलों के लिए भोलेनाथ ने गंगा जी को मुक्त कर दिया, इनके रास्ते में जो भी पड़ा टिक न सका. इंसान, जानवर, दुकानें, भवन सब धराशायी होने लगे. सूचना तंत्र भी तहस-नहस हो गया. दो दिन बाद हेलीकॉप्टर से मुआयना करते हुए एक पायलट को नुकसान का अंदाजा हुआ और भारतीय वायु सेना के इतिहास में सबसे बड़ा हवाई बचाव कार्य आरंभ हुआ. जोधपुर से मेरा स्थानांतरण आदेश आ चुका था, 18 जून 2013 की शाम मुझे अपने ऑफिस से विदाई दी जा रही थी, अगली सुबह का जोधपुर से हैदराबाद का हवाई टिकट मेरी जेब में था. समारोह के मध्य ही मेरा मोबाइल बजा, फोन पर ही कमांड हेडक्वाटर का आदेश हुआ कि कल सुबह एक हेलीकॉप्टर देहरादून के लिए भेजो. अब तक केदारनाथ की खबरें आने लगी थीं पर भयावहता का अंदाज नहीं था. पहला ख्याल यही आया कि उत्तराखंड - अपनी जन्मभूमि की सेवा का अवसर आया है, इतने साल जो काम सीखा है अपने लोगों की सेवा में न्योछावर कर सकूंगा. मैंने कहा 'ठीक है, मैं स्वयं जाऊंगा'.
नहीं दिख रही थी जमीन
अगली सुबह हेलीकॉप्टर का मुंह जोधपुर से देहरादून को मोड़ लिया. देहरादून पहुंचते-पहुंचते लगने लगा कि भोलेनाथ पूरे उत्तराखंड से ही रूठे हुए हैं. पांच सौ फीट की ऊंचाई से नीचे की जमीन नहीं दिख रही थी, ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे संपूर्ण क्षेत्र में राख बिखरी हुई है. देहरादून से ब्रीफिंग लेकर केदारनाथ को कूच किया. दिन में भी श्यामल, पहाड़ों के बीच धुंध में रास्ता खोजते, करीब चालीस अन्य हेलीकॉप्टरों से बचते-बचाते केदारनाथ जी के चरणों में प्रणाम किया. हेलीकॉप्टर की गड़गड़ाहट के बाजूद मानवीय भूलों पर क्षमा मांगती प्रकृति में अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था पर मेरे लिए बाबा भोलेनाथ ने कुछ और ही सोचा होगा, दूसरे ही दिन आदेश आ गया कि बागेश्वर पहुंचो. सरयू और गोमती नदी के संगम पर स्थित यह छोटा शहर हरे-भरे पहाडों की घाटी में स्थित है. यहां केदारनाथ मंदिर के काल की उसी शैली के मंदिर में भगवान शिव बागेश्वर रूप में स्थापित हैं. पवित्र नदियों का संगम इस स्थान को प्रयागराज जितना ही तीर्थ फलदाई बनाता है.
घबराए लोगों को मिली राहत
डिग्री कालेज के मैदान में उतरते ही विधायक ललित फर्सवाण और जिलाधिकारी मनराल ने जमीनी स्थिति व नुकसान की जानकारी दी. पिंडर घाटी में पुल टूटने से गांव कट गए, निचले क्षेत्र के इलाकों में जानमाल की हानि भी हुई थी. सहायता एजेंसियों का सारा ध्यान केदार घाटी में ही केंद्रित था, इन इलाकों की सुध किसी को नहीं थी. सरकारी उपेक्षा से परेशान विधायक, प्रशासन व लोगों को बहुत राहत मिली जब उन्हें पता चला कि मैं पास ही के गांव का रहने वाला हूं, बागेश्वर में ननिहाल है तथा आपदाग्रस्त इलाके से भलीभांति परिचित हूं. ताकुला-सोमेश्वर से तत्कालीन विधायक और पूर्व राज्यमंत्री अजय टम्टा की मौजूदगी से राहत मिली. अपने राजनीतिक जीवन में लोगों से उनका सीधा जुड़ाव है, अक्सर पैदल ही वे पूरे इलाके का सघन भ्रमण करते हैं. अपने पूर्व अनुभव के आधार पर उन्होंने आपदाग्रस्त इलाके पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए जो बहुत सार्थक रहे और खराब मौसम के बावजूद प्लानिंग में बहुत उपयोगी साबित हुए.
15 दिन तक पहुंचाई राहत
बिना समय गवांए मैंने हेलीकॉप्टर में राहत सामग्री भरवाई, इंजन चालू किए. बादलों से बचते, कम दृश्यता से जूझते पिंडर नदी के ऊपर एक घंटे की उड़ान भरकर बदियाकोट पहुंचा. हेलीकॉप्टर से नीचे उतरकर पांच दिनों से दुनिया से कटे त्रस्त व भयभीत लोगों के समूह के सामने पहुंचकर वहीं की बोली में हाल पूछना शुरू किया. मेरी बातों से धीरे-धीरे पीले पड़े चेहरों पर विश्वास की चमक बढ़ने लगी, मैं लोगों के पीले चेहरों पर बदलते रंग को साफ देख पा रहा था. विधायक ने मुझसे बीमार व जरूरतमंद लोगों को बागेश्वर ले जाने की बात कही जिसे मैंने स्वीकार किया. इस हामी ने माहौल ही बदल डाला, जनसमूह की हर्षध्वनि और तालियों से निराशा उम्मीद में बदल गई. बादल, खराब मौसम व कम दृश्यता से भरे माहौल में लगभग पंद्रह दिन मैंने बागेश्वर में बिताए. इस दौरान कई सौ ज़रूरतमंदों को दवाई व उपचार के लिए बागेश्वर लाया, कई क्विंटल अनाज व कपड़े छोटे-छोटे इलाकों में पहुंचाए. उत्तराखंड की सेवा में रत यह मेरे जीवन का सर्वोत्तम समय रहा है.
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