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डॉ. मनमोहन सिंह : उदारीकरण से परे एक विरासत

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को भारतीय अर्थव्यवस्था में दिए गए उनके योगदान के लिए अक्सर सराहा जाता है. हालांकि, सार्वजनिक क्षेत्र के सुधार में उनके योगदान उतने प्रसिद्ध नहीं हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

डॉ. मनमोहन सिंह एक परिणाम-उन्मुख सार्वजनिक क्षेत्र के प्रबल समर्थक थे. वित्त मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने समझौता ज्ञापन (MOU) नीति पेश की, जिसके तहत केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों (CPSEs) को सरकार के साथ प्रदर्शन अनुबंध (performance contracts) पर हस्ताक्षर करना आवश्यक था. इस नीति का उद्देश्य CPSEs के प्रदर्शन और जवाबदेही को सुधारना था.

कुछ पर्यवेक्षक शायद यह याद नहीं रखते, कि आईएमएफ से उदारीकरण, विकेंद्रीकरण और निजीकरण के दबाव में भारत के केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों (CPSEs) के संदर्भ में, डॉ. मनमोहन सिंह ने केवल उन CPSEs को तत्काल निजीकरण करने पर सहमति दी थी, जो ऐसे क्षेत्रों में थे जहां निजी खिलाड़ी पहले से मौजूद थे और निजीकरण स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का कारण बनेगा. इस प्रकार प्रसिद्ध रूप से, मॉडर्न बेकरीज, वीएसएनएल, बीएएलसीओ आदि का निजीकरण किया गया, लेकिन अन्य सभी CPSEs, जिन्हें 1991 के औद्योगिक नीति संकल्प (IPR) में शामिल किया गया था, उन्हें समझौता ज्ञापन (MOU) नीति के तहत रखा गया. ये MOU प्रदर्शन अनुबंध होते हैं, जिसमें PSU के प्रबंधन से यह अपेक्षाएँ की जाती हैं कि वे मालिक, अर्थात भारत सरकार को स्पष्ट रूप से निर्धारित परिणाम प्रदान करें. यह IPR 1991 के वित्त मंत्री के बजट भाषण में शामिल किया गया था.

डॉ. मनमोहन सिंह ने यह समझा कि समस्या प्रबंधन में नहीं, बल्कि एक सुस्त मालिक-भारत सरकार में थी. 1991 में पेश की गई MOU नीति आज भी प्रभावी और जीवित है. आंकड़ों से यह साबित होता है कि भारत के सार्वजनिक उद्यमों में उद्देश्यों (या परिणामों) द्वारा प्रबंधन की प्रणाली की शुरूआत का गहरा प्रभाव पड़ा और इन उद्यमों की लाभप्रदता और सामान्य प्रदर्शन में सुधार हुआ. यही कारण है कि MOU प्रणाली आज भी भारत सरकार की आधिकारिक नीति है.

बाद में, प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह ने परिणाम-प्रारूप दस्तावेज़ (RFD) नीति पेश की, जिसने प्रदर्शन समझौतों के विचार को सरकारी विभागों तक विस्तारित किया. इस नीति के तहत, विभागीय मंत्रियों और सचिवों को प्रदर्शन समझौतों पर हस्ताक्षर करने की आवश्यकता थी, जिसमें वित्तीय वर्ष के लिए विशिष्ट, मापने योग्य, प्राप्त करने योग्य, प्रासंगिक और समयबद्ध (SMART) लक्ष्य निर्धारित किए गए थे.

इन नीतियों के सकारात्मक प्रभाव के बावजूद, डॉ. सिंह की सरकार को उनके प्रदर्शन के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा. 2010 में, इंडिया टुडे पत्रिका ने एक कवर स्टोरी प्रकाशित की, जिसमें सरकारी मंत्रियों को उनके प्रदर्शन के आधार पर रैंक किया गया था और यूपीए सरकार को 39 प्रतिशत का प्रदर्शन रेटिंग दी गई थी. हालांकि, ये रैंकिंग perception सर्वेक्षणों पर आधारित थीं और सरकार के अपने प्रदर्शन डेटा से मेल नहीं खाती थीं. बाद में यह पाया गया कि सरकारी विभाग प्रधानमंत्री द्वारा निर्धारित और अनुमोदित लक्ष्यों का लगभग 89 प्रतिशत पूरा कर रहे थे. यह अंतर डॉ. सिंह की सबसे बड़ी कमजोरी को उजागर करता है: संचार, जबकि वह सार्वजनिक उद्यमों और केंद्रीय सरकार में प्रदर्शन प्रबंधन प्रणालियों को लागू करने में सफल रहे, वह इन उपलब्धियों को जनता तक प्रभावी ढंग से संप्रेषित करने में असफल रहे.

डॉ. मनमोहन सिंह की धरोहर उनके आर्थिक सुधारों से परे जाती है. वह एक ऐसे सुधारक थे जिन्होंने शासन में परिणाम-उन्मुख दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया. सार्वजनिक क्षेत्र के प्रदर्शन और जवाबदेही को सुधारने के लिए उनके प्रयास उनकी सार्वजनिक सेवा के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण हैं. आज भी ये प्रयास अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वोत्तम प्रथाएँ मानी जाती हैं.

लेखक-डॉ. प्रजापति त्रिवेदी, वर्तमान में प्रबंधन विकास संस्थान (MDI) में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं. उन्होंने डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भारत सरकार में कैबिनेट सचिवालय में सचिव और जब डॉ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे, तब सार्वजनिक उद्यम विभाग में भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार के रूप में कार्य किया. 


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