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Shabaash Mithu Review: क्यों हर किसी को जरूर देखनी चाहिए ये फिल्म

Shabaash Mithu Review: डांस टीचर के टिप्स के सहारे नूरी ने मिथु को अच्छा बैट्समैन बना दिया, जिसपर एक दिन कोच संपत की नजर पड़ जाती है. जानिए क्यों देखनी चाहिए ये फिल्म.

चंदन कुमार 4 years ago

फिल्म: Shabaash Mithu
मुख्य कलाकार: तापसी पन्नू, विजय राज, इनायत वर्मा, कस्तूरी जगनाम, मुमताज सोरकार
निर्देशक: सृजित मुखर्जी
निर्माता: अजीत अंधारे
रेटिंग: 3.5/5

'ये मैदान भी एक जिंदगी की तरह है. यहां सारे दर्द छोटे हो जाते हैं, बस खेलना बड़ा होता है.' कोच संपत (विजय राज) का ये गुरुमंत्र मिताली राज (तापसी पन्नू) की पूरी जिंदगी बदल देती है. भारतीय महिला क्रिकेट टीम की पूर्व कप्तान मिताली राज की बायोपिक 'शाबाश मिथु' (Shabaash Mithu) में उनके संघर्ष को तो दिखाया ही गया है, साथ ही भारतीय महिला टीम की दयनीय हालत के बारे में भी बताया गया है. कैसे एक ही खेल, मेहनत बराबर की, बावजूद मेन इन ब्लू को लोग सिर आंखों पर बैठाए रखते हैं, जबकि लोग महिलाओं क्रिकेटर्स के नाम तक नहीं जानते.

फिल्म की कहानी
कैसे कत्थक सीखने वाली 8 साल की एक छोटी से बच्ची जिसे लोग प्यार से मिथु बुलाते हैं, एक स्टार क्रिकेटर बन जाती है. उसे स्टार क्रिकेटर बनाने में सबसे बड़ा रोल उसकी बचपन की दोस्त नूरी का है, जिससे वह बाईचांस भरतनाट्यम डांस क्लास में मिलती है. नूरी को क्रिकेट खेलने का काफी शौक था, वह गली में लड़कों से खेलने के लिए लड़ाई करती थी, जो उसके परिवार वालों को पसंद नहीं था, इसलिए उसकी अम्मी उसे भरतनाट्यम डांस क्लास ले जाती है, जहां टीचर उसकी पहचान मिथु से करवाती है. मिथु की जिम्मेदारी थी नूरी को अच्छा डांसर बनने के लिए प्रोत्साहित करने की, लेकिन नूरी ने मिथु में ही क्रिकेट खेलने के लिए शौक पैदा कर दिया.

मिताली का संघर्ष
डांस टीचर के टिप्स के सहारे नूरी ने मिथु को अच्छा बैट्समैन बना दिया, जिसपर एक दिन कोच संपत की नजर पड़ जाती है. वे मिथु और उसकी दोस्त को कोचिंग देना शुरू कर देते हैं. कोच संपत ने उसे बैटिंग की हर टेक्निक सिखाई, फिर अचानक एक दिन उसकी सबसे अच्छी दोस्त नूरी का निकाह हो जाता है और वह बीच में ही दोनों का साथ छूट जाता है. मिथु कोच संपत के सामने खूब रोती है, तभी वे मिथु को गुरुज्ञान देते हैं- 'ये मैदान भी एक जिंदगी की तरह है. यहां सारे दर्द छोटे हो जाते हैं, बस खेलना बड़ा होता है.' बस फिर क्या था, देखते ही देखते मिथु सफलता की ऊंचाइयों को छूने लगती है और नेशनल टीम के लिए सलेक्ट हो जाती है. जब वह महिला क्रिकेट बोर्ड के होस्टल में जाती है, तब वहां पहले से मौजूद महिला क्रिकेटर्स उसे तंग करने की कोशिश करती हैं. पर वह अपने हिम्मत और गुरुज्ञान पर अमल करते हुए सभी का दिल जीत लेती है.

मेन्स टीम के मुकाबले वुमेन्स टीम का हाल
मेन्स टीम के मुकाबले वुमेन्स टीम के क्या हाल हैं, इसे कई बार फिल्म में दिखाने की कोशिश की गई है. एयरपोर्ट पर उन्हें कोई नहीं पहचानता, जबकि मेन्स टीम के आते ही भगदड़ सी मच जाती है. रहने की ठीक से कोई व्यवस्था नहीं, कोई स्पॉन्सर नहीं, ठीक से खाना भी नहीं मिलता. ये सबकुछ इस फिल्म में दिखाया गया है. यहां तक कि क्रिकेट बोर्ड में 35 साल से काम कर रहा एक ऑफिस ब्वॉय एक भी महिला क्रिकेटर का नाम नहीं बता पाता. बावजूद, मिताली राज का एक ही सपना रहता है कि लोग उन्हें वूमेन इन ब्लू के नाम से जानें. वे हिम्मत नहीं हारतीं और आखिर में वर्ल्ड कप के फाइनल तक का सफर तय करती हैं और अपने मकसद में कामयाब हो जाती हैं.

कहां कमजोर पड़ती है मूवी
फर्स्ट हाफ में आप कहीं भी बोर नहीं होंगे, लेकिन दूसरे हाफ में आपको कई बार फिल्म स्लो लगेगी. खासकर, तब जब मिताली बीच में क्रिकेट छोड़कर घर लौट जाती हैं. इसके अलावा दूसरे हाफ में ज्यादातर मैच के ही शॉट्स हैं, जो देखने में तो बहुत मजा आता है, लेकिन उन शॉट्स के बीच मिताली का संघर्ष कहीं छुप सा गया है.

कैसा है अभिनय
तापसी पन्नू एक जबरदस्त कलाकार हैं. उन्होंने मिताली का किरदार बखूबी निभाया है. विजय राज ने भी कोच संपत का रोल बहुत अच्छे से अदा किया है. 

क्यों देखें ये मूवी
एक सफल क्रिकेटर बनने के लिए मिताली ने कितना संघर्ष किया, क्रिकेट में महिलाओं के प्रति कितनी दुर्भावना है, ये देखना चाहते हैं तो ये मूवी जरूर देखें. असली लाइफ का क्या मतलब होता है, कोच संपत के डायलॉग से प्रेरणा लेने के लिए ये मूवी जरूर देखें. एक सच्चा दोस्त क्या होता है, नूरी के रूप में यह देखने के लिए मूवी जरूर देखें. 

क्यों न देखें ये मूवी
हालांकि इस मूवी में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे आप मूवी न देखें. हर किसी को ये मूवी एकबार जरूर देखनी चाहिए. फिर भी यदि क्रिकेट में बिल्कुल भी इंटरेस्ट नहीं है, तो ये मूवी न देखें.


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