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Laal Singh Chaddha Movie Review: लाल सिंह चड्ढा आपको देखनी चाहिए या नहीं? पढ़िए ये रिव्यू

सच पूछिए तो हैरानी तब होती है, जब एक ऐसे युवक की भारतीय सेना में भर्ती होती है, जो फिल्म में मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ दिखाई नहीं देता.

चंदन कुमार 3 years ago

फिल्म : लाल सिंह चड्ढा (Laal Singh Chaddha)
मुख्य कलाकार : आमिर खान, करीना कपूर, नागा चैतन्य, मोना सिंह, मानव विज
निर्देशक : अद्वैत चंदन
निर्माता : आमिर खान और किरण राव
रेटिंग : 2/5

'लाल सिंह चड्ढा', सोच रहा हूं कि आखिर लिखने की शुरुआत कहां से करूं? 'लंबी फिल्म' की कहानी आखिर क्या संदेश देना चाहती है? सबकुछ हवा-हवाई सा लगता है. कोई भी मुद्दा दिखाने से पहले ऐसा लगता है, जैसे उसके बारे में कोई रिसर्च नहीं की गई हो. बस जो मन में आया, दिखाते गए. मन किया तो दंगा दिखा दिया, फिर मन बदल गया तो कारगिल युद्ध दिखा दिया. फिर मन बदला तो अन्ना हजारे का आंदोलन दिखा दिया. कुछ नहीं मिला तो नायक को दौड़ लगाते हुए ही दिखा दिया, वो भी बिना रुके हुए लगातार 4 साल से ज्यादा की दौड़. ऐसे में 'थ्री इडियट्स' फिल्म का बस एक ही डायलॉग याद आता है- 'अरे कहना क्या चाहते हो?'

फिल्म की कहानी
'लाल सिंह चड्ढा' ऑस्कर विजेता अंग्रेजी फिल्म 'फॉरेस्ट गम्प' की रीमेक है. फिल्म की शुरुआत होती है पठानकोट रेलवे स्टेशन से. लाल सिंह चड्ढा (आमिर खान) ट्रेन में गोलगप्पे का डब्बा लिए हुए बैठे हैं. वे अपनी प्रेमिका रूपा डिसूजा (करीना कपूर) से मिलने चंडीगढ़ जा रहे होते हैं. ट्रेन के चलते ही वे साथ में बैठी सवारियों को अपनी जिंदगी की कहानी सुनाने लगते हैं. यात्रियों को उनकी कहानी इंटरेस्टिंग लगती है, तो सभी बड़े ध्यान से सुनने भी लगते हैं.

'भाग लाल भाग'
लाल सिंह चड्ढा एक विकलांग बच्चा है. फिल्म में उसे दिमागी रूप से भी कमजोर दिखाया गया है. हालांकि उसकी मां (मोना सिंह) उसे हौसला देती है कि वह भी दूसरों की तरह सामान्य है, उसे किसी की मदद की जरूरत नहीं है, लेकिन उसकी जिंदगी में 'चमत्कार' उसकी मां नहीं, उसकी प्रेमिका रूपा (करीना कपूर) करती है, जिसके 'भाग लाल भाग' कहते ही वह चुटकी बजाते ही बिना किसी सहारे के दौड़ने लगता है और इतनी तेज कि उसे पकड़ना किसी के भी बस की नहीं है. 'भाग लाल भाग' जब-जब फिल्म में सुनाई देता है, तो 'भाग मिल्खा भाग' की याद आ जाती है. फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है, तो बीच-बीच में अचानक से 'आपरेशन ब्लू स्टार', पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और फिर उसके बाद की हिंसा, बाबरी मस्जिद कांड, कारगिल युद्ध, अन्ना हजारे आंदोलन, मुंबई अटैक की घटना दिखाई जाती है और कमाल की बात यह है कि इन सभी घटनाओं का अकेला गवाह है- 'लाल सिंह चड्ढा'.

भारतीय सेना के साथ नाइंसाफी
सच पूछिए तो हैरानी तब होती है, जब एक ऐसे युवक की भारतीय सेना में भर्ती होती है, जो फिल्म में मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ दिखाई नहीं देता. उस युवक की हरकतें बताती हैं कि वह सेना के लिए फिट नहीं है, बावजूद वह सेना का जवान बनता है. क्या आमिर खान ने इस बारे में रिसर्च नहीं की कि भारतीय सेना में भर्ती के लिए क्या योग्यताएं और शारीरिक क्षमताएं होती हैं? यही नहीं, कारगिल युद्ध के दौरान वह एक ऐसे आतंकवादी मोहम्मद बाजी (मानव विज) की जान बचाता है, जिसने कई भारतीय सैनिकों की हत्या कर दी. इतना ही नहीं, भारतीय सेना के अस्पताल में उसका इलाज भी होता है और मौका देखकर वह फरार भी हो जाता है, लेकिन भारतीय सेना को यह भनक तक नहीं लगती कि वह एक आतंकवादी और भारतीय सैनिकों का हत्यारा था. और तो और लाल सिंह चड्ढा को इस कृत्य के लिए वीर चक्र से भी सम्मानित किया गया. मैं आमिर खान और डायरेक्टर अद्वैत चंदन से पूछना चाहता हूं कि क्या वे हमारी सेना को इस रूप में देखते हैं कि उनके बीच कोई आतंकवादी आ जाए, इलाज करवाए और चला भी जाए, पर हमारे जवानों को पता भी न चले? इतना ही नहीं, वो आतंकवादी आराम से भारत में रहता है, फिर लाल का बिजनेस पार्टनर भी बनता और बड़ी आसानी से पाकिस्तान वापस भी लौट जाता है. यह पूरा सीन मुझे तो बिल्कुल हजम नहीं हुआ.

बीच में अंडरवर्ल्ड भी ले आए
अब आगे बढ़ते हैं. सेना से रिटायर होने के बाद लाल सिंह चड्ढा कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए अपने दोस्त बाला (नागा चैतन्य) के चड्डी-बनियान के बिजनेस का सपना पूरा करता है. बाला कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हो जाता है. देखते ही देखते वह Rupa ब्रांड खड़ा कर लेता है और फिर एक दिन अचानक सबकुछ छोड़ देता है. उस बिजनेस का क्या हुआ, कुछ अता-पता नहीं चलता. यह भी अधूरा सा लगता है. करीना कपूर फिल्म के बीच-बीच में आती हैं और फिर लंबे समय के लिए गायब हो जाती हैं. उनके जरिए इस फिल्म में अंडरवर्ल्ड की दुनिया को भी दिखा दिया गया है. यानी, कुछ भी नहीं छोड़ा- हिंसा, युद्ध, अंडरवर्ल्ड, फिल्मी दुनिया का अंधकार, सबकुछ दिखाने की कोशिश की गई. यही एक बड़ा कारण है कि पूरी फिल्म में कहीं भी ठहराव नजर नहीं आता.

कैसा है अभिनय
अभिनय की बात करें तो आमिर खान अब उतने प्रभावी नजर नहीं आते. ऐसा लगता है, जैसे अभी भी वो 'PK' फिल्म ही कर रहे हैं. उससे बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. करीना कपूर ने बेहतर करने की कोशिश की है, पर गुंजाइश बची रह गई. लाल सिंह चड्ढा की मां के रोल में मोना सिंह ने जरूर प्रभावित किया है. उनकी एक्टिंग में दम दिखा. मानव विज को आतंकवादी का रोल जरूर मिला है, पर उनसे खूंखार की जगह एक भले मानुष वाली एक्टिंग करवाई गई है.

क्यों देखें ये फिल्म
मेरे हिसाब से यदि आप आमिर खान के फैन हैं और उनकी कोई फिल्म नहीं छोड़ सकते तो ये फिल्म देख सकते हैं. हां, बीच में थोड़ी-थोड़ी कॉमेडी है, उसे एंजॉय कर सकते हैं.

क्यों न देखें ये फिल्म
ये फिल्म नहीं देखने के कई कारण हैं, जिनमें से कुछ मैंने इस रिव्यू में ऊपर ही बता दिया है. सीन के बीच कोई तालमेल नहीं है. घटनाएं और लाल सिंह चड्ढा के मकसद के बीच कोई सामंजस्य नहीं है. फिल्म कई जगह बोझिल लगती है. कई सीन ऐसे हैं, जिन्हें जबरदस्ती खींचा गया है.
 


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