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MNS में नफरत का राज, हिंदीभाषियों को पीटने पर तालियां भले ही मिलती हों, लेकिन वोट नहीं!

नवी मुंबई में राज ठाकरे की पार्टी के कार्यकताओं ने हिंदी बोलने पर एक वेटर की जमकर पिटाई कर दी. इसका वीडियो भी वायरल हुआ है. संजय निरुपम ने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

महाराष्ट्र में हिंदी-मराठी का विवाद काफी पुराना है. हिंदीभाषियों के खिलाफ हिंसा के मामले बीच-बीच में सामने आते रहते हैं. खासकर, चुनावी मौसम में इन मामलों की संख्या अचानक बढ़ जाती है. राज्य में इसी साल अक्टूबर में विधानसभा चुनाव होने हैं, लिहाजा महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) ने फिर से हिंदी बोलने वालों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है. राज ठाकरे की पार्टी के कार्यकर्ताओं ने हाल ही में नवी मुंबई के एक होटल कर्मचारी को केवल इसलिए बुरी तरह पीटा क्योंकि वह मराठी नहीं बोल रहा था. इस मामले में आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग हो रही है. कांग्रेस छोड़कर एकनाथ शिंदे की शिवसेना में गए संजय निरुपम ने उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से सख्त एक्शन लेने की मांग की है.

MNS मुद्दावहीन पार्टी 
राज ठाकरे की मनसे विधानसभा की 200-225 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है. फिलहाल मनसे ने एकला चलो की बात कही है, लेकिन चुनाव से पहले या बाद में वह भाजपाई खेमे में भी जा सकते हैं. लोकसभा चुनाव में उन्होंने बिना किसी शर्त के PM मोदी को समर्थन दिया था. हालांकि, ये बात अलग है कि उनके पास समर्थन देने जैसा कुछ है नहीं. मनसे मुद्दावहीन पार्टी है, राज्य में उसके पास कोई बड़ा जनाधार भी नहीं है. ऐसे में हिंदी-मराठी के नाम पर नफरत फैलाकर राज ठाकरे अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं. राज शुरू से यही करते आ रहे हैं. पहले-पहल उन्हें इसका कुछ फायदा मिला भी, लेकिन बाद में वह नफरत के नाम पर वोट हासिल नहीं कर पाए. 

बुरी हो गई हालत   
बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद उद्धव और राज ठाकरे की राह अलग हो गई थी. राज ने 2006 में महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) के नाम से अपनी पार्टी बनाई. इसके बाद वह खुलकर हिंदीभाषियों के खिलाफ जहर उगलने लगे. 2009 में मनसे ने अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा और 13 सीटों पर जीत हासिल की. पहली बार में 13 सीटें झटक लेना राज ठाकरे और मनसे के लिए बड़ी बात थी. उस समय यह माना जाने लगा था कि राज का सियासी करियर उज्जवल है, लेकिन समय के साथ-साथ यह धारणा कमजोर पड़ने लगी. राज्य में 2014 और 2019 में हुए चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा. 2019 में तो उसे केवल एक ही सीट नसीब हुई.

पूरी नहीं होगी हसरत 
राजनीति के जानकार मानते हैं कि हिंदीभाषियों के खिलाफ नफरत फैलाकर राज ठाकरे ने कुछ वक्त की प्रसिद्दी ज़रूर हासिल की, लेकिन समय के साथ लोगों को समझ आ गया कि यह महज कोरी राजनीति है. मनसे ने राज्य के लोगों की इस छिपी हुई भावना को हवा दी कि यूपी-बिहार वाले उनका हक मार रहे हैं, शुरुआत में उन्हें लोगों का समर्थन भी मिला, मगर ये समर्थन मुट्ठी भर था और धीरे-धीरे ये भी उनके साथ से फिसल गया. मुंबई में बड़ी संख्या में हिंदीभासी रहते हैं, यदि सब मायानगरी से दूरी बना लें तो कभी न थमने वाली मुंबई के पहिये थम जाएंगे. अधिकांश मुंबईवासी भी यह बात समझते हैं, इसलिए लोग राज ठाकरे के भाषण पर तालियां ज़रूर बजाते हैं, मगर उन्हें वोट नहीं देते. लिहाजा, इस बार भी नफरत की खेती करके वोटों की फसल काटने की उनकी हसरत पूरी नहीं होने वाली. 

निरुपम ने बोला हमला    
संजय निरुपम ने नवी मुंबई की घटना का मुद्दा जोर-शोर से उठाया है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा है - किसी ने मोदीजी को तीसरी बार प्रधानमंत्री बनाने के लिए बिना शर्त समर्थन दिया, इसका अर्थ यह नहीं है कि उसे गरीब मज़दूरों को पीटने का लाइसेंस मिल गया है. इस मामले में कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए. उन्होंने आगे लिखा है कि यह वीडियो नवी मुंबई का है. एक महीने पहले एक मजदूर रोजी-रोटी की तलाश में यहां आया था. एक रेस्टोरेंट में उसे वेटर की नौकरी मिल गई. मनसे वाले कह रहे हैं कि तुम मराठी बोलो. इतना फास्ट लर्नर होता तो रोजगार के लिए दर-दर भटकता? महाराष्ट्र में मराठी भाषा सबको बोलनी चाहिए, लेकिन इसके लिए कानून हाथ में लेना, गुंडागर्दी करना और किसी गरीब को पीटना यह हमारी समृद्ध संस्कृति को कलंकित करता है. 


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