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अपने न बन जाएं पराये, चुनावी नतीजों के बाद तय होगा महायुति और MVA का स्वरूप!
महाराष्ट्र में 20 नवंबर को विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होगा. महायुति और महाविकास अघाड़ी दोनों ही अपनी जीत का दावा कर रहे हैं.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago
महाराष्ट्र में सत्ताधारी महायुति और महाविकास अघाड़ी (MVA) का स्वरूप कैसा रहेगा, इसका पता चुनाव परिणाम आने के बाद ही चलेगा. अभी भले ही दोनों गठबंधन में शामिल दल साथ जीने-मरने की कसमें खा रहे हों, लेकिन परिणाम बाद उनके पाला बदलने से इंकार नहीं किया जा सकता. भाजपा को भी कहीं न कहीं यह लगने लगा है कि चुनाव बाद गठबंधन की तस्वीर बदल सकती है. राज्य के डिप्टी सीएम और भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस ने स्वीकार किया है कि चुनाव के बाद कुछ भी हो सकता है. उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव अजब होता है और 23 नवंबर को परिणाम घोषित होने के बाद ही स्पष्ट होगा कि कौनसी पार्टी किसका समर्थन कर रही है.
अजित ने भी दिए संकेत
इससे पहले, भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति में शामिल अजित पवार की पार्टी की तरफ से कहा गया था कि असली तस्वीर चुनाव के बाद ही सामने आएगी. दरअसल, अजित पवार ने बीते कुछ समय में कई बार ऐसे संकेत दिए हैं कि वह चाचा शरद पवार से रिश्ते सुधारना चाहते हैं. अजित अपने चाचा की पार्टी तोड़कर ही महायुति सरकार में शामिल हुए थे. शरद पवार की पार्टी का चुनाव चिन्ह 'घड़ी' भी उनके पास है. लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन के लिए चाचा से विश्वासघात को वजह माना गया था. इसलिए अजित विधानसभा चुनाव से पहले रिश्ते सुधारने के संकेत देते नज़र आये हैं. ऐसे में अगर चुनावी नतीजे कुछ ऊपर-नीचे होते हैं तो संभव है अजित अपने पुराने घर वापस लौट जाएं. बता दें कि महाराष्ट्र में 20 नवंबर को वोटिंग होनी है.
इसके भी हैं आसार
वहीं, महाविकास अघाड़ी (MVA) में भी चुनावी नतीजों के बाद कुछ बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. इस गठबंधन में पहले सीटों और अब मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर गतिरोध है. वैसे, तो शिवसेना और शरद पवार भाजपा से हाथ मिलाने से साफ इंकार कर चुके हैं, लेकिन सियासत में कोई भी फैसला स्थायी नहीं होता. शिवसेना (UBT) प्रमुख ठाकरे की भाजपा नेताओं से मुलाकात को लेकर बीते दिनों कई ख़बरें सामने आई थीं. उद्धव ठाकरे पहले भी भाजपा के साथी रहे हैं, ऐसे में वह अच्छे ऑफर पर दोबारा उस खेमे का हिस्सा बनने से शायद ही इंकार करें. यदि इस बार भी विपक्ष सत्ता का स्वाद नहीं चख पाता तो फिर पांच साल की लंबी अवधि का इंतजार करना होगा और शायद उद्धव इसमें सहज न हों. एकनाथ शिंदे भी सीट शेयरिंग को लेकर भाजपा से नाराज बताए गए हैं, लेकिन उनके पास 'कमल' थामे रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.
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