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भारत को एक ग्लोबल एविएशन हब बनाने में कोड-शेयर समझौते क्यों हैं ज़रूरी? जानिए

जब तुर्की के कश्मीर को लेकर रुख पर लोगों की भावनाएं उभर रही हैं, तब इंडिगो और तुर्किश एयरलाइंस की साझेदारी सवालों के घेरे में आ गई है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

22 अप्रैल को जम्मू और कश्मीर के पहलगाम में हुए घातक आतंकी हमले के बाद दुनिया भर के नेताओं और देशों ने इस हमले की कड़ी निंदा की और भारत के साथ एकजुटता दिखाई, लेकिन एक देश जिसकी आलोचना हो रही है, वह है तुर्की.

हमले के तुरंत बाद, तुर्की के विदेश मंत्रालय ने 22 अप्रैल को एक बयान जारी किया जिसमें उन्होंने साफ-साफ इस हमले की निंदा की. बयान में कहा गया कि "हमें यह जानकर बहुत दुख हुआ कि आज (22 अप्रैल) जम्मू और कश्मीर के पहलगाम इलाके में हुए एक आतंकवादी हमले में कई लोगों की जान चली गई और कई घायल हो गए. हम इस घिनौने हमले की निंदा करते हैं. हम मारे गए लोगों के परिवारों के प्रति संवेदना प्रकट करते हैं और घायलों को जल्दी ठीक होने की कामना करते हैं."

इस बयान को पहले की तुर्की की कश्मीर पर राय के मुकाबले एक सकारात्मक कदम माना गया, क्योंकि इसमें जम्मू और कश्मीर को "विवादित इलाका" नहीं कहा गया और हमले को साफ तौर पर "आतंकी हमला" बताया गया.

तुर्की का दोहरा रवैया

हमले वाले दिन ही, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अंकारा में तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोआन से मुलाकात की और कश्मीर मुद्दे पर तुर्की की "मजबूत समर्थन" के लिए धन्यवाद किया. एर्दोआन ने भी पाकिस्तान के आतंकवाद खत्म करने के प्रयासों का समर्थन करते हुए कश्मीर मुद्दे को पाकिस्तान के नजरिए से देखा.

एक हफ्ते बाद, एक तुर्की सैन्य विमान (C-130E हरक्यूलिस) को कराची, पाकिस्तान में उतरते देखा गया. कहा गया कि उसमें सैन्य सामान था, जिससे यह अटकलें लगने लगीं कि तुर्की ने पाकिस्तान को हथियार भेजे हैं. उस हफ्ते भारत-पाकिस्तान के बीच हालात पहले से ही तनावपूर्ण थे.

हालांकि, तुर्की सरकार ने इन दावों को खारिज किया और कहा कि विमान सिर्फ ईंधन भरवाने के लिए पाकिस्तान रुका था और उसने कोई हथियार नहीं उतारे. 4 मई को खबर आई कि एक तुर्की नौसैनिक जहाज भी कराची बंदरगाह पहुंचा, जिसे पाकिस्तान ने "सद्भावना यात्रा" बताया.

लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के माहौल में तुर्की का यह रवैया भारत के नागरिकों, विश्लेषकों और सैन्य विशेषज्ञों को अच्छा नहीं लगा. उन्होंने इसे भड़काऊ बताया और कहा कि यह क्षेत्रीय शांति को नुकसान पहुंचा सकता है. भारत में कुछ लोगों ने तुर्की के खिलाफ कूटनीतिक और व्यापारिक कदम उठाने की अपील की, जैसे उड़ानों को रोकना और व्यापार समझौतों की समीक्षा करना.

हालांकि भारत सरकार ने तुर्की के व्यवहार पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है और अब तक शांत रवैया अपनाया है. इन सबके बीच भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो भी आलोचना में आ गई है, क्योंकि उसका तुर्की की सरकारी एयरलाइन, तुर्किश एयरलाइंस के साथ कोड-शेयरिंग समझौता है. मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि इस समझौते से तुर्किश एयरलाइंस को बड़ा फायदा हो रहा है, जिससे इंडिगो के खिलाफ भी नाराजगी बढ़ी है.

यह नाराज़गी एक पुराना सवाल उठाती है: जब दो देशों के बीच राजनयिक या सैन्य रिश्तों में तनाव होता है, तो क्या व्यापार और आर्थिक समझदारी फिर भी आगे बढ़ सकती है? यह सवाल खासकर कंपनियों के लिए तब ज़्यादा मायने रखता है जब सरकार खुद व्यापारिक रिश्ते तोड़ने के लिए कोई सख्त कदम नहीं उठाती या साफ संकेत भी नहीं देती.

कोड-शेयरिंग क्यों है एक समझदारी भरा फैसला

इंडिगो का तुर्किश एयरलाइंस के साथ कोड-शेयरिंग समझौता एक बाज़ार रणनीति और भारत को एक वैश्विक एविएशन हब बनाने के बड़े लक्ष्य का हिस्सा है. भले ही तुर्किश एयरलाइंस को भी इससे फायदा हो, लेकिन इंडिगो को इससे कहीं ज़्यादा लाभ मिलता है. 

इस समझौते से इंडिगो को बिना बड़े और महंगे विमानों (widebody aircraft) में अभी निवेश किए ही लंबी दूरी की उड़ानों तक पहुंच मिल जाती है. ऐसे बड़े विमान उनके ऑर्डर में शामिल हैं और आने वाले समय में उन्हें मिलेंगे. इस समझौते से इंडिगो को इस्तांबुल होते हुए यूरोप, मध्य एशिया और अमेरिका तक पहुंच मिलती है, क्योंकि इस्तांबुल एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय ट्रांजिट हब है.

तुर्की इंडिगो के लिए सिर्फ एक ट्रांजिट पॉइंट (यानी बीच का रास्ता) है, न कि असली मंज़िल. इंडिगो के लिए यह समझौता अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को जोड़ने का तरीका है, ना कि सिर्फ भारत-तुर्की पर्यटन बढ़ाने का. तुर्किश एयरलाइंस ने भी माना है कि ऐसे वैश्विक समझौतों से तुर्की आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या बढ़ी है. उनकी 2023 की रिपोर्ट के अनुसार भारत से तुर्की जाने वाले पर्यटकों की संख्या 2.31 लाख से बढ़कर 2.74 लाख हो गई.

पत्रकार विक्रम चंद्रा ने सवाल उठाया कि भारत के लोग तुर्की के रास्ते यूरोप क्यों जाएं, और सोशल मीडिया पर तुर्की के विरोध में उसके क्षेत्रीय प्रतिद्वंदी ग्रीस से रिश्ते मजबूत करने की बात कही. इंडिगो के कोड-शेयर समझौते लगातार बढ़ रहे हैं. FY24 में इंडिगो की कोड-शेयर फ्लाइट्स से यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या 45% से ज्यादा बढ़ी. इंडिगो ने ब्रिटिश एयरवेज और मलेशियन एयरलाइंस के साथ भी समझौते किए और क्वांटस (Qantas) के साथ अपना समझौता बढ़ाया. इसके पास 500 छोटे (narrowbody) और 30 बड़े विमानों (widebody) की मजबूत ऑर्डर बुक है — यह सब मिलकर इंडिगो की अंतरराष्ट्रीय योजना का हिस्सा हैं.

इंडिगो के CEO पीटर एल्बर्स ने मई 2024 में एक निवेशक कॉल में कहा, “ये कदम न सिर्फ इंडिगो को एक वैश्विक एयरलाइन बनाने की दिशा में हैं, बल्कि भारत को एक वैश्विक एविएशन हब बनाने के हमारे लक्ष्य को भी पूरा करते हैं.” उन्होंने आगे कहा कि ऐसे समझौते इंडिगो को यात्रियों, अनुभव और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाते हैं — जो आगे सीधे लंबी दूरी की उड़ानों के लिए मददगार साबित होगा.

एल्बर्स ने यह भी कहा, “कोड-शेयर दो तरह से मदद कर रहे हैं — एक तो विदेशी एयरलाइंस इंडिगो की घरेलू उड़ानों पर कोड-शेयर कर रही हैं, जिससे हमें अंतरराष्ट्रीय यात्रियों से जुड़ने का मौका मिल रहा है. दूसरा, जैसे तुर्किश एयरलाइंस और क्वांटस के साथ हमारे समझौते हैं, ये हमें भविष्य की सीधी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए तैयार कर रहे हैं.”

भारतीय यात्रियों के लिए क्या मायने हैं?

भारतीय यात्रियों के लिए इंडिगो और तुर्किश एयरलाइंस का कोड-शेयर समझौता अंतरराष्ट्रीय यात्रा को सस्ता और आसान बना रहा है. इस्तांबुल को ट्रांजिट हब बनाकर अब भारतीय यात्री बिना ज़्यादा झंझट के यूरोप, उत्तरी अमेरिका और मध्य एशिया के 30 से ज्यादा शहरों तक पहुंच सकते हैं, वो भी बिना अलग-अलग टिकट बुक किए या सामान के लिए अलग इंतज़ाम किए.

इस साझेदारी से एक ही चेक-इन, बेहतर टाइमिंग और कम किराए जैसी सुविधाएं मिलती हैं, जो लंबी दूरी की उड़ानों को किफायती बनाती हैं — खासकर उन भारतीयों के लिए जो बजट का ध्यान रखते हैं. जब भारत खुद को एक वैश्विक हवाई यात्रा केंद्र बनाना चाहता है, तब ऐसे समझौते सिर्फ एयरलाइन की रणनीति नहीं, बल्कि लाखों भारतीय यात्रियों को ज़्यादा विकल्प और सुविधा देने का ज़रिया भी हैं.

यह भी सच है कि कुछ मौकों पर यात्री अनुभव को लेकर गड़बड़ियां और लापरवाहियां देखी गई हैं, लेकिन इनका समाधान नियामक जांच या बेहतर प्रक्रिया (SOPs) से होना चाहिए, न कि किसी देश के खिलाफ बहिष्कार जैसी राजनीतिक मांगों से.

तुर्किश एयरलाइंस का बढ़ता नेटवर्क

तुर्किश एयरलाइंस को इस समझौते से ज़रूर फायदा हुआ है, लेकिन भारत से निकलने वाली यात्रियों की ज़्यादातर मांग इंडिगो की क्षमता और ब्रांडिंग से पूरी की जाती है. कोड-शेयर समझौते से पहले तुर्किश एयरलाइंस को भारत में सीमित उड़ानों की अनुमति थी क्योंकि दोनों देशों के बीच सीट की संख्या तय (seat cap) थी. इसलिए यह समझौता तुर्किश एयरलाइंस से ज़्यादा इंडिगो के लिए फायदेमंद रहा.

तुर्किश एयरलाइंस ने पिछले कुछ सालों में दुनिया की कई बड़ी एयरलाइनों के साथ कोड-शेयर समझौते किए हैं. 2011 में इसके पास 26 कोड-शेयर थे, जो 2023 में बढ़कर 60 हो गए. तुर्किश एयरलाइंस ने एयर इंडिया के साथ भी साझेदारी बढ़ाने में रुचि दिखाई है, जैसे कि कोड-शेयर या सर्विस समझौते, लेकिन अब तक कोई औपचारिक समझौता नहीं हुआ है, हालांकि दोनों एयरलाइंस एक ही समूह – स्टार अलायंस – का हिस्सा हैं.

एयर इंडिया के ज़्यादातर कोड-शेयर समझौते स्टार अलायंस की एयरलाइनों के साथ हैं. वहीं एयर इंडिया की सस्ती सेवा एयर इंडिया एक्सप्रेस, तुर्किश एयरलाइंस की मेंटेनेंस कंपनी "Turkish Technic" के साथ मिलकर काम करती है. पहलगाम हमले के बाद लोगों की भावनाएं भड़की हैं, इसलिए नाराज़गी बढ़ना स्वाभाविक है और कड़ी प्रतिक्रिया की मांग भी उठ रही है.

लेकिन इंडिगो और तुर्किश एयरलाइंस के कोड-शेयर को लेकर जो विवाद हो रहा है, वह एक बार फिर दिखाता है कि रणनीतिक व्यापारिक फैसलों और जनभावनाओं के बीच रेखा कितनी पतली होती है. जब तक सरकार साफ दिशा-निर्देश या चेतावनी नहीं देती — खासकर तब जब ऐसे आर्थिक रिश्ते देश के बड़े आर्थिक लक्ष्यों से जुड़े हों — तब तक यह उम्मीद करना शायद ठीक नहीं कि कंपनियां खुद को कूटनीतिक उपकरण की तरह इस्तेमाल करें.

(लेखक- अर्जुन यादव, BW रिपोर्टर्स, BW बिज़नेसवर्ल्ड में संवाददाता हैं.)
 


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