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क्या महंगे कर्ज से मुक्ति का बन रहा है संयोग? पढ़ें क्या कहती है ये रिपोर्ट

पिछली कई बार से रिजर्व बैंक ने रेपो रेट को यथावत रखा हुआ है. अगले महीने फिर इस मुद्दे पर RBI की बैठक होनी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

रिजर्व बैंक (RBI) ने महंगाई नियंत्रित करने के नाम पर पूर्व में कई बार कर्ज महंगा किया, लेकिन आंकड़ों में महंगाई के नरम होने के बावजूद रेपो रेट में कटौती नहीं की. पिछले महीने हुई बैठक में भी RBI ने नीतिगत ब्याज दर यानी रेपो रेट को यथावत रखने का फैसला लिया. यह लगातार नौंवी बार था जब RBI ने रेपो रेट में की बदलाव नहीं किया. अब सवाल यह उठता है कि आखिर रिजर्व बैंक Repo Rate में कटौती करके कर्ज सस्ता बनाने का निर्णय कब लेगा? 

इस वजह से बनी उम्मीद
एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट की मानें, तो हाल-फिलहाल रेपो रेट में कमी की कोई संभावना नहीं है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से नीतगत ब्याज दरों में 50 आधार अंकों (BPs) की कटौती के बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी इस तरह के कदम पर विचार कर सकता है, लेकिन ऐसा इस साल होने की उम्मीद कम है. संभावित रूप से फरवरी 2025 तक RBI रेपो रेट में कटौती का फैसला ले सकता है.

मुद्रास्फीति में आई कमी
रिपोर्ट में बताया गया है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) मुद्रास्फीति अगस्त 2024 में सालाना आधार पर 3.65% के करीब पहुंचते हुए पांच साल के निचले स्तर पर आ गई है. इसके बावजूद 2024 में आरबीआई की ओर से किसी भी दर कटौती की उम्मीद कम है. अब तक के अनुमानों के अनुसार 2025 की शुरुआत में  संभवत: फरवरी में दर में कटौती का फैसला लिया जा सकता है. 

अगले महीने है बैठक
SBI की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सितंबर और अक्तूबर में मुद्रास्फीति में अपेक्षित उछाल के बावजूद, आने वाले महीनों में CPI मुद्रास्फीति के 5% से नीचे या उसके करीब रहने का अनुमान है. पूरे वित्त वर्ष 2024-25 के लिए औसत मुद्रास्फीति 4.6 प्रतिशत से 4.7 प्रतिशत के बीच रह सकती है. मालूम हो कि फरवरी 2023 से नीतिगत ब्याज दर 6.5 प्रतिशत पर बनी हुई है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक अगले महीने 7 से 9 अक्तूबर तक चलेगी. इस बैठक में नीतिगत ब्याज दरों को लेकर फैसला होता है. 

क्या होती है रेपो रेट?
रेपो रेट (Repo Rate) वह दर होती है, जिस पर आरबीआई बैंकों को कर्ज देता है. वहीं, रिवर्स रेपो रेट उस दर को कहते हैं जिस पर बैंकों को आरबीआई के पास पैसा रखने पर ब्याज मिलता है. जब रेपो रेट में बढ़ोत्तरी होती है, तो बैंकों के लिए कर्ज महंगा हो जाता है और वो ग्राहकों के कर्ज को भी महंगा कर देते हैं. यानी वह अपना बढ़ा बोझ ग्राहकों पर लाद देते हैं. बैंक केवल नए लोन ही महंगे नहीं करते, बल्कि पुराने लोन भी महंगे कर देते हैं, जिससे आपकी EMI बढ़ जाती है.


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