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अमेरिका-ईरान संघर्ष तेज, होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ा खतरा; कच्चे तेल की कीमतों में उछाल की आशंका

अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है. इस घटनाक्रम ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 months ago

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों की चिंता बढ़ा दी है. दक्षिणी ईरान में अमेरिकी हमलों में आठ लोगों की मौत की खबरों के बाद आशंका बढ़ गई है कि संघर्ष आगे बढ़ने पर दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. इसका असर तेल कीमतों, महंगाई और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.

बढ़ते हमले और जवाबी कार्रवाई से क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों और ऊर्जा ढांचे पर खतरा बढ़ रहा है. बाजारों को डर है कि यदि संघर्ष और तेज हुआ तो होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले समुद्री यातायात पर असर पड़ सकता है, जिससे वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति, व्यापार और वित्तीय बाजारों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.

होर्मुज जलडमरूमध्य बना ऊर्जा बाजार का केंद्र

वैश्विक ऊर्जा बाजारों के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक मार्गों में से एक है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, वर्ष 2025 में इस जलमार्ग से प्रतिदिन औसतन करीब 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की आवाजाही हुई, जो दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग 25 फीसदी हिस्सा है. इस मार्ग से जाने वाली बड़ी मात्रा में तेल की आपूर्ति एशियाई देशों, जिसमें भारत, चीन और जापान जैसे प्रमुख उपभोक्ता शामिल हैं, तक पहुंचती है.

यदि इस मार्ग से तेल परिवहन लंबे समय तक बाधित होता है तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है. हालांकि कुछ तेल को वैकल्पिक पाइपलाइनों के जरिए भेजा जा सकता है, लेकिन IEA के मुताबिक उनकी क्षमता होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली कुल मात्रा की तुलना में काफी सीमित है.

कच्चे तेल और शिपिंग लागत पर नजर

निवेशक अब पश्चिम एशिया की स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं. भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ने से ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बढ़ रही है. यदि तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी आ सकती है. लंबे समय तक संघर्ष जारी रहने की स्थिति में क्षेत्र में काम करने वाले जहाजों के लिए माल ढुलाई लागत और युद्ध जोखिम बीमा (War Risk Insurance) का प्रीमियम भी बढ़ सकता है.

इसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से विमानन, रसायन, उर्वरक, लॉजिस्टिक्स और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों की लागत बढ़ सकती है. वहीं, बढ़ती शिपिंग लागत वैश्विक महंगाई पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है.

केंद्रीय बैंकों के लिए बढ़ेगी चुनौती

अगर ऊर्जा कीमतों में लंबे समय तक तेजी बनी रहती है तो दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के लिए मौद्रिक नीति को लेकर नई चुनौती पैदा हो सकती है. महंगाई को नियंत्रित करने और आर्थिक विकास को गति देने के बीच संतुलन बनाना उनके लिए मुश्किल हो सकता है.

भारत पर भी पड़ सकता है असर

भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक देश है, इसलिए लंबे समय तक तेल कीमतों में बढ़ोतरी का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. महंगा कच्चा तेल भारत के आयात बिल को बढ़ा सकता है, जिससे चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ सकता है. इसके अलावा रुपये पर दबाव, कंपनियों की लागत में वृद्धि और परिवहन खर्च में तेजी देखने को मिल सकती है.

यदि तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती है तो सरकार के वित्तीय प्रबंधन और ईंधन कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है.

बाजारों में जारी रह सकती है अस्थिरता

विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार पर संघर्ष का दीर्घकालिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या इससे तेल आपूर्ति और होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए जहाजों की आवाजाही वास्तव में लंबे समय तक प्रभावित होती है.

अगर व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही सामान्य बनी रहती है तो कच्चे तेल की कीमतों में शुरुआती जोखिम प्रीमियम धीरे-धीरे कम हो सकता है. लेकिन यदि टैंकरों पर हमले होते हैं या होर्मुज मार्ग से यातायात में बड़ी गिरावट आती है तो वैश्विक ऊर्जा संकट की स्थिति बन सकती है.

मध्य पूर्व में जारी संकट के कारण पहले ही तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, संघर्ष शुरू होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल शिपमेंट में तेज गिरावट दर्ज की गई है.

राजनयिक प्रयासों से अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है. ऐसे में वैश्विक बाजारों की नजर पश्चिम एशिया के घटनाक्रमों पर बनी रहेगी, खासकर ऊर्जा ढांचे और समुद्री व्यापार मार्गों पर होने वाली किसी भी नई कार्रवाई पर.
 


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