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UN रिपोर्ट: 2024 में 60% वैश्विक वृद्धि के बावजूद, एशिया-प्रशांत क्षेत्र जलवायु संकट के लिए तैयार नहीं

UN की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र को जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए प्रभावी नीतियों और क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता है, ताकि सतत विकास लक्ष्य को हासिल किया जा सके.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

संयुक्त राष्ट्र (UN) की आर्थिक और सामाजिक आयोग (ESCAP) द्वारा आज जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में वैश्विक आर्थिक विस्तार में 60 प्रतिशत का योगदान देने वाले एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कई देशों में जलवायु संकट और हरित प्रणाली की ओर संक्रमण से निपटने की पर्याप्त तैयारी नहीं है. संयुक्त राष्ट्र की "एशिया और प्रशांत की आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण 2025" रिपोर्ट में इस जटिल आर्थिक और जलवायु अंतर्संबंध पर प्रकाश डाला गया है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि क्षेत्र की आर्थिक सहनशीलता पर कई चुनौतियाँ असर डाल रही हैं, जिनमें कम होती उत्पादकता वृद्धि, सार्वजनिक ऋण का उच्च जोखिम और बढ़ती व्यापारिक तनाव शामिल हैं. "वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और गहरे होते जलवायु जोखिमों के कारण वित्तीय और मौद्रिक नीति निर्धारकों के लिए काम और भी कठिन हो गया है," ESCAP की कार्यकारी सचिव और संयुक्त राष्ट्र की उप महासचिव, अरमिदा सलसिया अलीसजहबाना ने कहा, इस बदलते परिप्रेक्ष्य को नेविगेट करने के लिए न केवल सही राष्ट्रीय नीतियों की आवश्यकता है, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक संभावनाओं को सुरक्षित रखने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए क्षेत्रीय सहयोग भी जरूरी है.

रिपोर्ट में 30 देशों का विश्लेषण किया गया, जिनमें से 11 देशों को मैक्रोइकॉनॉमिक दृष्टिकोण से अधिक जलवायु जोखिमों का सामना करने वाला बताया गया है. इनमें अफगानिस्तान, कंबोडिया, ईरान, कजाकिस्तान, लाओस, मंगोलिया, म्यांमार, नेपाल, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं.

विभिन्न देशों की जलवायु जोखिमों से निपटने की क्षमता में अंतर

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि क्षेत्र में जलवायु जोखिमों से निपटने की क्षमता में महत्वपूर्ण भिन्नताएँ हैं. जबकि कुछ देशों ने पर्याप्त जलवायु वित्त जुटाए हैं और हरित नीतियाँ अपनाई हैं, वहीं अन्य देशों को वित्तीय सीमाओं, कमजोर वित्तीय प्रणालियों और सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन की सीमित क्षमता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.

रिपोर्ट में यह भी चर्चा की गई है कि विभिन्न देश जलवायु परिवर्तन के आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए क्या नीतियाँ अपना रहे हैं. उदाहरण के लिए, दक्षिण कोरिया में औद्योगिक विकास और जलवायु लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश, कजाकिस्तान में कृषि पर निर्भरता के कारण जलवायु जोखिमों से निपटने के प्रयास और बांगलादेश जैसे तटीय देशों और वानुआतु जैसे छोटे द्वीप देशों में जलवायु प्रभावों से निपटने के लिए नीति क्रियावली जैसे कदम उठाए जा रहे हैं.

एशिया-प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक विकास की दर में धीमापन

हालाँकि, एशिया-प्रशांत क्षेत्र की विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ विश्व के अन्य हिस्सों की तुलना में अपेक्षाकृत सक्रिय बनी हुई हैं, 2024 में इनकी औसत आर्थिक वृद्धि दर 4.8 प्रतिशत रही, जो 2023 में 5.2 प्रतिशत और कोविड-19 महामारी से पहले के पाँच वर्षों में 5.5 प्रतिशत थी. सबसे कम विकसित देशों में, 2024 की औसत आर्थिक वृद्धि दर 3.7 प्रतिशत रही, जो कि सतत विकास लक्ष्य 8 के तहत निर्धारित 7 प्रतिशत वार्षिक जीडीपी वृद्धि लक्ष्य से काफी कम है.

श्रम उत्पादकता में गिरावट और विकास के अवसर

एशिया और प्रशांत में श्रम उत्पादकता की वृद्धि 2008 की वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से काफी धीमी हो गई है, जिसके कारण दुनिया की उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के साथ आय में समानता का स्तर भी घटा है. 2010 से 2024 तक, एशिया-प्रशांत के 44 विकासशील देशों में से केवल 19 देशों ने आय समानता हासिल की, जबकि 25 देश पीछे रह गए.

दीर्घकालिक आर्थिक समृद्धि के लिए आवश्यक उपाय

रिपोर्ट यह भी बताती है कि दीर्घकालिक आर्थिक समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए सरकारों को अधिक उत्पादक और उच्च मूल्यवर्धित आर्थिक क्षेत्रों में उन्नति हेतु सक्रिय समर्थन प्रदान करने की आवश्यकता है. इसके साथ ही, क्षेत्र को हरित उद्योगों और मूल्य श्रृंखलाओं में अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता का लाभ उठाकर आर्थिक वृद्धि के नए इंजन के रूप में इस पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है, साथ ही समावेशी क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने की जरूरत है जो विकसित और विकासशील देशों दोनों की विकास आकांक्षाओं को पूरा करता हो. क्षेत्रीय सहयोग, निवेश और समग्र आर्थिक रणनीतियों का समन्वय करके ही इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन से संबंधित जोखिमों को कम किया जा सकता है और सतत विकास के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है.


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