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द टाटा क्लब: टाटा संस की लिस्टिंग के पीछे परिवारों, बोर्डरूम और कारोबार की कहानी

टाटा विवाद के केंद्र में 18% हिस्सेदारी और इसके इर्द-गिर्द परिवारों, दोस्तों, वकीलों और निदेशकों का असाधारण नेटवर्क

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 59 minutes ago

पलक शाह

भारत के प्रमुख कारोबारी परिवारों की कहानी, जिनके हाथों में ताकत है, साथ ही उन पेशेवरों की, जिन्होंने दशकों तक उनकी मेजों पर बैठकर काम किया है.

17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड ने अपने चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को पांच और वर्षों के लिए पद पर बनाए रखने और भारत की सबसे प्रतिष्ठित निजी कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने की तैयारी करने के पक्ष में मतदान किया. टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा, जिनके ट्रस्ट के पास कंपनी की दो-तिहाई हिस्सेदारी है, ने इसके खिलाफ वोट किया. बोर्ड में ट्रस्ट्स के दूसरे प्रतिनिधि ने इसके पक्ष में वोट किया. रात होते-होते ट्रस्ट्स ने पूरे मतदान को अवैध घोषित कर दिया. और लगभग कोई भी उस चीज के बारे में बात नहीं कर रहा था, जिसने इस पूरे मामले को इतना महत्वपूर्ण बनाया: टाटा संस में 18.37% हिस्सेदारी, जो एक ऐसे परिवार के पास है जिसे पैसों की सख्त जरूरत है.

यह हिस्सेदारी शापूरजी पालोनजी समूह के पास है, वह परिवार जिसने कभी टाटा संस को साइरस मिस्त्री के रूप में चेयरमैन दिया था और 2016 में टाटा द्वारा उन्हें पद से हटाए जाने को देखा. टाटा संस का मूल्य करीब 12 लाख करोड़ रुपये आंका जाए तो मिस्त्री परिवार की हिस्सेदारी करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये की है, जो इसे भारतीय कारोबार की सबसे मूल्यवान संपत्तियों में से एक बनाती है. लेकिन यह ऐसी संपत्ति भी है जिसे शापूर या मिस्त्री परिवार खर्च नहीं कर सकता, क्योंकि यह एक ऐसी कंपनी में फंसी हुई है जिसका शेयर बाजार में कोई भाव नहीं है और जिससे निकलने का कोई आसान रास्ता नहीं है. दूसरी ओर टाटा ट्रस्ट्स हैं, जिनके पास टाटा संस की करीब दो-तिहाई हिस्सेदारी है और जो इसे निजी कंपनी बनाए रखना चाहते हैं.

इन दोनों के बीच आरबीआई का एक फैसला, बोर्ड का एक मतदान, चेयरमैन का दूसरा कार्यकाल और वह सवाल है, जिसे मुंबई के डिनर टेबलों पर वर्षों से बेहद शालीनता से टाला जाता रहा है: क्या टाटा संस को सूचीबद्ध होना चाहिए?

यह कहानी लिस्टिंग की नहीं है. यह इस बारे में है कि किसे इसकी जरूरत है, किसे नहीं है और जब यह फैसला लिया जाता है तो मेज के आसपास कौन बैठता है. मुंबई के कॉरपोरेट जंगल में कमरे में मौजूद लोग शायद ही कभी अजनबी होते हैं. यह किसी साजिश का चार्ट नहीं है और किसी पर डोर खींचने का आरोप लगाने की जरूरत नहीं है. डोर पहले से दिखाई दे रहे हैं.

18%

शुरुआत पैसे से करते हैं.

एसपी ग्रुप की हिस्सेदारी स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन और साइरस इन्वेस्टमेंट्स के जरिए रखी गई है और इसे कर्ज के बदले गिरवी रखा गया है.

इस गिरवी का लंबा इतिहास है. 2020 में समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी पर करीब 9,280 करोड़ रुपये का बाहरी कर्ज था, जबकि पूरे समूह का कर्ज 30,000 करोड़ रुपये से अधिक आंका गया था. उसी साल खबरें आई थीं कि रतन टाटा मिस्त्री परिवार की हिस्सेदारी खरीदने के लिए किसी साझेदार की तलाश कर रहे थे और एसपी ग्रुप ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि 70 साल से अधिक समय बाद अब टाटा समूह से अलग होने का समय आ गया है. तब भी बाधा स्पष्ट थी. एक प्रॉक्सी एडवाइजर ने कहा था कि टाटा समूह को कोई जल्दबाजी नहीं थी, जबकि एसपी ग्रुप को पैसों की सख्त जरूरत थी.

यह अलगाव कभी नहीं हुआ.

कर्ज भी खत्म नहीं हुआ. 2022 में एरेस एसएसजी और फैरालॉन ने टाटा संस के शेयरों के बदले समूह को 15,000 करोड़ रुपये तक का कर्ज देने पर सहमति जताई, जिसकी ब्याज दर 24% सालाना थी. इसका इस्तेमाल भारतीय बैंकों का कर्ज चुकाने के लिए किया जाना था. इस जुलाई में समूह ने 21,500 करोड़ रुपये का पुनर्वित्त पूरा किया और निवेशकों को बताया कि वह 18 महीनों के भीतर लिस्टिंग या शेयर बिक्री के जरिए टाटा संस की अपनी हिस्सेदारी के एक हिस्से को नकदी में बदल देगा.

यही केंद्रीय तनाव है. एसपी ग्रुप को नकदी चाहिए. टाटा ट्रस्ट्स लिस्टिंग नहीं चाहते.

बाहर निकलने का शांत रास्ता एक छोटी बिक्री थी. एसपी ग्रुप ने नोएल टाटा के साथ टाटा संस की करीब 2.5% हिस्सेदारी बेचने पर चर्चा की थी. इसके लिए बैंक या वित्तीय संस्थान को शामिल करते हुए कर-कुशल ढांचे का इस्तेमाल किया जाना था. इससे मिलने वाली रकम धीरे-धीरे एसपी ग्रुप तक पहुंचती और टाटा संस शायद पूरी तरह लिस्टिंग से बच जाता. यह प्रस्ताव टाटा संस में अटक गया और आरबीआई के निर्देश के बाद ही बोर्ड तक पहुंचा, जिसने लिस्टिंग को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया.

यहीं से कहानी व्यक्तिगत हो जाती है. 17 सितंबर को टाटा संस की बोर्ड बैठक में नोएल टाटा ने मिस्त्री परिवार को एक प्रस्ताव दिया: टाटा संस उनके इतने शेयर वापस खरीद लेगा कि उन्हें कम से कम 25,000 करोड़ रुपये मिल जाएं. यह भुगतान 18 महीनों में दो किस्तों में किया जाता. परिवार को उसका पैसा मिल जाता. टाटा संस निजी कंपनी बना रहता. ट्रस्ट्स का नियंत्रण कायम रहता.

नोएल टाटा उन ट्रस्ट्स के चेयरमैन हैं जो लिस्टिंग का विरोध करते हैं. वह साइरस मिस्त्री की बहन से विवाहित भी हैं. उनका प्रस्ताव एक साथ दोनों परिवारों को संतुष्ट करने की कोशिश था. मिस्त्री परिवार पहले ही अपना मन बना चुका था: छोटी हिस्सेदारी की बिक्री में देरी के बाद उसने लिस्टिंग के पक्ष में आना चुना, जिससे वह अपनी हिस्सेदारी को नकदी में बदल सकता था और अपने कर्ज को आसानी से संभाल सकता था. बोर्ड ने उसी दिन नोएल को जवाब दिया और लिस्टिंग के पक्ष में मतदान किया.

इसके बाद आने वाला हर संबंध उसी 18% हिस्सेदारी तक पहुंचता है.

बिक्री से पहले की बिक्री

18% हिस्सेदारी पहली एसपी संपत्ति नहीं है जिसे खरीदार की जरूरत पड़ी, और आखिरी बड़ा खरीदार एक जाना-पहचाना नाम था.

अक्टूबर 2021 में रिलायंस की एक सहायक कंपनी ने शापूरजी पालोनजी एंड कंपनी, दारूवाला परिवार और स्टर्लिंग एंड विल्सन सोलर के साथ चरणबद्ध तरीके से सोलर कंपनी में 40% हिस्सेदारी खरीदने पर सहमति जताई. कर्ज कम करने के लिए यह एक महीने में एसपी ग्रुप की दूसरी बड़ी संपत्ति बिक्री थी. इससे पहले यूरेका फोर्ब्स को एडवेंट इंटरनेशनल ने 4,400 करोड़ रुपये में खरीदा था.

शापूर मिस्त्री ने रिलायंस का कंपनी में स्वागत किया.

जिस कर्ज का बोझ अब 18% हिस्सेदारी पर है, उसी ने पहले भी एसपी की संपत्तियों को बिक्री के लिए बाजार में पहुंचाया था और रिलायंस पहले ही एक खरीदार बन चुका था.

शादियां

मुंबई के कारोबारी परिवार सिर्फ एक-दूसरे के साथ कारोबार नहीं करते. वे एक-दूसरे के परिवारों में भी शादी करते हैं.

नोएल टाटा की पत्नी आलू, साइरस मिस्त्री की बहन हैं. इसका मतलब है कि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन उस परिवार के बहनोई हैं, जिसके पास 18% हिस्सेदारी है. इसका मतलब यह भी है कि वह साइरस के बेटों, फिरोज और जहान के मामा हैं, जिन्हें मिस्त्री परिवार की हिस्सेदारी में साइरस का आधा हिस्सा विरासत में मिला. ट्रस्ट्स की लिस्टिंग के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति उन युवा वारिसों का मामा है, जिन्हें लिस्टिंग से फायदा होने की संभावना है.

अजय पीरामल के बेटे आनंद ने 2018 में ईशा अंबानी से शादी की, जिससे मुकेश अंबानी और अजय पीरामल समधी बन गए. यहां यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद के वर्षों में पीरामल कहां रहे.

और करण अडानी ने पारिधि श्रॉफ से शादी की, जो सिरिल श्रॉफ की बेटी हैं. सिरिल श्रॉफ की लॉ फर्म अब 18% हिस्सेदारी के भविष्य को लेकर चल रही लड़ाई में टाटा ट्रस्ट्स को सलाह दे रही है.

बोर्डरूम

2016 में टाटा ने घोषणा की कि अजय पीरामल और वेणु श्रीनिवासन टाटा संस के बोर्ड में गैर-कार्यकारी निदेशक के रूप में शामिल हुए हैं. पीरामल को 2019 में दूसरा तीन साल का कार्यकाल मिला. वर्षों तक मुकेश अंबानी की बेटी के ससुर उस बोर्ड में बैठे रहे, जिसे एक दिन 18% हिस्सेदारी के साथ क्या करना है, यह तय करना था.

टीवीएस के चेयरमैन श्रीनिवासन इस सवाल के दोनों पक्षों में हैं. वह टाटा संस बोर्ड में ट्रस्ट्स के नामित सदस्य और टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टी हैं. पिछले अक्टूबर में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने उनके ट्रस्टी पद का नवीनीकरण किया और उन्हें आजीवन ट्रस्टी बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया. जब लिस्टिंग के लिए मतदान हुआ, तो वही व्यक्ति अपने चेयरमैन से अलग जाकर वोट करने वाला था.

पुराने दोस्त

कुछ रिश्ते कभी शेयरधारकों के रजिस्टर में दिखाई नहीं देते, लेकिन फिर भी यह तय करते हैं कि कौन किसके साथ खड़ा है.

जब सितंबर 2022 में एक सड़क दुर्घटना में साइरस मिस्त्री की मौत हुई, तो शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने ट्वीट किया कि उनके भाई साइरस का निधन हो गया. द ट्रिब्यून ने उन्हें उन कुछ लोगों में बताया जो बोर्डरूम की लड़ाई के दौरान उनके साथ खड़े रहे थे और सबसे पहले शोक व्यक्त करने वालों में शामिल थीं.

फिर हैं मेहली मिस्त्री, जो साइरस के फर्स्ट कजिन हैं और रतन टाटा के करीबी विश्वासपात्र बने तथा उनके अंतिम वर्षों में उनकी देखभाल में मदद की. अक्टूबर 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद मेहली को वकील डेरियस खंबाटा और टाटा की सौतेली बहनों, शिरीन और डियाना जेजीभॉय के साथ उनकी वसीयत का एक्जीक्यूटर बनाया गया.

खंबाटा, जो महाराष्ट्र के पूर्व एडवोकेट जनरल रह चुके हैं, ने कभी रतन टाटा और साइरस मिस्त्री के बीच मध्यस्थता की थी, जैसा कि बिजनेसवर्ल्ड ने रिपोर्ट किया था. जुलाई में खबरें आई थीं कि नवंबर में उनका ट्रस्टी कार्यकाल समाप्त होने के बाद वह हट सकते हैं. लेकिन पिछले साल ट्रस्ट्स को लिखे एक पत्र में उन्होंने एक ऐसे पल को याद किया, जो अब एक त्रासदी की शुरुआत जैसा लगता है: रतन टाटा की मौत के बाद मेहली मिस्त्री ने नोएल टाटा को ट्रस्ट्स का चेयरमैन बनाने का प्रस्ताव रखा और खंबाटा ने इसका समर्थन किया.

एक साल बाद नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने मेहली की दो प्रमुख ट्रस्ट्स में पुनर्नियुक्ति का विरोध किया, जो टाटा संस की बहुमत हिस्सेदारी को नियंत्रित करती हैं. मेहली का कार्यकाल समाप्त हो गया. जिस व्यक्ति ने नोएल का नाम प्रस्तावित किया था, उसे नोएल के वोट के साथ ही बाहर कर दिया गया.

आरबीआई की मेज

लिस्टिंग की लड़ाई अपने मौजूदा चरण तक पहुंचने से बहुत पहले वही कॉरपोरेट दुनिया रिजर्व बैंक की केंद्रीय मेज पर मौजूद थी.

जब एस. गुरुमूर्ति 2018 में आरबीआई बोर्ड में शामिल हुए, तब एन चंद्रशेखरन पहले से ही सदस्य थे. गुरुमूर्ति चेन्नई के चार्टर्ड अकाउंटेंट, तमिल साप्ताहिक तुगलक के संपादक और व्यापक रूप से आरएसएस के प्रमुख विचारक के रूप में जाने जाते हैं. कुछ महीने बाद शक्तिकांत दास गवर्नर बने. भुवनेश्वर में जन्मे दास ने अपने आईएएस करियर का बड़ा हिस्सा तमिलनाडु कैडर में बिताया था, जिसमें राज्य के उद्योग विभाग के प्रधान सचिव के रूप में काम करना भी शामिल था. 2022 में सरकार ने आनंद महिंद्रा, वेणु श्रीनिवासन, पंकज पटेल और रवींद्र ढोलकिया को बोर्ड में शामिल किया. इससे एक और चेन्नई के उद्योगपति और टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टी इस मेज पर आ गए.

दास ने दिसंबर 2024 में मिंट स्ट्रीट छोड़ी और अब प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव-2 के रूप में कार्यरत हैं. टाटा संस के लिए सबसे महत्वपूर्ण फैसला बाद में उनके उत्तराधिकारी के कार्यकाल में आया, जब आरबीआई ने टाटा संस को अपना पंजीकरण छोड़ने और उस नियम से बचने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, जिसके तहत उसे सूचीबद्ध होना जरूरी है.

वकील

मुंबई का कानूनी जगत इससे भी छोटा है.

सिरिल श्रॉफ, जिन्होंने अंबानी से लेकर अडानी तक भारत के ज्यादातर अरबपति परिवारों को सलाह दी है, व्यक्तिगत रूप से नोएल टाटा और ट्रस्ट्स को सलाह दे रहे हैं. उनकी टीम में भारत वासनी भी हैं, जो 17 वर्षों से अधिक समय से टाटा संस के ग्रुप जनरल काउंसल हैं. वरिष्ठ अधिवक्ता अस्पी चिनॉय, जनक द्वारकादास, अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी के भी इसी पक्ष में रहने की खबर है.

दूसरी ओर शुभा मंडल हैं. सिरिल श्रॉफ के भाई द्वारा संचालित शार्दुल अमरचंद मंगलदास में उन्होंने 2016 में साइरस मिस्त्री को हटाए जाने के समय टाटा संस को सलाह दी थी और बाद में समूह के जनरल काउंसल बने. इससे पहले AZB & Partners में उनके ग्राहकों में रिलायंस शामिल था. उनकी फर्म एनाग्राम पार्टनर्स अब टाटा संस और चंद्रशेखरन का प्रतिनिधित्व करती है.

फिर हरीश साल्वे हैं, जो वर्षों से रिलायंस की ओर से पेश होते रहे हैं और साइरस मिस्त्री के खिलाफ टाटा संस की ओर से दलीलें दे चुके हैं. अब वह टाटा संस और चंद्रा को सलाह देते हैं और सार्वजनिक रूप से यह तर्क दे चुके हैं कि टाटा संस को एक सार्वजनिक कंपनी बनना चाहिए, जो वही नतीजा है जिसे 18% हिस्सेदारी रखने वाले परिवार अब चाहते हैं.

इस तरह दो भाई ऐसी प्रतिद्वंद्वी फर्में चलाते हैं जो एक ही बोर्डरूम में एक-दूसरे के विरोधी पक्षों में रह चुकी हैं. टाटा के दो पूर्व जनरल काउंसल विरोधी खेमों को सलाह दे रहे हैं. ट्रस्ट्स के वकील अडानी परिवार के समधी हैं और टाटा संस के वकीलों के रिज्यूमे में रिलायंस भी है.

मतदान

17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड ने चंद्रशेखरन को फरवरी 2027 से पांच और वर्षों के लिए कार्यकारी चेयरमैन के रूप में फिर से नियुक्त करने और लिस्टिंग की दिशा में कदम उठाने के पक्ष में 4-1 से मतदान किया.

नोएल टाटा ने दोनों प्रस्तावों के खिलाफ वोट किया, जबकि ट्रस्ट्स के दूसरे नामित सदस्य वेणु श्रीनिवासन ने पक्ष में मतदान किया. ट्रस्ट्स के अपने निदेशक भी बंट गए. इसके बाद ट्रस्ट्स ने मतदान को अमान्य घोषित कर दिया और तर्क दिया कि उनके नामित सदस्यों की सकारात्मक मंजूरी जरूरी थी.

पांच दिन बाद शरद पवार ने सार्वजनिक रूप से ट्रस्ट्स का समर्थन किया और कहा कि उनके अधिकारों और समूह के धर्मार्थ स्वामित्व की रक्षा की जानी चाहिए. जिस परिवार ने साइरस मिस्त्री को भाई की तरह शोक मनाया था, वही अब उस ट्रस्ट्स का बचाव कर रहा था, जिसके चेयरमैन उनके बहनोई हैं, जबकि साइरस का अपना परिवार उस लिस्टिंग के पक्ष में था, जिसका ट्रस्ट्स विरोध कर रहे थे. पवार की राजनीति एक अलग कहानी है. और वह अच्छी तरह जानते हैं कि मौजूदा सरकार शायद उससे बिल्कुल उलट चाहती हो, जिसका वह प्रस्ताव कर रहे हैं.

घटनाक्रम

पूरी समयरेखा को एक साथ रखने पर यह अपने आप में एक कहानी बताती है.

2016: साइरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाया गया. अजय पीरामल और वेणु श्रीनिवासन टाटा संस के बोर्ड में शामिल हुए.

2018: गुरुमूर्ति आरबीआई बोर्ड में शामिल हुए, जहां चंद्रशेखरन पहले से सदस्य थे. शक्तिकांत दास गवर्नर बने. ईशा अंबानी ने आनंद पीरामल से शादी की.

2020: एसपी ग्रुप ने कहा कि अब टाटा से अलग होने का समय आ गया है. खबरों के मुताबिक रतन टाटा मिस्त्री परिवार की हिस्सेदारी के लिए खरीदार की तलाश कर रहे थे.

2021: रिलायंस ने एसपी की स्टर्लिंग एंड विल्सन सोलर में हिस्सेदारी खरीदी.

2022: एसपी ग्रुप ने टाटा संस के शेयरों के बदले 24% ब्याज पर कर्ज लिया. वेणु श्रीनिवासन आरबीआई बोर्ड में शामिल हुए. साइरस मिस्त्री की मौत हुई.

अक्टूबर 2024: रतन टाटा का निधन हुआ. मेहली मिस्त्री के प्रस्ताव और डेरियस खंबाटा के समर्थन से नोएल टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन बने.

अक्टूबर 2025: मेहली मिस्त्री को ट्रस्ट्स से बाहर कर दिया गया.

जुलाई 2026: एसपी ग्रुप ने 21,500 करोड़ रुपये का पुनर्वित्त पूरा किया और 18 महीनों के भीतर टाटा संस की अपनी हिस्सेदारी को नकदी में बदलने का वादा किया.

सितंबर 2026: आरबीआई ने टाटा संस की डीरजिस्ट्रेशन की कोशिश को खारिज कर दिया. एसपी ग्रुप ने लिस्टिंग का समर्थन किया. नोएल टाटा ने 25,000 करोड़ रुपये के बायबैक का प्रस्ताव दिया. बोर्ड ने चंद्रशेखरन को 4-1 से फिर नियुक्त किया, जिसमें नोएल ने विरोध किया और वेणु ने समर्थन किया. ट्रस्ट्स ने मतदान को अमान्य घोषित कर दिया. शरद पवार ने ट्रस्ट्स का समर्थन किया.

संबंध साफ दिखाई देते हैं

क्या यह सिर्फ एक जटिल स्वामित्व ढांचे की वह प्रक्रिया थी, जो आखिरकार नियमन से टकरा गई? या मेज के आसपास मौजूद लोगों के पास 18% हिस्सेदारी के भविष्य को लेकर बिल्कुल अलग विचार थे?

रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं दिखता कि किसी ने कुछ योजना बनाई थी और ये संबंध हर दिशा में फैले हुए हैं. ट्रस्ट्स के अपने नामित सदस्यों ने अलग-अलग वोट दिए. ट्रस्ट्स के चेयरमैन ने अपने रिश्तेदारों को ऐसा रास्ता दिया, जिससे टाटा संस निजी बनी रहती; उन्होंने बाजार का रास्ता चुना. पवार परिवार ने एक मिस्त्री के निधन पर शोक जताया और ट्रस्ट्स का समर्थन किया. वकीलों ने सभी के लिए काम किया है.

18% हिस्सेदारी का पीछा कीजिए और यह आपको मुंबई के आधे से अधिक अभिजात कारोबारी वर्ग तक ले जाती है: उनकी शादियों, उनके बोर्डरूम, उनके केंद्रीय बैंक, उनकी अदालतों और उनके अंतिम संस्कारों तक.

क्लब छोटा है. हिस्सेदारी बड़ी है. और ये संबंध हमेशा से सबके सामने रहे हैं. टाटा क्लब उन वंशानुगत कारोबारी अभिजात वर्ग की कहानी है, जिनके हाथों में सारी ताकत है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


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