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बॉम्बे रेयॉन: SBI के बार-बार किए गए कर्ज बचाव की जांच जरूरी
भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ने प्रशांत अग्रवाल परिवार को बार-बार एक और मौका क्यों दिया? ₹4,000 करोड़ का CDR. ₹934 करोड़ का डेट-फॉर-शेयर्स स्वैप. फिर ₹5,600 करोड़ का S4A, जिसमें ₹2,249.74 करोड़ को "असस्टेनेबल" घोषित कर शेयरों और डिबेंचर्स में बदल दिया गया. पांच साल बाद दिवालिया प्रक्रिया.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 56 minutes ago
पलक शाह
सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (SFIO) ने बॉम्बे रेयॉन फैशन्स लिमिटेड (BRFL) की जांच शुरू कर दी है. मुंबई स्थित यह टेक्सटाइल समूह कभी खुद को भारत का सबसे बड़ा शर्ट निर्माता बताता था और अब परिसमापन में है. कंपनी पर स्वीकार की गई देनदारियां ₹7,358 करोड़ हैं, जिसमें वित्तीय लेनदारों का ₹6,690 करोड़ शामिल है.
BW द्वारा देखे गए 5 अगस्त 2026 के समन के अनुसार, केंद्र सरकार ने कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 212(1)(c) के तहत 30 अक्टूबर 2025 को SFIO को BRFL के मामलों की जांच करने का आदेश दिया था. SFIO के निदेशक ने एक जांच अधिकारी और दो निरीक्षकों की नियुक्ति की है और जांचकर्ता कंपनी से जुड़े लोगों को नई दिल्ली में पूछताछ के लिए बुला रहे हैं.
हालांकि, कुछ ऐसे सूत्र, जिनके पास आपत्तिजनक दस्तावेज हैं, मानते हैं कि SFIO को बॉम्बे रेयॉन और उसके प्रमोटरों, प्रशांत और जनार्दन अग्रवाल परिवार, को SBI की ओर से बार-बार दिए गए बचाव और जीवनदान की भी पूरी तरह जांच करनी चाहिए. सूत्रों के अनुसार, फंड के डायवर्जन का भी मामला है और अग्रवाल परिवार की कंपनियों के व्यापक नेटवर्क, "यार्न सप्लायर बिलों", कॉरपोरेट कनेक्शनों और सहायक कंपनियों के बीच धन के हस्तांतरण की जांच की जानी चाहिए. SFIO को अग्रवाल परिवार के सदस्यों, करीबी रिश्तेदारों और उनके नेटवर्क की संपत्तियों की भी जांच करनी चाहिए और जांच की शुरुआत SBI की मुंबई शाखा के उन अधिकारियों से होनी चाहिए, जिन पर सूत्रों ने बार-बार पुनर्गठन में मदद करने का आरोप लगाया है.
SFIO के आदेश में कंपनी का नाम है. लेकिन BRFL अकेले नहीं गिरी और न ही यह तेजी से गिरी. इसे बार-बार बचाया गया, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एक कंसोर्टियम ने, जिसकी अगुवाई स्टेट बैंक ऑफ इंडिया कर रहा था.
SBI सिर्फ एक पर्यवेक्षक नहीं था
BW द्वारा देखे गए पुनर्गठन दस्तावेजों के अनुसार, पहले पुनर्गठन के तहत यह लीड बैंक और मॉनिटरिंग संस्था था, यानी यह देखने के लिए जिम्मेदार बैंक कि कंपनी अपने वादे पूरे कर रही है या नहीं. तीसरे बचाव में उसे इक्विटी का सबसे बड़ा हिस्सा मिला. और अगस्त 2018 में, S4A के बमुश्किल 15 महीने बाद, SBI ने अपने ₹2,260.79 करोड़ के लोन एक्सपोजर को बिक्री के लिए रख दिया. JM Financial ARC ने अंततः इसे ₹900 करोड़ में खरीदा. यह अंतर ₹1,361 करोड़ था, SBI द्वारा पहले से किए गए प्रावधानों को शामिल किए बिना. सार्वजनिक धन का इतना प्रत्यक्ष नुकसान हुआ.
बचाव की कोशिशें रिकवरी पर खत्म नहीं हुईं. वे दिवालिया प्रक्रिया पर खत्म हुईं. आगे वह रिकॉर्ड है कि हर चरण में बैंक क्या देख सकता था और फिर भी उसने क्या किया.
रेड फ्लैग नंबर एक: मुनाफा कमाने वाली कंपनी जो भुगतान नहीं कर सकी
कागजों पर BRFL अब भी मुनाफा दर्ज कर रही थी. मार्च 2013 को समाप्त तिमाही में शुद्ध मुनाफा 16.6% बढ़कर ₹48.36 करोड़ हो गया था और शुद्ध बिक्री 12.5% बढ़कर ₹895.55 करोड़ हो गई थी. इसके बावजूद कुछ ही हफ्तों के भीतर कंपनी ने अपने ऋणदाताओं से पुनर्गठन के लिए संपर्क किया. विरोधाभास साफ था: एक तरफ लेखांकन मुनाफा और दूसरी तरफ ₹4,000 करोड़ की कर्ज समस्या.
19 जुलाई 2013 को बाजार बंद होने के बाद कंपनी ने जानकारी दी कि उसके बोर्ड ने कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. शेयर करीब 8% गिरकर ₹203.25 पर आ गया. मई 2008 में यह एक समय ₹418 तक कारोबार कर चुका था.
बढ़ता मुनाफा दिखाने वाली लेकिन अपने कर्ज का भुगतान करने में असमर्थ कंपनी के सामने ऋणदाताओं के पास दो संभावनाएं होती हैं: या तो उसका मुनाफा नकदी में नहीं बदल रहा था, या उसने कारोबार की क्षमता से कहीं अधिक कर्ज ले लिया था. दोनों ही स्थितियों में इस बात की कड़ी जांच होनी चाहिए थी कि पैसा कहां जा रहा था. इसके बजाय उसे SBI की निगरानी में बचाव मिला. पहला पुनर्गठन कर्ज की समस्या हल करने के लिए था. ऐसा नहीं हुआ.
लेकिन कंपनी की ओर से संकट की अपनी व्याख्या में एक और बात दर्ज थी: "सहायक कंपनियों को दिए गए अग्रिम". BRFL ने इसे बड़े पैमाने पर विस्तार, कमर्शियल पेपर के भुगतान, सरकारी सब्सिडी में देरी और बढ़ती कर्ज लागत के साथ उन कारणों में शामिल किया था, जिन्होंने उसके कैश फ्लो को प्रभावित किया और उसे ₹4,000 करोड़ के CDR की ओर धकेला.
यह सवाल कंपनी के केवल जरूरत से ज्यादा कर्ज लेने से कहीं बड़ा है. ₹4,000 करोड़ के बैंक बचाव की ओर बढ़ रही कंपनी अपनी सहायक कंपनियों को पैसा क्यों दे रही थी? किन कंपनियों को यह पैसा मिला? कितना मिला? किन शर्तों पर मिला? उन कंपनियों का नियंत्रण किसके पास था? और उस पैसे में से कितना वापस आया?
अग्रवाल परिवार का कंपनियों का नेटवर्क
यह नेटवर्क व्यापक था और सीमाओं के पार तक फैला था. कंपनी की फाइलिंग के अनुसार, BRFL की सहायक कंपनियों में Bombay Rayon Holdings Ltd, STI India Ltd, ब्रिटेन की DPJ Clothing Ltd, BRFL Bangladesh Pvt Ltd और दो इतालवी संस्थाएं BRFL Italia S.r.l तथा BRFL Italia Licensee S.r.l शामिल थीं, जिनके पास "GURU" गारमेंट ब्रांड था. प्रमोटर समूह में एक विदेशी कंपनी AAA United B.V. भी शामिल थी, जिसके पास BRFL की 13.83% हिस्सेदारी थी और कंपनी की अपनी फाइलिंग में इसे विदेशी प्रमोटर कंपनी के रूप में वर्गीकृत किया गया था.
अंत तक कंपनी इनमें से कई के बारे में हिसाब तक नहीं दे सकी. उसके ऑडिटरों और सेक्रेटेरियल ऑडिटरों ने दर्ज किया कि BRFL Textiles, BRFL Italia Licensee, STI India और DPJ Clothing के वित्तीय विवरण "उपलब्ध नहीं थे", BRFL Italia का कारोबार बंद हो चुका था और BRFL Bangladesh में कोई परिचालन नहीं था. जिस समूह की अपनी सहायक कंपनियों के खातों तक पहुंच नहीं थी, वह बैंक से हजारों करोड़ रुपये मांगते हुए उन्हें पैसा दे रहा था.
इसके जवाब संबंधित पक्षों के खुलासों और सहायक कंपनियों की किताबों में छिपे हैं. और यहीं से कहानी सिर्फ मंदी में फंसी एक टेक्सटाइल कंपनी की नहीं रह जाती, बल्कि अग्रवाल परिवार के व्यापक कॉरपोरेट नेटवर्क की ओर बढ़ती है.
रेड फ्लैग नंबर दो: बकाया ब्याज को शेयरों में बदलना
2015 के अंत तक ऋणदाता फिर सामने आए. 4 नवंबर 2015 की जॉइंट लेंडर्स फोरम की सिफारिश पर BRFL के बोर्ड ने ₹712.67 करोड़ के वर्किंग कैपिटल टर्म लोन और ₹221.58 करोड़ के फंडेड इंटरेस्ट टर्म लोन, यानी कुल ₹934.26 करोड़, को ऋणदाताओं के लिए इक्विटी में बदलने की मंजूरी दी.
जिस ब्याज का कंपनी भुगतान नहीं कर सकी, उसे पहले नए कर्ज में बदल दिया गया. अब उस कर्ज को शेयरों में बदल दिया गया. बैंक ऐसे कर्जदार के आंशिक मालिक बन गए थे, जो उन्हें भुगतान नहीं कर पा रहा था.
रेड फ्लैग नंबर तीन: कर्मचारियों का पैसा
अप्रैल 2016 में चेतावनी को नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया.
बोइसर MIDC पुलिस ने BRFL के तीन निदेशकों, प्रशांत अग्रवाल, जनार्दन अग्रवाल और अमन अग्रवाल के खिलाफ मामला दर्ज किया. उन पर अक्टूबर 2014 से दिसंबर 2015 के बीच कंपनी के तारापुर संयंत्र में करीब 1,400 कर्मचारियों से काटे गए ₹1.90 करोड़ के प्रोविडेंट फंड योगदान के गबन का आरोप लगाया गया. उस समय मुंबई मिरर की एक रिपोर्ट के अनुसार, आरोप था कि यह पैसा सरकार के पास जमा करने के बजाय निदेशकों के बीच बांट दिया गया, जबकि जमा SBI की अपनी बोइसर शाखा में किया जाना था. प्रोविडेंट फंड निरीक्षक की शिकायत पर भारतीय दंड संहिता की धारा 406 के तहत आपराधिक विश्वासघात का मामला दर्ज किया गया था.
जिस समय ऋणदाता दूसरे बचाव पर बातचीत कर रहे थे, उन्हीं महीनों में कथित तौर पर कर्मचारियों का पैसा गायब हुआ. जॉइंट लेंडर्स फोरम की बैठक भी इसी अवधि में हुई थी. शेयरधारकों द्वारा इस बदलाव पर मतदान करने से कुछ सप्ताह पहले यह मामला सार्वजनिक हुआ. तब तक शेयर गिरकर ₹133.60 पर आ चुका था, जो पहले बचाव के समय के स्तर से एक तिहाई कम था.
आरोप किसी कारोबारी गलत फैसले का नहीं था. यह कर्मचारियों के वेतन से उनकी सेवानिवृत्ति के लिए काटे गए पैसे से जुड़ा था. हजारों करोड़ रुपये का और कर्ज देने पर विचार कर रहे किसी ऋणदाता के लिए इससे ज्यादा स्पष्ट संकेत की कल्पना करना मुश्किल है.
और यह यहीं नहीं रुका. छह साल बाद कंपनी की अपनी वार्षिक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि 31 मार्च 2022 तक छह महीने से अधिक समय से बकाया प्रोविडेंट फंड देनदारी ₹18.60 करोड़ थी, कर्मचारी राज्य बीमा की देनदारी ₹4.46 करोड़ थी और PF, ESIC तथा TDS पर ब्याज और जुर्माना ₹15.02 करोड़ था. 2016 में आपराधिक मामला शुरू कराने वाले ₹1.90 करोड़ के मुकाबले 2022 तक कर्मचारियों की बकाया देनदारी लगभग दस गुना हो चुकी थी.
निदेशक पूरे समय पद पर बने रहे. 27 सितंबर 2019 की वार्षिक आम बैठक में शेयरधारकों ने पुलिस मामले के तीन साल बाद भी प्रशांत अग्रवाल को दो और वर्षों के लिए प्रबंध निदेशक के रूप में फिर नियुक्त किया. 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट में भी अमन अग्रवाल और प्रशांत अग्रवाल का कार्यकाल रोटेशन के आधार पर समाप्त हो रहा था और दोनों ने फिर नियुक्ति की पेशकश की थी.
रेड फ्लैग नंबर चार: घाटा और सिकुड़ता कारोबार
आंकड़े भी गलत दिशा में जा रहे थे. सितंबर 2016 को समाप्त तिमाही में BRFL ने ₹53.56 करोड़ का शुद्ध घाटा दर्ज किया.
यह वही कंपनी थी जिसके सामने बैठकर ऋणदाताओं ने अगले बचाव की योजना तैयार की.
तीसरा बचाव: S4A
अप्रैल 2017 में, PF मामले के एक साल बाद, बैंकों ने RBI की स्ट्रेस्ड एसेट्स की सस्टेनेबल स्ट्रक्चरिंग योजना यानी S4A के तहत अब तक का सबसे व्यापक बचाव मंजूर किया. यह RBI की S4A योजनाओं के तहत सबसे बड़े कर्ज पुनर्गठनों में से एक था.
S4A दस्तावेजों के अनुसार, इस पैकेज में करीब ₹5,600 करोड़ का कर्ज शामिल था. इसमें से ₹2,249.74 करोड़ को असस्टेनेबल घोषित किया गया और इक्विटी तथा डिबेंचर्स में बदल दिया गया. BRFL के बोर्ड ने 25 अप्रैल 2017 की बैठक में S4A योजना के तहत ऋणदाताओं को तरजीही आधार पर अधिकतम 126,655,304 शेयर जारी करने को मंजूरी दी. ये विस्तारित शेयर पूंजी का 39.89% थे. इसके अलावा ₹1,000 अंकित मूल्य वाले वैकल्पिक रूप से परिवर्तनीय डिबेंचर्स भी जारी किए जाने थे, जिनकी कुल राशि ₹410 करोड़ से अधिक नहीं होनी थी. इसे मंजूरी देने के लिए 20 मई 2017 को असाधारण आम बैठक बुलाई गई.
योजना को एक और मंजूरी भी मिली
1 जून 2017 को CNBC-TV18 ने बताया कि बॉम्बे रेयॉन को बैंकों की ओवरसाइट कमेटी से S4A की मंजूरी मिल गई है. यह RBI द्वारा अनिवार्य संस्था थी, जिसका उद्देश्य ऐसे पैकेजों की स्वतंत्र समीक्षा करना था. उस समिति में कौन था, उसे कौन-सी सामग्री दिखाई गई और उसने क्या जांचा, ये सभी सवाल अब इसी जांच की कड़ी का हिस्सा हैं. इसकी जांच होनी चाहिए और इससे पूरी तस्वीर सामने आ सकती है.
SBI को सबसे बड़ा हिस्सा मिला. दस्तावेजों के अनुसार, S4A के तहत उसे 43.74 मिलियन शेयर और डिबेंचर्स आवंटित किए गए और बाद में 19.31 मिलियन अतिरिक्त शेयर तथा 106,732 डिबेंचर्स भी दिए गए.
आम शेयरधारकों के लिए यह भारी हिस्सेदारी कमी थी. जनवरी 2018 तक BRFL की इक्विटी पूंजी 2013 के ₹134.60 करोड़ से बढ़कर ₹317.48 करोड़ हो गई थी. शेयरों की संख्या दोगुने से अधिक हो गई थी और नए शेयर मुख्य रूप से नए पैसे लाने वाले निवेशकों को नहीं, बल्कि खराब कर्ज के बदले शेयर लेने वाले ऋणदाताओं को दिए गए थे. नतीजा यह हुआ कि मार्च 2022 तक वित्तीय संस्थानों और बैंकों के पास बॉम्बे रेयॉन फैशन्स की 51.88% हिस्सेदारी थी. ऋणदाता कंपनी के मालिक बन चुके थे.
S4A उन दबावग्रस्त कर्जदारों के लिए था जिनके कारोबार को कम से कम आधे कर्ज की सर्विसिंग करने में सक्षम माना जाता था. BRFL के मामले में ऋणदाताओं ने ₹5,600 करोड़ के पैकेज में से ₹3,390 करोड़, यानी करीब 60%, को सस्टेनेबल माना.
उन्होंने यह आकलन उस कंपनी के लिए किया था जो एक CDR में विफल रही थी, जिसे डेट-फॉर-शेयर्स स्वैप की जरूरत पड़ी थी, जो तिमाही घाटा दर्ज कर रही थी और जिसके निदेशकों पर कर्मचारियों के पैसे से जुड़े आपराधिक मामले में आरोप थे.
कंपनी के अपने नतीजों ने जल्द ही दिखा दिया कि ये कैश फ्लो वास्तव में क्या थे. सितंबर 2017 को समाप्त तिमाही में BRFL को ₹14.56 करोड़ का घाटा हुआ और उसकी शुद्ध बिक्री 31.2% घटकर ₹675.05 करोड़ रह गई.
शेयर कीमत में उछाल और फिर गिरावट
इसके बाद शेयर में ऐसी तेजी आई जिसे बुनियादी कारोबारी प्रदर्शन से समझाना मुश्किल था.
17 अक्टूबर 2017 को ₹111 के निचले स्तर से BRFL के शेयर लगभग दो महीने में दोगुने हो गए और 18 दिसंबर को ₹232.50 तक पहुंच गए. कारोबार में कोई सुधार नहीं हुआ था; कंपनी अब भी घाटे में थी और उसका कारोबार सिकुड़ रहा था.
फिर शेयर की कीमत गिरने लगी. 15 दिसंबर 2017 को ₹224.75 के बंद भाव से शेयर 11 कारोबारी सत्रों में 49.96% गिरकर 2 जनवरी 2018 को ₹112.45 पर आ गया. उस दिन शेयर निचले सर्किट पर बंद हुआ.
यह तेजी S4A की कीमत तय होने के महीनों बाद आई थी, इसलिए इसका कन्वर्जन पर असर नहीं पड़ा. लेकिन एक घाटे में चल रही कंपनी का शेयर कुछ ही हफ्तों में दोगुना और फिर आधा हो जाना, खासकर तब जब देश का सबसे बड़ा बैंक उसका एक बड़ा शेयरधारक बन चुका था, ऐसे सवाल खड़े करता है जिनका जवाब SEBI के ट्रेडिंग रिकॉर्ड से मिल सकता है: तेजी के दौरान किसने खरीदा और गिरावट के दौरान किसने बेचा?
बाहर निकलने की कोशिश जो पूरी नहीं हुई
2018 के मध्य तक SBI के पास BRFL की 29.28% हिस्सेदारी थी, जो किसी भी अन्य संस्थान से अधिक थी. Axis Bank के पास 8.04% और छह अन्य ऋणदाताओं के पास 1.61% से 3.35% के बीच हिस्सेदारी थी.
अगस्त 2018 में, S4A को मंजूरी दिए जाने के बमुश्किल 15 महीने बाद, SBI ने अपना खाता एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों, बैंकों और NBFCs को बिक्री के लिए रखा. इसमें ₹2,260.79 करोड़ की देनदारी दिखाई गई थी, जिसमें उसकी इक्विटी शामिल नहीं थी. JM Financial ARC ने यह कर्ज खरीदा. Capitalmind के विश्लेषण के अनुसार, उसने SBI के ₹2,261 करोड़ के एक्सपोजर के लिए ₹900 करोड़ का भुगतान किया. इसमें करीब 60% की हेयरकट थी, जिसमें ₹840 करोड़ नकद और बाकी सिक्योरिटी रिसीट्स के रूप में थे.
मई 2017 में ऋणदाताओं ने इस कंपनी के ₹3,390 करोड़ कर्ज को सस्टेनेबल प्रमाणित किया था. 15 महीने बाद SBI इसे एक रुपये के 40 पैसे के बराबर कीमत पर बेच रहा था, लेकिन बैंक पूरी तरह बाहर नहीं निकला.
लोन बेचने के काफी समय बाद भी SBI BRFL का सबसे बड़ा एकल शेयरधारक बना रहा. कंपनी की 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2022 को State Bank of India के पास 91,352,087 शेयर यानी 28.77% हिस्सेदारी थी, जबकि Axis Bank के पास 25,520,484 शेयर यानी 8.04% हिस्सेदारी थी. तब तक इन शेयरों की कीमत उस कर्ज की तुलना में बहुत कम रह गई थी, जिसे उन्होंने बदला था.
अन्य ऋणदाता बाहर निकलने की कोशिश में लगे रहे. Punjab National Bank ने अक्टूबर 2021 से फरवरी 2022 के बीच कई सौदों में अपनी करीब 75.8 लाख शेयरों की पूरी हिस्सेदारी बेच दी और अंत में उसके पास कोई हिस्सेदारी नहीं बची. प्रमोटर शेयर भी बेचे जा रहे थे. प्रमोटर इकाई Ashwell Holding Company Pvt Ltd ने 2021-22 के दौरान अपनी हिस्सेदारी 7.92% से घटाकर 1.39% कर दी. प्रशांत अग्रवाल की अपनी हिस्सेदारी भी उस समय घट गई, जब कंपनी ने इसे ऋणदाता द्वारा गिरवी रखे शेयरों के आह्वान के रूप में बताया.
₹888 करोड़ जो राइट-ऑफ में गायब हो गए
इसके बाद अकाउंटिंग का हिसाब सामने आया और यह सीधे सूत्रों की ओर से लगाए गए सप्लायर बिलों तथा कंपनी से बाहर धन जाने के आरोपों की ओर इशारा करता है.
2021-22 में BRFL का घाटा ₹299.95 करोड़ से बढ़कर ₹1,147.20 करोड़ हो गया. कंपनी की निदेशकों की रिपोर्ट में इसका कारण बताया गया: घाटा "मुख्य रूप से कंपनी द्वारा अप्रचलित और गैर-गतिशील इन्वेंट्री में हुए नुकसान तथा वसूल न किए जा सकने वाले कर्ज को राइट ऑफ करने" के कारण हुआ. अकेले असाधारण मद ₹888.07 करोड़ की थी.
एक ही साल में करीब ₹900 करोड़ की इन्वेंट्री और रिसीवेबल्स को राइट ऑफ किया गया. इन गैर-वसूली योग्य देनदारियों का भुगतान किसे करना था? कौन-सी इन्वेंट्री बेकार हो गई और उसे कब खरीदा गया? यही वे सवाल हैं जो SFIO और CBI के जांचकर्ता कंपनी के ऑडिटरों से पूछ सकते हैं और यही वे लेजर हैं जिन्हें सूत्रों के अनुसार यार्न सप्लायर बिलों के साथ जांचा जाना चाहिए.
इस राइट-ऑफ के साथ दो तथ्य भी जुड़े हैं.
पहला, उसी साल की निदेशकों की रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनी के वैधानिक ऑडिटरों ने कंपनी अधिनियम की धारा 143(12) के तहत धोखाधड़ी की कोई घटना रिपोर्ट नहीं की थी. दूसरा, ₹1,147 करोड़ के घाटे और ₹18.60 करोड़ के बकाया प्रोविडेंट फंड के उसी साल में चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर अमन अग्रवाल ने वेतन और भत्तों के रूप में ₹2.35 करोड़ लिए.
वह संपत्ति जो बाहर चली गई
जब मूल कंपनी डूब रही थी, उसी समय उसका सबसे अच्छा कारोबार एक नई इकाई में स्थानांतरित कर दिया गया.
BRFL Textiles Private Limited को 20 अगस्त 2020 को शामिल किया गया और 30 सितंबर 2020 की वार्षिक आम बैठक में शेयरधारकों ने तारापुर कारोबार को स्लंप सेल के जरिए एक चालू कारोबार के रूप में BRFL Textiles को हस्तांतरित करने की मंजूरी दी.
इसका असर आंकड़ों में दिखता है. 2021-22 में BRFL ने खुद केवल ₹83.08 करोड़ का राजस्व अर्जित किया, क्योंकि "तैयार कपड़े के निर्माण का प्रमुख कारोबार वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान कंपनी से अलग कर दिया गया था." नई कंपनी, जिसमें BRFL की 70% हिस्सेदारी थी, ने ₹731.67 करोड़ का टर्नओवर, ₹1,101.61 करोड़ की कुल संपत्ति और ₹218.36 करोड़ का घाटा दर्ज किया, ये आंकड़े अस्थायी थे और ऑडिटेड नहीं थे, क्योंकि इसके वित्तीय विवरण खुद इसकी मूल कंपनी को उपलब्ध नहीं थे.
जिस सूचीबद्ध कंपनी से यह कारोबार निकला था, उसकी तुलना में नौ गुना राजस्व, ऐसी इकाई में था जिसके खाते सूचीबद्ध मूल कंपनी हासिल नहीं कर सकी, और यह सब उस मूल कंपनी के दिवालिया प्रक्रिया में जाने से दो साल पहले हुआ.
पतन
कंपनी ने बाद में स्वीकार किया कि बचाव की कोशिशें विफल हो चुकी थीं. 2020 के एक बयान में उसने कहा कि उसके कर्ज को RBI की योजनाओं के तहत दो बार पुनर्गठित किया गया, लेकिन इनसे उसे जरूरी कार्यशील पूंजी नहीं मिली, इसलिए उसकी फैक्ट्रियां कभी पूरी क्षमता से इस्तेमाल नहीं हो सकीं.
सितंबर 2020 तक BRFL पर करीब ₹5,110 करोड़ का कर्ज था और एक साल में उसका राजस्व 61% गिरकर ₹251 करोड़ रह गया था. कंपनी को ब्याज और कर से पहले भी घाटा हो रहा था. उसकी अपनी वार्षिक रिटर्न के अनुसार 1 अप्रैल 2021 तक कुल देनदारी ₹4,704.74 करोड़ थी, जिसमें ₹4,692.29 करोड़ ब्याज था, जिसका भुगतान नहीं किया गया था.
अगस्त 2021 में मैनेजिंग डायरेक्टर प्रशांत अग्रवाल को मुंबई इकाई के डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ GST इंटेलिजेंस ने कथित ₹55.8 करोड़ के इनपुट टैक्स क्रेडिट फ्रॉड के मामले में गिरफ्तार किया. उन पर CGST Act के तहत मामला दर्ज किया गया और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा गया.
मई 2022 तक कंपनी एक कामकाजी सूचीबद्ध इकाई भी नहीं रह गई थी. SEBI के लिस्टिंग नियमों के अनुपालन और जुर्माने तथा लिस्टिंग फीस का भुगतान न करने के कारण शेयर बाजारों ने 23 मई 2022 से उसके सिक्योरिटीज में कारोबार निलंबित कर दिया.
अंत एक यार्न कारोबारी की ओर से आया, जिसे ₹1.61 करोड़ का भुगतान किया जाना था. 7 जून 2022 को NCLT ने चिरंजीलाल यार्न ट्रेडर्स के एकमात्र मालिक विकास परासरम्पुरिया की याचिका पर BRFL को दिवालिया प्रक्रिया में भेज दिया. प्रशांत अग्रवाल की अपील को NCLAT ने 15 जुलाई 2022 को खारिज कर दिया. JM Financial के ₹6,080 करोड़ के स्वीकृत दावे ने उसे क्रेडिटर्स कमेटी में 90.80% वोट दिए, जबकि Axis Bank के ₹610.86 करोड़ के स्वीकृत दावे से बाकी हिस्सा था. Donear, Welspun और Arvind ने रुचि दिखाई थी, लेकिन ऋणदाताओं ने हर योजना को खारिज कर दिया और 9 नवंबर 2023 को ट्रिब्यूनल ने परिसमापन का आदेश दिया.
जो शेयर कभी ₹418 पर कारोबार करता था, वह 5 दिसंबर 2022 को ₹1.58 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गया. उस समय पूरी कंपनी का मूल्य करीब ₹58 करोड़ था.
SFIO और CBI को बैंक के भीतर भी जांच क्यों करनी चाहिए
चेतावनी संकेतों को एक साथ रखिए: बढ़ते मुनाफे के आधार पर पुनर्गठन का अनुरोध; ऐसी सहायक कंपनियों को पैसा देना जिनके खातों तक मूल कंपनी की पहुंच नहीं थी; ब्याज को कैपिटलाइज कर शेयरों में बदलना; कर्मचारियों के रिटायरमेंट के पैसे लेने के आरोप में निदेशकों के खिलाफ आपराधिक शिकायत; तिमाही घाटा; शेयर की लगातार गिरती कीमत. इनमें से हर संकेत SBI और उसके साझेदारों द्वारा S4A को मंजूरी देने से पहले मौजूद था. बैंक को बाद की जानकारी की जरूरत नहीं थी. उसे केवल अपनी फाइलें पढ़ने की जरूरत थी.
तो SBI लगातार हां क्यों कहता रहा?
हो सकता है बैंक अधिकारियों को सबूतों के विपरीत यह भरोसा रहा हो कि एक और बचाव काम करेगा. हो सकता है पुनर्गठित खराब कर्ज को अभी खराब कर्ज के रूप में दर्ज न करना किसी की बैलेंस शीट या करियर के लिए बेहतर हो. या फिर कुछ और हो सकता है. यह निर्णय की विफलता थी, जांच-पड़ताल की विफलता थी या कुछ और गंभीर, यह जांच से ही तय होना चाहिए और यही वह सवाल है जिसका जवाब अभी किसी से नहीं मांगा गया है.
SFIO कंपनियों की जांच करता है और उसके आदेश में BRFL का नाम है. लेकिन कंपनी अधिनियम उसके निरीक्षकों को कंपनी के मामलों से जुड़े रिकॉर्ड और लोगों की जांच करने के व्यापक अधिकार देता है. और BRFL के मामलों से उसके लीड बैंक की लोन फाइलों से ज्यादा जुड़े रिकॉर्ड कोई नहीं हैं: प्रत्येक बचाव के लिए आंतरिक मंजूरी नोट, जॉइंट लेंडर्स फोरम की बैठक के मिनट्स, CDR Empowered Group के दस्तावेज, S4A का viability assessment और techno-economic viability report, RBI द्वारा अनिवार्य Oversight Committee के सामने रखे गए दस्तावेज, "सस्टेनेबल" कर्ज के आंकड़े के पीछे के कैश-फ्लो अनुमान और प्रमोटरों से बैंकों द्वारा मांगी गई या न मांगी गई पूंजी.
अगर ये फाइलें बैंकों के भीतर किसी चूक की ओर इशारा करती हैं, तो CBI, RBI और SBI की अपनी विजिलेंस विंग को इसकी जांच आगे बढ़ानी होगी.
सवाल सरल हैं और इनका जवाब शपथ के तहत मिलना चाहिए
SBI में किसने प्रत्येक बचाव की सिफारिश और मंजूरी दी?
क्या उन्होंने S4A को मंजूरी देने से पहले 2016 की पुलिस शिकायत पढ़ी थी? अगर हां, तो उन्होंने उन्हीं निदेशकों को पद पर क्यों बने रहने दिया?
किस कैश-फ्लो आंकड़ों के आधार पर घाटे में चल रही और सिकुड़ती कंपनी के कर्ज को "60% सस्टेनेबल" माना गया और Oversight Committee के सामने क्या रखा गया था?
क्या किसी ऋणदाता ने सहायक कंपनियों को दिए गए अग्रिमों या एक ही साल में राइट ऑफ किए गए ₹888.07 करोड़ के इन्वेंट्री और रिसीवेबल्स की जांच की?
क्या किसी ने 2017 में उस शेयर की तेजी और गिरावट की जांच की, जिसका बैंक कुछ ही समय पहले बड़ा शेयरधारक बना था?
और एक खाते पर ₹1,300 करोड़ से अधिक गंवाने के बाद भी, जब वह ₹58 करोड़ मूल्य वाली कंपनी में 28.77% हिस्सेदारी रखता था, क्या भारत के सबसे बड़े बैंक ने किसी एक अधिकारी से इसका स्पष्टीकरण मांगा?
BW ने SBI को विस्तृत सवाल भेजे, लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला है. SBI की ओर से जवाब मिलने पर उसे शामिल किया जाएगा.
अगली कड़ी: आज बॉम्बे रेयॉन की सबसे मूल्यवान संपत्ति को कौन नियंत्रित करता है.
बॉम्बे रेयॉन ने ₹4,000 करोड़ के बैंक बचाव को एक ऐसे कॉरपोरेट खेल में बदल दिया, जिसमें कंपनी की असली संपत्ति और नियंत्रण की तस्वीर लगातार बदलती रही.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
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