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सेबी का निप्पॉन-यस बैंक मामले को सयोनारा, सीबीआई अभी भी कह रहा है, इतनी जल्दी नहीं
निप्पॉन इंडिया MF को करीब ₹92.46 करोड़ का भुगतान करना होगा. कंपनी के सीईओ सुंदीप सिक्का और फंड मैनेजर अमित त्रिपाठी को 2.1-2.1 करोड़ रुपये देने होंगे. सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में कुल भुगतान करीब ₹97 करोड़ होगा. सेबी का आदेश जल्द जारी होने की उम्मीद है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 hours ago
पलक शाह
भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (SEBI) ने निप्पॉन इंडिया म्यूचुअल फंड (Nippon India Mutual Fund) और उसके तीन शीर्ष अधिकारियों के साथ सहमति के आधार पर निपटान को मंजूरी दे दी है. यह मामला यस बैंक के Additional Tier-1 (AT1) बॉन्ड में फंड हाउस के निवेश से जुड़ा है. मामले से परिचित लोगों के अनुसार, इससे करीब दो साल पहले नियामक की ओर से जारी किया गया कारण बताओ नोटिस बंद हो जाएगा.
सूत्रों ने कहा कि कारण बताओ नोटिस दो साल पहले जारी किया गया था, लेकिन इस पूरे समय में न तो फंड हाउस और न ही उसके अधिकारियों ने कोई जवाब दाखिल किया और सेबी ने भी उनसे ऐसा करने के लिए दबाव नहीं डाला. दो साल, कोई जवाब नहीं. क्या किसी छोटे खिलाड़ी को भी इतनी ही गुंजाइश दी जाती? यह एक ऐसा सवाल है जो उद्योग के बाकी हिस्से में उठ सकता है.
निपटान के तहत निप्पॉन लाइफ इंडिया एस्सेट मैनेजमेंट करीब ₹92.46 करोड़ का भुगतान करेगी, सूत्रों ने कहा. फंड हाउस के सीईओ और वर्तमान में एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) के चेयरमैन सुंदीप सिक्का ₹2.1 करोड़ का भुगतान करेंगे. हेड फंड मैनेजर अमित त्रिपाठी भी ₹2.1 करोड़ का भुगतान करेंगे और पूर्व चीफ रिस्क ऑफिसर मिलिंद नेसारिकर ₹25.83 लाख का भुगतान करेंगे. कुल मिलाकर राशि करीब ₹97 करोड़ है. सूत्रों के अनुसार कुल आंकड़ा ₹97-100 करोड़ के बीच है.
सेबी की सेटलमेंट प्रोसीडिंग्स रेगुलेशन्स के तहत सभी सहमति-आधारित निपटारों की तरह, आवेदक आरोपों को स्वीकार या अस्वीकार किए बिना निपटान राशि का भुगतान करते हैं. आदेश पारित होने के बाद सेबी की ओर से उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो जाती है. यह बाजार नियामक का यह कहने का तरीका है कि "आइए, इस बारे में बात करना बंद करने पर सहमत होते हैं."
वह फाइल जिसने डेस्क बदले
निपटान आदेशों पर सेबी के पूर्णकालिक सदस्य हस्ताक्षर करते हैं. सूत्रों के अनुसार, इस मामले ने वहां पहुंचने के लिए थोड़ा लंबा रास्ता तय किया. सूत्रों के अनुसार, फाइल सबसे पहले पूर्णकालिक सदस्य वर्षनी के पास गई. उन्होंने खुद को इस मामले से अलग कर लिया क्योंकि उस समय उनके कार्यकाल में कुछ ही दिन बचे थे और बाद में उन्हें कार्यकाल में विस्तार मिला. इसके बाद फाइल KVR मूर्ति के पास गई, जिन्होंने अपने साथी पूर्णकालिक सदस्य संदीप प्रधान के साथ मिलकर इस पर हस्ताक्षर किए, सूत्रों ने कहा.
सेबी के नियम किसी फाइल को नए हस्ताक्षरकर्ता तक पहुंचने से नहीं रोकते. लेकिन इतने संवेदनशील मामले में यह एक ऐसा विवरण है जिस पर बाजार पर नजर रखने वाले ध्यान दे सकते हैं.
इस बीच, सीबीआई
यह निपटान ऐसे आपराधिक मामले के साथ असहज रूप से जुड़ा हुआ है, जिसमें निपटारे के कोई संकेत नहीं हैं. सीबीआई पहले ही इस मामले में आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है. यह मामला कथित ₹2,797 करोड़ के quid pro quo arrangement से जुड़ा है, जिसमें उस समय रिलायंस निप्पॉन MF के नाम से जाने जाने वाले फंड हाउस और यस बैंक के बीच संबंध था. एजेंसी ने यस बैंक के पूर्व प्रमुख राणा कपूर और उद्योगपति अनिल अंबानी के खिलाफ आरोप लगाए हैं. सूत्रों ने कहा कि एजेंसी EPFO फंड के कथित दुरुपयोग की भी जांच कर रही है और एक और आरोपपत्र दाखिल किए जाने की उम्मीद है.
सेबी का निपटान, सेबी की अपनी कार्यवाही को समाप्त करता है. यह सीबीआई पर बाध्यकारी नहीं है और न ही इसका आपराधिक अभियोजन पर कोई असर पड़ता है. इसलिए नियामक ने अपना मामला बंद कर दिया है, जबकि जांच एजेंसी अपनी जांच को आगे बढ़ा रही है.
कई कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि घटनाक्रम का यह क्रम असहज मिसाल कायम कर सकता है. यदि किसी नियामक द्वारा उसी तथ्यों पर चल रही आपराधिक जांच के दौरान मामला निपटाया जाता है, तो इससे मिले-जुले संकेत जाने का जोखिम रहता है. आखिरकार, इसका असर मायने रख सकता है.
दो आवेदक अंदर, दो बाहर
सूत्रों ने कहा कि इसी मामले में सेबी ने अनिल अंबानी और राणा कपूर के निपटान आवेदनों को खारिज कर दिया.
सिक्योरिटीज वकीलों ने कहा कि इस विभाजित नतीजे को चुनौती दिए जाने की संभावना है. दोनों व्यक्ति अदालतों (Securities Appellate Tribunal) के सामने यह तर्क दे सकते हैं कि एक ही लेनदेन में शामिल आवेदकों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया गया. एक वकील ने कहा कि सेबी जैसी अनुभवी नियामक संस्था इस संभावना से अच्छी तरह वाकिफ होगी. अधिक दिलचस्प सवाल यह है कि वह इस अंतर का बचाव किस तरह करेगी.
इन आवेदनों की समीक्षा सेबी की हाई पॉवर्ड एडवाइजरी कमेटी (HPAC) ने की, जो निपटान आदेशों और अपराधों के समझौते से जुड़े मामलों पर विचार करती है. समिति की अध्यक्षता कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जय नारायण पटेल करते हैं. इसके अन्य सदस्यों में पूर्व कानून सचिव पी.के. मल्होत्रा, एस.के मोहंती, IRS (सेवानिवृत्त) और सेबी के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य, तथा डेलॉइट इंडिया के पूर्व मैनेजिंग पार्टनर और सीईओ एन. वेंकटराम शामिल हैं. समिति निपटान की शर्तों की सिफारिश करती है और अंतिम फैसला पूर्णकालिक सदस्य करते हैं.
सयोनारा, कारण बताओ नोटिस
सूत्रों के मुताबिक, समय का यह मेल शायद ही इससे अधिक सौहार्दपूर्ण हो सकता था. भारत-जापान संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं. 22 जुलाई को मुंबई में जापान की कॉन्सुल-जनरल सातो हितोमी ने सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे से शिष्टाचार मुलाकात की. जापानी कॉन्सुलेट के अनुसार, दोनों पक्षों ने वित्तीय क्षेत्र की गतिविधियों और दोनों देशों के बीच सहयोग पर चर्चा की.
सूत्रों ने कहा कि फंड हाउस की जापानी पैरेंट कंपनी निप्पॉन लाइफ भी भारत और जापान के बीच एक क्रिकेट मैच आयोजित कर रही है. सेबी के चेयरमैन ने हाल ही में उत्तर भारत के एक राज्य में निप्पॉन इंडिया की एक शाखा का दौरा किया. सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने सितंबर 2026 में लेह, जम्मू-कश्मीर/लद्दाख क्षेत्र का दौरा किया था, जहां उन्होंने सेना के जवानों के लिए AMFI की ओर से आयोजित इन्वेस्टर्स अवेयरनेस प्रोग्राम को संबोधित किया.
मामले से परिचित एक व्यक्ति ने कहा कि जापान के सबसे बड़े वित्तीय समूहों में से एक के साथ निपटान द्विपक्षीय संबंधों के लिए "काफी मददगार साबित हो सकता है." बेशक, कोई भी इन घटनाक्रमों के बीच किसी संबंध का सुझाव नहीं दे रहा है. ये महज संयोग हैं.
सिक्का के लिए यह निपटान ऐसे समय में नियामकीय दबाव को हटा देता है, जब उनका प्रोफाइल पहले कभी इतना ऊंचा नहीं रहा. AMFI के चेयरमैन के तौर पर वह ऐसे उद्योग का सार्वजनिक चेहरा हैं, जो ₹75 लाख करोड़ से अधिक की परिसंपत्तियों का प्रबंधन करता है.
अगली कतार में: Quant
निप्पॉन का आदेश इस सीजन का एकमात्र बड़ा निपटान नहीं हो सकता. सूत्रों के अनुसार, सेबी से क्वांट म्यूचुअल फंड (Quant Mutual Fund) के फ्रंट रनिंग मामले में निपटान आवेदन पर भी फैसला आने की उम्मीद है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
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