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नई जीडीपी सीरीज से बदलेगी विकास दर की तस्वीर, महंगाई समायोजन के तरीके में बड़े सुधार

नई जीडीपी सीरीज के जरिए भारत की राष्ट्रीय आय गणना प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय मानकों के करीब लाने की कोशिश की जा रही है, जिससे नीति-निर्माण, निवेश विश्लेषण और आर्थिक आकलन को अधिक मजबूत आधार मिल सकेगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 7 months ago

देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की नई सीरीज अगले सप्ताह जारी होने जा रही है, जिसके साथ राष्ट्रीय आय के आकलन की पद्धति में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिलेंगे. सांख्यिकी मंत्रालय और राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) ने संकेत दिए हैं कि महंगाई समायोजन (डिफ्लेशन) की प्रक्रिया को अधिक सटीक, पारदर्शी और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाया जाएगा. इन सुधारों का उद्देश्य वास्तविक आर्थिक वृद्धि की अधिक स्पष्ट और विश्वसनीय तस्वीर प्रस्तुत करना है.

उपभोग व्यय की गणना में बड़ा बदलाव

अब तक निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) को स्थिर कीमतों में बदलने के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) और थोक मूल्य सूचकांक (WPI) का मिश्रित उपयोग किया जाता था. नई प्रणाली में वस्तु-विशिष्ट उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों को प्राथमिकता दी जाएगी. जहां किसी विशेष वस्तु या सेवा के लिए अलग सूचकांक उपलब्ध नहीं होगा, वहां ही इम्प्लिसिट प्राइस डिफ्लेटर का उपयोग किया जाएगा. इससे उपभोग से जुड़े आंकड़े अधिक यथार्थवादी और सटीक माने जा रहे हैं.

निवेश आकलन में संपत्ति-आधारित दृष्टिकोण

सकल स्थिर पूंजी निर्माण (GFCF) के आकलन में भी बड़ा बदलाव प्रस्तावित है. अब एक समग्र थोक मूल्य सूचकांक पर निर्भरता घटाई जाएगी और संपत्ति-आधारित पद्धति अपनाई जाएगी. मशीनरी, परिवहन उपकरण और आईटी उत्पादों के लिए संबंधित विशिष्ट थोक मूल्य सूचकांकों का उपयोग होगा. अनुसंधान एवं विकास (R&D) खर्च को औद्योगिक श्रमिकों और शहरी CPI के भारित औसत से समायोजित किया जाएगा. सॉफ्टवेयर और डेटाबेस के लिए शहरी CPI, खनिज अन्वेषण के लिए सामान्य CPI और बौद्धिक संपदा उत्पादों के लिए उपयुक्त उपभोक्ता मूल्य सूचकांक अपनाए जाएंगे.

निर्माण और कीमती धातुओं के लिए अलग तरीका

निर्माण क्षेत्र में स्पष्ट मूल्य सूचकांक की कमी को देखते हुए स्थिर कीमतों पर सकल उत्पादन की वृद्धि दर को मात्रा संकेतक के रूप में इस्तेमाल करने की सिफारिश की गई है. सोना और चांदी जैसे कीमती सामानों को अब थोक कीमतों के बजाय आभूषणों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर समायोजित किया जाएगा, ताकि खुदरा स्तर की वास्तविक कीमतों का बेहतर प्रतिबिंब मिल सके.

विदेशी व्यापार के आकलन में सुधार

आयात और निर्यात के आंकड़ों के लिए अधिक विस्तृत और सटीक पद्धति अपनाई जाएगी. जहां प्रत्यक्ष मूल्य या मात्रा संकेतक उपलब्ध नहीं होंगे, वहां उपयुक्त यूनिट वैल्यू इंडेक्स का उपयोग किया जाएगा.

साथ ही तिमाही और वार्षिक अनुमानों के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश की जाएगी, जिससे डेटा की स्थिरता बढ़ेगी.

उत्पादन पक्ष में दोहरी अपस्फीति मॉडल

उत्पादन पक्ष में भी व्यापक बदलाव प्रस्तावित हैं. कई क्षेत्रों में एकल अपस्फीति पद्धति की जगह मात्रा-आधारित आकलन अपनाया जाएगा. चयनित क्षेत्रों, विशेषकर विनिर्माण, में दोहरे अपस्फीति (डबल डिफ्लेशन) मॉडल को लागू करने की सिफारिश की गई है.

विनिर्माण क्षेत्र में आउटपुट और मध्यवर्ती खपत को अलग-अलग मूल्य सूचकांकों से समायोजित किया जाएगा. इसके लिए वार्षिक औद्योगिक सर्वेक्षण के इनपुट बास्केट और वस्तु-विशिष्ट WPI का उपयोग होगा.

खनन, वन और मत्स्य क्षेत्र में मात्रा आधारित आकलन

खनन क्षेत्र में अब थोक मूल्य सूचकांक आधारित पद्धति के बजाय भारतीय खान ब्यूरो और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के आंकड़ों पर आधारित मात्रा आकलन किया जाएगा. वन और मत्स्य क्षेत्र में राज्य-वार भौतिक उत्पादन सूचकांक को अपनाया जाएगा, ताकि सकल मूल्य वर्धन का अनुमान वास्तविक उत्पादन के अनुरूप हो सके.

विशेषज्ञों के अनुसार, इन सुधारों से जीडीपी के स्थिर कीमतों पर अनुमान अधिक विश्वसनीय होंगे और महंगाई के प्रभाव को बेहतर ढंग से अलग किया जा सकेगा. इससे वास्तविक आर्थिक वृद्धि की तस्वीर अधिक स्पष्ट रूप में सामने आएगी.

 


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