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BS-VII के नए नियमों में सिर्फ धुआं नहीं, ब्रेक और टायर से होने वाले प्रदूषण पर भी रहेगी नजर: रिपोर्ट
रिपोर्ट के अनुसार, हल्के मालवाहक वाहनों के लिए अप्रैल 2030 और बसों-ट्रकों के लिए अप्रैल 2031 से लागू करने का प्रस्ताव, कारें और दोपहिया वाहन फिलहाल दायरे से बाहर.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 hours ago
भारत में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए प्रस्तावित भारत स्टेज-7 (BS-VII) मानक अब केवल इंजन और एग्जॉस्ट से निकलने वाले धुएं तक सीमित नहीं रहेंगे. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की ओर से जारी मसौदा नियमों में ब्रेक से निकलने वाली धूल, टायरों की घिसावट, इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी की क्षमता और वाहन के लंबे समय तक प्रदूषण मानकों पर खरा उतरने जैसे पहलुओं को भी शामिल किया गया है. इन प्रस्तावों के लागू होने पर वाहनों के प्रदूषण का आकलन केवल प्रयोगशाला में किए गए परीक्षण के आधार पर नहीं, बल्कि सड़क पर उनके वास्तविक प्रदर्शन और इस्तेमाल की अवधि के दौरान भी किया जाएगा.
RedLab की रिपोर्ट के मुताबिक, BS-VII के मसौदा नियमों में हल्के मालवाहक वाहनों के लिए 1 अप्रैल 2030 और बसों तथा मध्यम एवं भारी मालवाहक वाहनों के लिए 1 अप्रैल 2031 से नए प्रावधान लागू करने का प्रस्ताव है. हालांकि, ये अभी मसौदा नियम हैं और सार्वजनिक परामर्श के बाद इनमें बदलाव हो सकता है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कारों के लिए अप्रैल 2029 से BS-VII के अलग प्रस्ताव की चर्चा हुई है, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है. दोपहिया वाहन फिलहाल इन मसौदों के दायरे में शामिल नहीं हैं.
पहली बार ब्रेक से निकलने वाली धूल पर भी सीमा
वाहनों के ब्रेक लगाने पर ब्रेक पैड और डिस्क के घिसने से बारीक कण निकलते हैं. ये कण हवा में फैल सकते हैं और सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर सकते हैं. अब तक भारत के भारत स्टेज उत्सर्जन मानकों में ब्रेक डस्ट के लिए ऐसी सीमा निर्धारित नहीं थी.
प्रस्तावित नियमों के तहत हल्के मालवाहक वाहनों में ब्रेक से निकलने वाले कणों पर अप्रैल 2032 से सीमा लगाने की तैयारी है. रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआती चरण में अलग-अलग श्रेणियों के वाहनों और उनके वजन के आधार पर यह सीमा 3 से 11 मिलीग्राम प्रति किलोमीटर तक होगी. इसके बाद 1 अप्रैल 2035 से सभी पावरट्रेन के लिए 3 मिलीग्राम प्रति किलोमीटर की समान सीमा प्रस्तावित है.
इसका मतलब है कि पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधन से चलने वाले वाहनों के साथ इलेक्ट्रिक वाहनों को भी ब्रेक से होने वाले प्रदूषण के नियमों का पालन करना होगा. इलेक्ट्रिक वाहनों में रीजनरेटिव ब्रेकिंग के कारण सामान्य ब्रेक का इस्तेमाल कम हो सकता है, लेकिन इससे ब्रेक डस्ट का उत्सर्जन पूरी तरह समाप्त नहीं होता.
बसों और ट्रकों के लिए ब्रेक उत्सर्जन की सीमाएं बाद के चरणों में निर्धारित करने का प्रस्ताव है. हालांकि, इनके लिए अंतिम आंकड़े अभी स्पष्ट नहीं हैं.
टायरों की घिसावट पर नियम, लेकिन सीमा तय नहीं
वाहनों के टायर सड़क पर चलते समय धीरे-धीरे घिसते हैं. इससे निकलने वाले रबर और अन्य पदार्थ सड़क की धूल में मिल जाते हैं और बारिश के पानी के साथ नालियों, मिट्टी तथा जलस्रोतों तक पहुंच सकते हैं. इनके कुछ बारीक कण हवा में भी फैल सकते हैं. इस तरह टायरों की घिसावट वायु प्रदूषण और माइक्रोप्लास्टिक से जुड़ी एक चिंता है.
BS-VII के मसौदे में टायरों की घिसावट को नियंत्रित करने के लिए परीक्षण का प्रावधान किया गया है. हल्के मालवाहक वाहनों में इस्तेमाल होने वाले C1 श्रेणी के टायरों के लिए 1 अप्रैल 2032 और बसों तथा ट्रकों में इस्तेमाल होने वाले C2 और C3 श्रेणी के टायरों के लिए 1 अप्रैल 2035 से नियम प्रस्तावित हैं.
हालांकि, टायरों की घिसावट की अधिकतम स्वीकार्य सीमा और परीक्षण से जुड़े कुछ विवरण अलग से अधिसूचित किए जाने हैं. इसलिए अभी यह स्पष्ट नहीं है कि टायर निर्माताओं को किन अंतिम मानकों का पालन करना होगा.
एक अन्य सवाल यह है कि क्या ये नियम केवल नए वाहनों के साथ लगाए जाने वाले टायरों पर लागू होंगे या बाद में बदले जाने वाले टायरों पर भी समान शर्तें लागू होंगी. मसौदे में इस बारे में स्पष्टता नहीं है.
इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी की क्षमता पर भी नजर
प्रस्तावित BS-VII नियमों में इलेक्ट्रिक और प्लग-इन हाइब्रिड हल्के मालवाहक वाहनों की बैटरी की क्षमता को लेकर भी न्यूनतम मानक निर्धारित किए गए हैं.
मसौदे के मुताबिक, ऐसे वाहनों की बैटरी को पांच साल या एक लाख किलोमीटर चलने तक अपनी मूल क्षमता का कम से कम 75 फीसदी बनाए रखना होगा. वहीं, आठ साल या 1.6 लाख किलोमीटर के बाद बैटरी की क्षमता कम से कम 67 फीसदी रहने का प्रस्ताव है.
उदाहरण के लिए, 40 किलोवाट-घंटे (kWh) की बैटरी को पांच साल या एक लाख किलोमीटर के बाद कम से कम 30 kWh और आठ साल या 1.6 लाख किलोमीटर के बाद कम से कम 26.8 kWh क्षमता बनाए रखनी होगी.
हालांकि, ये प्रावधान फिलहाल प्रस्तावित श्रेणियों के इलेक्ट्रिक और प्लग-इन हाइब्रिड वैन के लिए हैं. बसों और ट्रकों की बैटरी क्षमता को लेकर नियम बाद के चरणों में लाने का प्रस्ताव है. मसौदे में बैटरी वारंटी की शर्तों को लेकर स्पष्ट प्रावधान नहीं है.
सड़क पर भी होगी उत्सर्जन की जांच
BS-VII के तहत वाहनों को केवल प्रयोगशाला में उत्सर्जन परीक्षण पास करना पर्याप्त नहीं होगा. प्रस्तावित नियमों में वास्तविक सड़क परिस्थितियों में भी वाहनों के उत्सर्जन की जांच और उनकी उपयोग अवधि के दौरान मानकों के अनुपालन की व्यवस्था शामिल है.
रिपोर्ट के अनुसार, हल्के मालवाहक वाहनों के लिए उत्सर्जन मानकों के अनुरूप प्रदर्शन बनाए रखने की अवधि को चरणबद्ध तरीके से बढ़ाने का प्रस्ताव है. सबसे भारी ट्रकों और बसों के लिए भी लंबी अवधि तक प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियों के प्रभावी रहने की शर्तें रखी गई हैं.
प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार, हल्के मालवाहक वाहनों को शुरुआती चरण में दो लाख किलोमीटर या 10 साल तक निर्धारित शर्तों के तहत उत्सर्जन मानकों पर खरा उतरना होगा. सबसे भारी ट्रकों और बसों के लिए यह अवधि आगे चलकर 8.75 लाख किलोमीटर या 15 साल तक हो सकती है.
वाहनों में लगे मॉनिटर उत्सर्जन के आंकड़ों पर नजर रखेंगे. प्रस्ताव में ईंधन और बिजली की खपत तथा भारी वाहनों के मामले में उनके भार से जुड़ी जानकारी दर्ज करने की व्यवस्था भी शामिल है. हल्के मालवाहक वाहनों के लिए 2032 और भारी वाहनों के लिए 2033 से कुछ आंकड़े वायरलेस माध्यम से गुमनाम रूप में भेजने का प्रस्ताव है.
हालांकि, इन आंकड़ों को कौन प्राप्त करेगा और नियमों का उल्लंघन सामने आने पर किस तरह कार्रवाई होगी, इस बारे में रिपोर्ट ने स्पष्टता की कमी की ओर ध्यान दिलाया है.
एग्जॉस्ट उत्सर्जन में क्या बदलेगा?
प्रस्तावित नियमों के तहत हल्के मालवाहक वाहनों के एग्जॉस्ट उत्सर्जन की कई सीमाएं BS-VI के स्तर पर ही रखने की बात है. हालांकि, बारीक कणों की गिनती का दायरा 23 नैनोमीटर से घटाकर 10 नैनोमीटर तक करने का प्रस्ताव है. इससे पहले की तुलना में छोटे कणों को भी उत्सर्जन आकलन में शामिल किया जा सकेगा.
दूसरी ओर, बसों और ट्रकों के लिए नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) उत्सर्जन सीमा को मौजूदा BS-VI स्तर की तुलना में लगभग आधा करने का प्रस्ताव है. इसके अलावा, अमोनिया, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसे उत्सर्जकों को भी नियमों में शामिल किया गया है.
प्रस्तावित नियमों में वाहनों के लिए एक 'एनवायरनमेंटल व्हीकल पासपोर्ट' जारी करने की व्यवस्था भी शामिल है. इसमें ईंधन की खपत, बैटरी की सेहत और उत्सर्जन से संबंधित जानकारी दर्ज हो सकती है. साथ ही, इंजन, कंट्रोल यूनिट, बैटरी, ओडोमीटर और प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियों से छेड़छाड़ रोकने के प्रावधान भी प्रस्तावित हैं.
मौजूदा वाहनों पर तत्काल असर नहीं
रिपोर्ट के मुताबिक, नए नियम संबंधित लागू होने की तारीखों के बाद निर्मित वाहनों पर लागू होंगे. इसलिए पहले से सड़कों पर चल रहे वाहनों को इन मसौदा प्रावधानों के कारण तत्काल बदलाव करने की जरूरत नहीं होगी.
हालांकि, नए मानकों के लागू होने से वाहन निर्माताओं के अलावा ब्रेक पैड, डिस्क, टायर, बैटरी और वाहन सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनियों पर भी अनुपालन से जुड़ी नई जिम्मेदारियां आ सकती हैं. इसके साथ ही परीक्षण प्रयोगशालाओं को भी नई प्रक्रियाओं और उपकरणों की जरूरत पड़ सकती है.
फिलहाल टायरों की अंतिम सीमा, भारी वाहनों के ब्रेक और बैटरी से जुड़े कुछ आंकड़े, बदले जाने वाले पुर्जों पर नियमों का दायरा और कुछ कार्यान्वयन संबंधी विवरण स्पष्ट नहीं हैं. सार्वजनिक परामर्श के बाद मसौदे में बदलाव संभव है.
BS-VII का प्रस्तावित दायरा इस दिशा में बदलाव का संकेत देता है कि वाहन से होने वाले प्रदूषण को केवल एग्जॉस्ट से निकलने वाले धुएं तक सीमित न रखकर ब्रेक, टायर, बैटरी और वाहन की पूरी उपयोग अवधि के दौरान उसके प्रदर्शन के आधार पर भी देखा जाए.
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