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द अंबानी इंडेक्स
जियो की लिस्टिंग के बाद एक परिवार निफ्टी के सातवें हिस्से और सेंसेक्स के छठे हिस्से को प्रभावित करने की क्षमता रखेगा. वहीं, अधिक संपत्ति के मालिक अडानी की हिस्सेदारी इन सूचकांकों में महज 2 फीसदी है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 hours ago
पलक शाह
तेल, डेटा, बंदरगाह: भारत पर नियंत्रण की लड़ाई
आज रात मुकेश अंबानी और गौतम अडानी बराबरी पर हैं. कल जियो इस बराबरी को खत्म कर देगा. लेकिन भारत के दो सबसे अमीर परिवारों के बीच असली लड़ाई नियंत्रण को लेकर है: बाजार के स्कोरबोर्ड पर नियंत्रण और उन भौतिक महत्वपूर्ण केंद्रों पर नियंत्रण, जिनके जरिए अर्थव्यवस्था चलती है. दोनों मोर्चों पर अंबानी की स्थिति अमीरों की सूची से मिलने वाले संकेतों से ज्यादा मजबूत है.
बराबरी की टक्कर
भारत के अब तक के सबसे बड़े आईपीओ की पूर्व संध्या पर दोनों कारोबारी साम्राज्यों का आकार लगभग एक जैसा है. रिलायंस इंडस्ट्रीज (16.1 लाख करोड़ रुपये) और जियो फाइनेंशियल (1.5 लाख करोड़ रुपये) को मिलाकर अंबानी की सूचीबद्ध कंपनियों का मूल्य लगभग 17.6 लाख करोड़ रुपये है. अडानी की सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मूल्य लगभग 17 लाख करोड़ रुपये है.
जियो की लिस्टिंग से यह संतुलन बदल जाएगा. उम्मीद है कि सुर्खियों में अंबानी के 30 लाख करोड़ रुपये के कारोबारी साम्राज्य का जिक्र होगा. इस आंकड़े में जियो की गिनती दो बार होती है: रिलायंस के पास जियो की 64.48% हिस्सेदारी है और यह हिस्सेदारी पहले से ही रिलायंस के शेयरों की कीमत में शामिल है. जियो को एक बार गिनने पर, ग्रे मार्केट की कीमत के आधार पर अंबानी का सूचीबद्ध कारोबारी साम्राज्य बढ़कर लगभग 22 लाख करोड़ रुपये हो जाता है. इस तरह अडानी पर उनकी बढ़त 4-5 लाख करोड़ रुपये की होगी.
अंबानी के पास बाजार का स्कोरबोर्ड
रिलायंस पहले से ही दोनों प्रमुख सूचकांकों में सबसे अधिक भार वाला शेयर है: निफ्टी 50 में 8.94% और सेंसेक्स में 11.06%. जियो फाइनेंशियल को जोड़ने पर अंबानी समूह की हिस्सेदारी निफ्टी में लगभग 9.6% हो जाती है.
जियो के आने से यह हिस्सेदारी और बढ़ जाएगी. इसके शेयरों के पूरी तरह कारोबार योग्य होने के बाद, यह समूह निफ्टी में लगभग 14% और सेंसेक्स में 16% भार रख सकता है. भारत के प्रमुख बाजार सूचकांकों में किसी भी परिवार की इतनी बड़ी हिस्सेदारी नहीं रही है. यह एचडीएफसी बैंक से भी अधिक होगी, जिसका कोई प्रमोटर नहीं है.
बाजार में भार का मतलब ताकत है. हर इंडेक्स फंड और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) को इसी अनुपात में शेयर खरीदने पड़ते हैं. कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO), जो इक्विटी में निवेश केवल निफ्टी और सेंसेक्स ईटीएफ के जरिए करता है, आज हर 100 रुपये में से लगभग 10 रुपये रिलायंस में लगाता है. जियो को पूरी तरह शामिल करने पर यह राशि लगभग 15 रुपये हो जाएगी. इस समूह के शेयरों में 1% का बदलाव सेंसेक्स को लगभग 120 अंक तक प्रभावित कर सकता है.
लेकिन कल से नहीं
सूचकांकों में किसी शेयर का भार केवल उन शेयरों के आधार पर तय होता है, जिनका बाजार में कारोबार हो सकता है. लिस्टिंग के दिन जियो के केवल 2.93% शेयर ही कारोबार के लिए उपलब्ध होंगे, जिनका मूल्य लगभग 30,000-37,000 करोड़ रुपये होगा. रिलायंस की हिस्सेदारी की गिनती कभी नहीं होती और बाकी हिस्सेदारी का बड़ा हिस्सा, जो मेटा, गूगल और 2020 के निवेशकों के पास है, छह महीने तक लॉक-इन में रहेगा.
इस वजह से फिलहाल जियो दोनों सूचकांकों से बाहर रहेगा. सितंबर में बीएसई लिमिटेड को निफ्टी में शामिल होने के लिए लगभग 1.41 लाख करोड़ रुपये के फ्री फ्लोट की जरूरत थी, जो जियो के मौजूदा कारोबार योग्य शेयरों के मूल्य से चार गुना अधिक है. नियमों के मौजूदा प्रावधानों को देखते हुए, 2027 के मध्य से लेकर आखिरी महीनों तक जियो के सूचकांकों में शामिल होने की संभावना है.
इसके बाद भी 14% हिस्सेदारी प्रभाव तो है, लेकिन नियंत्रण नहीं. प्रमोटर अपने शेयरों का कारोबार करके सूचकांक को अपनी दिशा में नहीं मोड़ सकते और निफ्टी में अब भी बैंकों की हिस्सेदारी लगभग पांचवां हिस्सा है. सितंबर में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के सूचकांक में बदलाव के दौरान रिलायंस का भार वास्तव में घटा दिया गया था.
अंबानी का महत्वपूर्ण केंद्र: जामनगर
अंबानी के पास देश की सबसे रणनीतिक भौतिक संपत्तियों में से एक भी है. जामनगर दुनिया की सबसे बड़ी एकल-स्थान वाली रिफाइनरी है, जहां प्रतिदिन लगभग 12.4 लाख से 14 लाख बैरल कच्चे तेल का प्रसंस्करण होता है. सालाना लगभग 6.8 करोड़ टन की क्षमता के साथ यह भारत की कुल रिफाइनिंग क्षमता का लगभग एक चौथाई हिस्सा है. यह डीजल और अन्य ईंधनों का एक बड़ा निर्यातक भी है.
इस संपत्ति का भू-राजनीतिक महत्व है.
पिछले बुधवार को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो तीन दिन की भारत यात्रा पर जामनगर पहुंचे और अंबानी परिवार से मुलाकात की. उनकी इस यात्रा में नई दिल्ली को पूरी तरह छोड़ दिया गया. बातचीत में ऊर्जा आपूर्ति, डेटा सेंटरों के लिए बिजली और रिलायंस द्वारा वेनेजुएला के कच्चे तेल के प्रसंस्करण जैसे मुद्दे शामिल थे. आलोचकों ने इसे कूटनीतिक इतिहास की पहली ऐसी घटना बताया. वजह चाहे जो भी हो, वॉशिंगटन जामनगर पहुंचा.
इससे कुछ दिन पहले एलन मस्क ने एक्स पर अंबानी का मजाक उड़ाते हुए उन्हें “प्रधानमंत्री अंबानी” यानी भारत का असली बॉस कहा था. मस्क नाराज थे क्योंकि भारत में स्टारलिंक की शुरुआत में देरी हो रही थी. इसके बावजूद अमेरिका के शीर्ष राजनयिक जामनगर पहुंचे. दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति ने तंज कसा और वॉशिंगटन ने जवाब में वहां जाकर मुलाकात की.
जियो के नेटवर्क को भी इसमें जोड़ें, जिसके पास भारत के लगभग 39% मोबाइल ग्राहक हैं और जो 5G होम ब्रॉडबैंड का लगभग 70% हिस्सा संभालता है, तो अंबानी अर्थव्यवस्था की दो महत्वपूर्ण पाइपलाइनों को नियंत्रित करते हैं: ईंधन और डेटा, और जल्द ही बिजली भी.
अगला मोर्चा सौर ऊर्जा का है. कच्छ में अडानी के 30 गीगावाट क्षमता वाले खावड़ा पार्क के पास, जिसे पहले ही दुनिया का सबसे बड़ा नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र बताया जा रहा है, रिलायंस लगभग 5.5 लाख एकड़ जमीन पर नवीकरणीय ऊर्जा पार्क विकसित करने की तैयारी कर रहा है. इसकी क्षमता भविष्य में 100 गीगावाट तक पहुंच सकती है. इसे जामनगर में रिलायंस की गीगा फैक्ट्रियों से ऊर्जा उपकरणों की आपूर्ति मिलेगी. जमीन पर अडानी कई साल आगे हैं और उनकी लगभग 9-11 गीगावाट क्षमता पहले से चालू है. लेकिन कागजों पर अंबानी उसी क्षेत्र में उनसे बड़ा प्रोजेक्ट बनाने की योजना बना रहे हैं, जिसे अडानी अपना मजबूत क्षेत्र मानते हैं.
अडानी की पाइपलाइन: बंदरगाह, बिजली, हवाई अड्डे
अडानी की निफ्टी में हिस्सेदारी मुश्किल से 2% है, जो अडानी पोर्ट्स और अडानी एंटरप्राइजेज के जरिए आती है. सेंसेक्स में केवल अडानी पोर्ट्स शामिल है. सेंसेक्स में शामिल उनके शेयरों में 1% का बदलाव सूचकांक को लगभग 9 अंक तक प्रभावित करता है.
लेकिन उनकी असली ताकत भौतिक बुनियादी ढांचे में है. वित्त वर्ष 2026 में उनके बंदरगाहों ने भारत के कुल माल ढुलाई का 27.1% और कंटेनर कारोबार का लगभग 45% हिस्सा संभाला. अडानी पावर देश की सबसे बड़ी निजी ताप विद्युत उत्पादक कंपनी है. अंबुजा देश की दूसरी सबसे बड़ी सीमेंट निर्माता कंपनी है. वह मुंबई के हवाई अड्डे और नए नवी मुंबई हवाई अड्डे का संचालन भी करते हैं. सूचकांकों में किसी भी बदलाव से इन संपत्तियों पर उनका नियंत्रण खत्म नहीं हो सकता.
कम में ज्यादा, ज्यादा में कम
अंबानी के पास ज्यादा कंपनियों में कम हिस्सेदारी है. अडानी के पास कम कंपनियों में ज्यादा हिस्सेदारी है.
मापदंड अंबानी अडानी
27 अक्टूबर को सूचीबद्ध कंपनियों का मूल्य लगभग 17.6 लाख करोड़ रुपये लगभग 17 लाख करोड़ रुपये
जियो की लिस्टिंग के बाद, दोहरी गिनती हटाकर लगभग 22 लाख करोड़ रुपये लगभग 17 लाख करोड़ रुपये
नेटवर्थ (ब्लूमबर्ग, 26 अक्टूबर) 79.3 अरब डॉलर 102 अरब डॉलर
प्रमोटर हिस्सेदारी रिलायंस इंडस्ट्रीज में लगभग 50% प्रमुख कंपनियों में लगभग 65-75%
निफ्टी 50 में भार 9.6%, जियो के साथ लगभग 14% तक लगभग 2%
सेंसेक्स में भार 11.1%, जियो के साथ लगभग 16% तक लगभग 1.2%
भौतिक महत्वपूर्ण केंद्र भारत की लगभग 25% रिफाइनिंग क्षमता; लगभग 39% मोबाइल उपयोगकर्ता बंदरगाहों के कुल माल का लगभग 27%; सबसे बड़ी निजी ताप विद्युत कंपनी
कम सूचकांक हिस्सेदारी वाला व्यक्ति अमीरों की सूची में सबसे ऊपर क्यों है? इसकी वजह है स्वामित्व.
अडानी परिवार के पास अडानी पावर की लगभग 75% और अडानी पोर्ट्स व अडानी एंटरप्राइजेज की दो-तिहाई से तीन-चौथाई हिस्सेदारी है. रिलायंस के प्रमोटरों के पास लगभग 50% हिस्सेदारी है.
इसलिए अडानी की 102 अरब डॉलर की संपत्ति उनके समूह के कुल बाजार मूल्य का लगभग 57% है. वहीं, अंबानी की 79.3 अरब डॉलर की संपत्ति उनके समूह के बाजार मूल्य का लगभग 43% है. अधिक हिस्सेदारी का मतलब है बाजार में कारोबार के लिए कम शेयर और सूचकांकों में कम भार, लेकिन प्रत्येक रुपये के बाजार मूल्य के मुकाबले अधिक व्यक्तिगत संपत्ति.
अंबानी के पास ज्यादा कंपनियों में कम हिस्सेदारी है. अडानी के पास कम कंपनियों में ज्यादा हिस्सेदारी है.
असली सवाल
बाजार के स्कोरबोर्ड पर नियंत्रण से ऐसे खरीदार मिलते हैं, जिन्हें निवेश करना ही होता है. इससे बेहतर गिरवी संपत्ति और सस्ती पूंजी हासिल करने में भी मदद मिलती है. वहीं, बुनियादी ढांचे पर नियंत्रण का मतलब है कि अर्थव्यवस्था को उनकी सेवाओं की जरूरत है.
हालांकि, दोनों की अपनी सीमाएं हैं. बाजार में कारोबार के लिए कम शेयर उपलब्ध होने से उतार-चढ़ाव बढ़ जाता है. मई के बाद से अडानी समूह के बाजार मूल्य में लगभग 3 लाख करोड़ रुपये की गिरावट आई है. वहीं, बाजार में किसी एक समूह का अधिक संकेंद्रण दोनों तरह से असर डाल सकता है. अगर किसी एक परिवार की कंपनियों का भार प्रमुख सूचकांकों के सातवें हिस्से तक पहुंच जाए, तो उस परिवार के लिए एक खराब सप्ताह भारत में हर एसआईपी और भविष्य निधि खाते के लिए भी खराब सप्ताह बन सकता है.
कल की लिस्टिंग अंबानी को भारत के बाजार के स्कोरबोर्ड पर सबसे अधिक भार वाला समूह बना देगी और जामनगर पहले से ही उन्हें ऐसा कारोबारी बना चुका है, जिससे मिलने वॉशिंगटन आता है.
अडानी के पास परिवहन और बिजली ग्रिड का बड़ा हिस्सा है और अपनी कंपनियों पर भी उनका अधिक स्वामित्व है.
एक कारोबारी साम्राज्य ईंधन, डेटा और सूचकांक पर हावी है, जबकि दूसरा बंदरगाहों, बिजली और अमीरों की सूची में दबदबा रखता है. भारत पर नियंत्रण की लड़ाई इन सभी मोर्चों पर लड़ी जा रही है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
पलक शाह अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हैं. मुंबई में करीब दो दशक तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की पड़ताल की है. उनके लेख भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं. 19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई की गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक परिष्कृत रूप ने ले ली है. इसमें कॉरपोरेट इमारतों के भीतर चलने वाली सफेदपोश वित्तीय धोखाधड़ी शामिल है. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम वित्तीय दुनिया की चमकदार सतह के पीछे काम करने वाले समूहों को उजागर करता है. सच सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता में एक ऐसी प्रभावशाली आवाज बनाती है जो यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वालों को बेनकाब करने से नहीं हिचकती.
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