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सुप्रीम कोर्ट ने टेलीकॉम कंपनियों को दिया बड़ा झटका, अब देने पड़ेंगे 92,000 करोड़ रुपए

साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने दूरसंचार विभाग द्वारा टेलीकॉम कंपनियों पर बकाये AGR की गणना को सही ठहराया था. इस फैसले के खिलाफ क्यूरेटिव याचिका दायर की गई थी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

AGR मामले में वोडाफोन आइडिया, भारती एयरटेल समेत दूसरी टेलीकॉम कंपनियों को सुप्रीम कोर्ट से तगड़ा झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने उस क्यूरेटिव याचिका को खारिज कर दिया है, AGR (Adjusted Gross Revenues) की कैलकुलेशन दोबारा करने की मांग की गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने टेलीकॉम कंपनियों की खुली अदालत में सुनवाई की याचिका को भी खारिज कर दिया.

वोडाफोन आइडिया, भारती एयरटेल और कई अन्य टेलीकॉम कंपनियों ने मामले में 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ क्यूरेटिव याचिका दाखिल की थी. टेलीकॉम ऑपरेटर्स ने आरोप लगाया था कि दूरसंचार विभाग की ओर से AGR बकाया की गणना में गंभीर गलतियां हुई हैं, साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उन पर मनमाना जुर्माना लगाया गया है.

90,000 करोड़ रुपये की देनदारी

2019 के फैसले ने हजारों करोड़ रुपये के बकाया और जुर्माने से जूझ रही टेलीकॉम इंडस्ट्री तगड़ा झटका दिया. इससे भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया की देनदारी बढ़कर 90,000 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई थी. इसके तुरंत बाद, कंपनियों ने अपने बकाए के भुगतान के लिए अधिक समय की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया. सितंबर 2020 में, सुप्रीम कोर्ट ने 10 वर्षों में बकाया भुगतान की इजाजत दी.

हालांकि साल 2021 में एक अलग याचिका में, सुप्रीम कोर्ट ने टेलीकॉम कंपनियों की ओर से दाखिल याचिका को खारिज कर दिया. जिन्होंने टेलीकॉम विभाग की बकाया राशि की गणना में गलतियों का दावा करते हुए मामले में बकाया की गणना पर DoT से संपर्क करने की अनुमति मांगी थी.

AGR पर फैसले के बाद, सरकार के पास शुरुआत में वोडाफोन आइडिया में 33% हिस्सेदारी थी, जो अब घटकर 23% रह गई है. AGR और स्पेक्ट्रम नीलामी भुगतान के टलने से पैदा ब्याज बकाया के कन्वर्जन के बदले में सरकार को शेयर आवंटित किए गए थे.

AGR का पूरा मामला समझिए

एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू या AGR, सरकार और टेलीकॉम ऑपरेटर्स के बीच रेवेन्यू शेयरिंग का एक मैकेनिज्म है. इस मैकेनिज्म के तहत, ऑपरेटर्स को टेलीकॉम डिपार्टमेंट को एक तय लाइसेंसिंग फीस और स्पेक्ट्रम यूसेज चार्ज का भुगतान करना होता है. DoT फीस की गणना AGR के प्रतिशत के रूप में करता है. हालांकि AGR की परिभाषा हमेशा से विवादों में रही है.

टेलीकॉम ऑपरेटर्स ने कई न्यायिक मंचों के सामने ये तर्क दिया है कि परिभाषा में केवल उनका मुख्य राजस्व शामिल होना चाहिए, जबकि विभाग ने तर्क दिया कि परिभाषा में नॉन-टेलीकॉम सेवाओं से होने वाली कमाई को भी शामिल करना चाहिए. अक्टूबर 2019 में, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि AGR की गणना करते समय नॉन-कोर रेवेन्यू को शामिल किया जाना चाहिए, जिससे AGR की परिभाषा पर मोबाइल ऑपरेटरों और सरकार के बीच 14 साल की लंबी कानूनी लड़ाई खत्म हुई.
 


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