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दक्षिण-पूर्वी एशिया की ग्रीन इकॉनॉमी 2030 तक GDP में जोड़ सकती है 120 अरब डॉलर- रिपोर्ट

अगर ये देश तेज़ी से पूरे सिस्टम को प्रदूषण मुक्त (डिकार्बोनाइज) करने की रणनीति अपनाएँ, तो 2030 तक GDP में 120 अरब डॉलर का फायदा हो सकता है और 9 लाख नई नौकरियाँ भी मिल सकती हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

दक्षिण-पूर्वी एशिया जलवायु बदलाव से निपटने की दौड़ में एक अहम मोड़ पर खड़ा है, और 2030 के जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अब सिर्फ पाँच साल बचे हैं. Bain & Company की रिपोर्ट "Southeast Asia’s Green Economy 2025: Unlocking Systems for Growth and Impact" के अनुसार, इस क्षेत्र की मौजूदा रफ्तार काफी नहीं है.

लेकिन रिपोर्ट एक बड़ी संभावना भी दिखाती है — अगर इस क्षेत्र में एक मजबूत और हरित (ग्रीन) अर्थव्यवस्था बनाई जाए, तो इससे 10 लाख करोड़ रुपये (120 अरब डॉलर) का GDP बढ़ सकता है, करीब 10 लाख नौकरियाँ बन सकती हैं, और इस दशक के अंत तक भारी मात्रा में प्रदूषण कम किया जा सकता है.

यह रिपोर्ट Bain & Company, GenZero, Google, Standard Chartered, और Temasek ने मिलकर प्रकाशित की है. इसमें कहा गया है कि अब तक दक्षिण-पूर्वी एशिया ने जलवायु से जुड़ी कोशिशें अलग-अलग सेक्टर में की हैं, लेकिन अब ज़रूरत है एकजुट और पूरे सिस्टम को ध्यान में रखकर काम करने की. रिपोर्ट के अनुसार, तीन बड़ी सिस्टम-लेवल रणनीतियां बहुत ज़रूरी हैं: सस्टेनेबल बायोइकोनॉमी (जैव-आधारित टिकाऊ अर्थव्यवस्था) को बढ़ाना, नई पीढ़ी की पावर ग्रिड्स (बिजली व्यवस्था) बनाना, एक मजबूत इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सिस्टम तैयार करना है.

सस्टेनेबल बायोइकोनॉमी और नई पीढ़ी की बिजली व्यवस्था (ग्रिड) का विकास

दुनियाभर में बायोइकोनॉमी (जैव आधारित अर्थव्यवस्था) का आकार 2050 तक 30 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. दक्षिण-पूर्वी एशिया के पास मैंग्रोव, जंगल और बड़े खेत जैसे प्राकृतिक संसाधन बहुत अधिक हैं, इसलिए यह क्षेत्र इस मौके का पूरा फायदा उठा सकता है. Bain की रिपोर्ट बताती है कि प्राकृतिक समाधानों (Nature-Based Solutions) और बायोफ्यूल्स (जैव ईंधन) को बढ़ाने से न सिर्फ प्रदूषण कम होगा, बल्कि नई इंडस्ट्रीज़ भी खड़ी हो सकती हैं.

उदाहरण के लिए, खेती के अपशिष्ट (waste) से बनने वाला दूसरी पीढ़ी का बायोफ्यूल खेतों में पराली जलाने की समस्या को कम कर सकता है और साथ ही वैल्यू-ऐडेड मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे सकता है. हालांकि, इसमें निजी निवेश लाने के लिए सरकारों को नियम साफ करने होंगे और निवेश में जोखिम कम करने की रणनीति अपनानी होगी. 

दक्षिण-पूर्वी एशिया में नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy) का उपयोग अब भी 10% से कम है, और कई देश अब भी कोयले और तेल जैसे पुराने जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर हैं. इसलिए ज़रूरी है कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बिजली ग्रिड्स को आधुनिक बनाया जाए. इससे सौर और पवन जैसे स्रोतों से मिलने वाली बिजली को बेहतर तरीके से जोड़ा जा सकेगा, बिजली की बर्बादी कम होगी, और ऊर्जा की सुरक्षा बढ़ेगी. रिपोर्ट कहती है कि इसके लिए ज़रूरी है: साझा और समन्वित निवेश, एक जैसे मानक (standards) और डिजिटल तकनीक, ताकि बदलती हुई बिजली आपूर्ति को ठीक से संभाला जा सके. इससे हर साल करीब 4 लाख करोड़ रुपये (50 अरब डॉलर) की जो ऊर्जा आयात पर खर्च होती है, उसे भी कम किया जा सकता है.

इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सिस्टम:

दक्षिण-पूर्वी एशिया में अभी EV (इलेक्ट्रिक व्हीकल) का इस्तेमाल चीन और यूरोप की तुलना में कम है. लेकिन अगर इस क्षेत्र में EV बनाने की सप्लाई चेन और चार्जिंग स्टेशन तेज़ी से विकसित किए जाएँ, तो यह ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में अपनी ताकत बनाए रख सकता है. रिपोर्ट कहती है कि दक्षिण-पूर्वी एशिया अपने पड़ोसी एशिया-पैसिफिक देशों से तकनीक और अनुभव सीख सकता है। साथ ही, EV के पार्ट्स की बढ़ती माँग का फायदा भी उठा सकता है — खासकर तब, जब ये देश बैटरी निर्माण का एक बड़ा केंद्र बनते जा रहे हैं.

इन मुख्य रणनीतियों के साथ-साथ, Bain ने तीन और जरूरी चीज़ें बताई हैं जो इस बदलाव को मजबूत बनाने में मदद करेंगी:

• जलवायु और ट्रांज़िशन फाइनेंस (Climate & Transition Finance) – यानि इस बदलाव के लिए फंडिंग.
• विश्वसनीय कार्बन बाज़ार (Credible Carbon Markets) – ताकि कंपनियाँ प्रदूषण घटाने के लिए सही सिस्टम में काम करें.
• ग्रीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Green AI) – पर्यावरण को ध्यान में रखकर बनाई गई स्मार्ट तकनीक.

बदलाव के लिए फंडिंग (वित्तीय मदद)

रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक हर साल लगभग ₹4.15 लाख करोड़ (50 अरब डॉलर) की ज़रूरत होगी ताकि इन हरित (ग्रीन) उपायों को सफल बनाया जा सके. इस पैसे का बड़ा हिस्सा निजी निवेश और मिश्रित फंडिंग मॉडल (सरकार और प्राइवेट सेक्टर मिलकर) से आना चाहिए. Temasek और Standard Chartered जैसे संस्थान पहले ही उभरते देशों में स्वच्छ ऊर्जा और ढाँचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) के लिए फंड शुरू कर चुके हैं. रिपोर्ट कहती है कि सरकारों को स्पष्ट नीतियाँ बनानी चाहिए और निवेश से जुड़ी अनिश्चितताओं को कम करना चाहिए, ताकि निवेशकों को भरोसा हो और काम तेज़ हो सके.

कार्बन मार्केट्स (जहां कंपनियाँ प्रदूषण कम करने के लिए क्रेडिट खरीदती हैं) का इस क्षेत्र में अभी बहुत कम उपयोग हो रहा है. लेकिन अगर इसमें सुधार लाया जाए — जैसे क्रेडिट की गुणवत्ता और एक जैसे नियम तय किए जाएँ — तो यह मार्केट 2030 तक 35 अरब डॉलर का हो सकता है. इसी तरह, AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की मदद से बिजली ग्रिड, ट्रांसपोर्ट सिस्टम और टिकाऊ खेती की क्षमता बहुत बढ़ाई जा सकती है — जो इस क्षेत्र के लाखों छोटे किसानों के लिए बेहद अहम है.

आर्थिक फायदे, जोखिम और चुनौतियां

अगर इन हरित (ग्रीन) रणनीतियों को बड़े पैमाने पर लागू किया जाए, तो Bain की रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक दक्षिण-पूर्वी एशिया के 6 बड़े देशों (इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम) की GDP में 2% की बढ़ोतरी हो सकती है. इसका मतलब है लगभग 120 अरब डॉलर की अतिरिक्त कमाई और 9 लाख नई ग्रीन नौकरियाँ. 

हालांकि रिपोर्ट उम्मीदों से भरी है, लेकिन इसमें कुछ बड़ी रुकावटों की भी बात की गई है. बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव, रक्षा आधारित व्यापार नीतियाँ (protectionism) और ESG (पर्यावरण, सामाजिक और गवर्नेंस) लक्ष्यों को लेकर निवेशकों का शक. इसके अलावा, फॉसिल फ्यूल (कोयला, तेल) पर निर्भरता अब भी बहुत ज़्यादा है. इस क्षेत्र की 80% से ज्यादा बिजली अब भी पुराने, प्रदूषणकारी स्रोतों से आती है.

फिर भी, रिपोर्ट कहती है कि हरित बदलाव का मतलब विकास में कमी नहीं है — बल्कि यह एक स्मार्ट तरीका है जिससे हम साथ-साथ विकास और प्रदूषण में कटौती दोनों पा सकते हैं. आज चीन की GDP में 9% हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा से आता है, जबकि दक्षिण-पूर्वी एशिया में यह सिर्फ 2% है। इसका मतलब है कि इस क्षेत्र में बहुत संभावना है — बशर्ते ये देश नवाचार (innovation) और सुधारों (reforms) को अपनाएं.

रिपोर्ट का अंतिम संदेश साफ़ है कि सरकारों को साफ और स्थिर नीतियाँ बनानी होंगी, कंपनियों को सस्टेनेबिलिटी को अपने काम का हिस्सा बनाना होगा और एशिया-पैसिफिक देशों के बीच सहयोग से तकनीक, निवेश और नियमों को एक जैसे बनाना होगा. जलवायु संकट तेजी से बढ़ रहा है, इसलिए दक्षिण-पूर्वी एशिया के पास ग्रीन इकॉनमी में आगे बढ़ने का मौका है — लेकिन समय बहुत कम है. Bain की रिपोर्ट साफ़ कहती है: अब वक्त है कार्रवाई का.
 


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