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SEBI का बड़ा प्रस्ताव: अब बाजार में भारी उतार-चढ़ाव के बीच भी ऑप्शंस ट्रेडर्स को मिलेगी राहत
नए फ्रेमवर्क के तहत बाजार में इंट्राडे मूवमेंट के दौरान जरूरत पड़ने पर तुरंत नए स्ट्राइक प्राइस जोड़े जा सकेंगे. इससे ट्रेडर्स को तेजी से बदलते बाजार में भी बेहतर ट्रेडिंग और रिस्क मैनेजमेंट का विकल्प मिलेगा.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 hours ago
भारतीय शेयर बाजार में बढ़ती अस्थिरता और तेज उतार-चढ़ाव के बीच बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (SEBI) ने ऑप्शंस ट्रेडिंग को ज्यादा व्यवस्थित और सुरक्षित बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. सेबी ने नए स्ट्राइक प्राइस फ्रेमवर्क का प्रस्ताव दिया है, जिसका मकसद ट्रेडर्स को हर परिस्थिति में बेहतर हेजिंग विकल्प उपलब्ध कराना और ब्रोकर्स पर तकनीकी दबाव कम करना है. इस प्रस्ताव के लागू होने से इक्विटी, कमोडिटी और करंसी ऑप्शंस सेगमेंट में ट्रेडिंग अनुभव पहले से ज्यादा आसान और व्यवस्थित हो सकता है.
क्या है SEBI का नया प्रस्ताव?
सेबी ने ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए स्ट्राइक प्राइस तय करने और उन्हें लगातार मैनेज करने के लिए नया फ्रेमवर्क प्रस्तावित किया है. इसके तहत बाजार में ‘इन-द-मनी’ और ‘आउट-ऑफ-द-मनी’ कॉन्ट्रैक्ट्स की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी.
इसके अलावा मौजूदा बाजार कीमतों के आसपास उपलब्ध स्ट्राइक प्राइस की रोजाना समीक्षा की जाएगी, ताकि ट्रेडर्स को हर समय जरूरी ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट्स मिल सकें. वहीं बाजार स्तर से काफी दूर चले गए स्ट्राइक प्राइस को समय-समय पर हटाने का भी प्रावधान होगा.
बड़े उतार-चढ़ाव में ट्रेडर्स को कैसे मिलेगा फायदा?
सेबी के मुताबिक कई बार बाजार में अचानक तेज उतार-चढ़ाव के कारण कीमतें उपलब्ध स्ट्राइक प्राइस की सीमा से बाहर चली जाती हैं. ऐसी स्थिति में ट्रेडर्स के पास हेजिंग या नई पोजीशन लेने के लिए सही ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट उपलब्ध नहीं रहते.
नए फ्रेमवर्क के तहत बाजार में इंट्राडे मूवमेंट के दौरान जरूरत पड़ने पर तुरंत नए स्ट्राइक प्राइस जोड़े जा सकेंगे. इससे ट्रेडर्स को तेजी से बदलते बाजार में भी बेहतर ट्रेडिंग और रिस्क मैनेजमेंट का विकल्प मिलेगा.
ब्रोकर्स और ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म को भी राहत
सेबी ने माना कि स्ट्राइक प्राइस में बार-बार बदलाव होने पर ब्रोकर्स और ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म्स को लगातार सिस्टम अपडेट करने पड़ते हैं, जिससे तकनीकी खर्च बढ़ जाता है. नए प्रस्ताव में इस बात का ध्यान रखा गया है कि इंट्राडे बदलावों के दौरान ब्रोकर्स के सिस्टम में बड़े तकनीकी बदलाव की जरूरत न पड़े. इससे ऑपरेशनल बोझ और लागत दोनों कम हो सकती हैं.
फिलहाल कैसे काम करता है सिस्टम?
अभी लंबी अवधि के इंडेक्स ऑप्शंस के लिए ही सीमित नियामकीय ढांचा मौजूद है. अलग-अलग स्टॉक एक्सचेंज अपने हिसाब से स्ट्राइक इंटरवल मैनेज करते हैं. स्ट्राइक प्राइस वह कीमत होती है, जिस पर ऑप्शंस ट्रेडर को किसी सिक्योरिटी को खरीदने या बेचने का अधिकार मिलता है. वहीं स्ट्राइक इंटरवल दो स्ट्राइक प्राइस के बीच का अंतर होता है, जिसे बाजार में लिक्विडिटी और प्रोडक्ट उपलब्धता के संतुलन के हिसाब से तय किया जाता है.
Nifty ऑप्शंस में अभी क्या स्थिति है?
उद्योग के जानकारों के मुताबिक मौजूदा स्ट्राइक प्राइस सिस्टम बाजार के बड़े उतार-चढ़ाव को काफी हद तक कवर करता है. उदाहरण के तौर पर NSE Nifty 50 ऑप्शंस सीरीज में 26 मई एक्सपायरी के लिए 20,100 से 27,250 तक कुल 144 स्ट्राइक प्राइस उपलब्ध हैं, जबकि निफ्टी का हालिया बंद स्तर करीब 24,032 था.
हालांकि ट्रेडिंग गतिविधियां मुख्य रूप से ‘एट-द-मनी’ और ‘नियर आउट-ऑफ-द-मनी’ कॉन्ट्रैक्ट्स के आसपास ही केंद्रित रहती हैं. सबसे ज्यादा पुट ओपन इंटरेस्ट 24,000 स्ट्राइक के पास देखा गया, जबकि कॉल साइड पर 24,500 और 25,000 स्ट्राइक पर ज्यादा गतिविधि रही.
सभी ऑप्शन सेगमेंट पर लागू होगा फ्रेमवर्क
सेबी का प्रस्तावित फ्रेमवर्क इक्विटी, करंसी और कमोडिटी समेत सभी ऑप्शन सेगमेंट पर लागू होगा. बाजार में लिक्विडिटी और भागीदारी के स्तर के हिसाब से अलग-अलग कैटेगरी में नियम और फॉर्मूले अलग हो सकते हैं. सेबी ने इस प्रस्ताव पर 15 जून तक बाजार प्रतिभागियों और आम लोगों से सुझाव मांगे हैं.
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