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बाबु बनाम बाइट्स: भारत के ट्रिलियन-डॉलर बाजारों को नियंत्रित करने वाला भाईचारा
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने दुनिया के सबसे बड़े डेरिवेटिव एक्सचेंज को रेगुलेट करने के लिए एक और करियर ब्यूरोक्रेट को नियुक्त किया है. जबकि एल्गोरिदम माइक्रोसेकंड में ट्रेड कर रहे हैं. यह इस बात पर गहरे सवाल उठाता है कि क्या भारत की मार्केट संस्थाएं विशेष बाजार विशेषज्ञता की बजाय प्रशासनिक निरंतरता को प्राथमिकता दे रही हैं.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 8 hours ago
पलक शाह
जब नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने इस महीने संजय शौरी को रेगुलेशन, कंप्लायंस, रिस्क मैनेजमेंट और निवेशक शिकायतों की निगरानी के लिए एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नियुक्त करने की घोषणा की, तब प्रेस रिलीज में “गवर्नेंस” शब्द का सात बार इस्तेमाल हुआ. लेकिन “मार्केट्स” शब्द एक बार भी नहीं आया. यह अनुपस्थिति अपने आप में बहुत कुछ कहती है.
जब भारत के बाजार क्वांटम स्तर की तकनीक की ओर बढ़ रहे हैं, तब देश का सबसे शक्तिशाली एक्सचेंज अब भी सिर्फ वार्षिक अनुपालन रिपोर्ट (ACRs) भरने में उलझा हुआ दिखता है.
वित्तीय बाजार अब केवल मानवीय समझ और बैलेंस शीट गणित से नहीं चलते. अब उन्हें एल्गोरिदमिक एक्जीक्यूशन इंजन, हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग सिस्टम, एक्सपायरी-डे ऑप्शंस स्ट्रक्चर और मशीन आधारित रणनीतियां आकार दे रही हैं, जो इतनी तेज गति से काम करती हैं कि अधिकांश नीति निर्माता उसे समझ भी नहीं सकते.
ऐसे माहौल में निगरानी केवल एक रेगुलेटरी कार्य नहीं रह गई है. यह एक तकनीकी अनुशासन बन चुका है. निगरानी के लिए सिर्फ प्रशासनिक अधिकार नहीं, बल्कि इस बात की गहरी समझ भी चाहिए कि आधुनिक बाजार कैसे व्यवहार करते हैं, जब पूंजी, लीवरेज, तकनीक और इंसेंटिव मिलीसेकंड में टकराते हैं.
फिर भी भारत की वित्तीय संस्थाओं में एक स्पष्ट पैटर्न दिखाई देता है. सिस्टम बार-बार बाजार विशेषज्ञों की बजाय प्रशासनिक ढांचे की ओर लौटता है, ऐसे ब्यूरोक्रेट्स और बाबुओं की ओर, जो रिटायरमेंट के बाद भी शानदार पदों की तलाश में रहते हैं.
क्षमता से ज्यादा आराम को प्राथमिकता: खुदरा निवेशकों के पैसे के लिए असली खतरा
शौरी की नियुक्ति इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उनके पास योग्यता की कमी है. भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के मानकों के अनुसार उनका अनुभव बेहद मजबूत है. उन्होंने कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय में वरिष्ठ कानूनी और प्रशासनिक भूमिकाएं निभाई हैं, कई मंत्रालयों में काम किया है और दशकों तक सरकारी ढांचे के भीतर रहे हैं.
लेकिन असली मुद्दा यही है. भारत की सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थाएं अब विशेषज्ञ बाजार पारिस्थितिकी तंत्र की बजाय प्रशासनिक राज्य के विस्तार की तरह संचालित होती दिखाई देती हैं.
इस पद के साथ जुड़ा लगभग 5 करोड़ रुपये वार्षिक वेतन इस प्रतीकवाद को और गहरा करता है. देश की सबसे उन्नत मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाएं अब रिटायर्ड या ट्रांजिशन कर रहे रेगुलेटर्स और ब्यूरोक्रेट्स के लिए बेहद आरामदायक ठिकाने बन चुकी हैं.
नियुक्तियां औपचारिक रूप से मंजूर होती हैं, प्रक्रियागत रूप से वैध होती हैं और संस्थागत रूप से बचाव भी किया जाता है. लेकिन समय के साथ यह पैटर्न खुद बड़े सवाल खड़े करने लगता है.
यह सवाल आज नहीं उठे
ये सवाल शौरी की नियुक्ति से शुरू नहीं हुए. वे पिछले दो दशकों से धीरे-धीरे बनते रहे हैं.
को-लोकेशन घोटाले के सार्वजनिक होने से बहुत पहले और आनंद सुब्रमणियन प्रकरण के NSE को गवर्नेंस विफलता के केस स्टडी में बदलने से भी पहले, भारत के एक्सचेंज एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र में बदल चुके थे, जहां पूर्व रेगुलेटर्स, ब्यूरोक्रेट्स, नीति निर्माता और प्रशासक लगातार एक ही संस्थागत गलियारों में घूमते रहे.
2013 में RBI की डिप्टी गवर्नर पद से रिटायर होने के सात महीने बाद श्यामला गोपीनाथ NSE बोर्ड में शामिल हुईं. तकनीकी रूप से इसमें कुछ गलत नहीं था. उस समय ऐसा कोई नियम नहीं था जो इसे रोकता.
लेकिन इस नियुक्ति ने वित्तीय जगत में गंभीर बहस छेड़ दी. क्योंकि गोपीनाथ सिर्फ वरिष्ठ केंद्रीय बैंकर नहीं थीं. RBI डिप्टी गवर्नर के रूप में वह SEBI बोर्ड में RBI की प्रतिनिधि भी थीं, यानी उन्हीं एक्सचेंजों की निगरानी व्यवस्था का हिस्सा, जिनकी बाद में बोर्ड सदस्य बनीं.
तब समर्थकों ने कहा कि RBI सीधे स्टॉक एक्सचेंजों का रेगुलेटर नहीं है और विशेषज्ञता को रिटायरमेंट के बाद संस्थाओं से दूर नहीं रखा जाना चाहिए.
आलोचकों ने एक असहज सवाल उठाया: अगर रेगुलेटर्स को पता हो कि सार्वजनिक पद छोड़ने के तुरंत बाद एक्सचेंज बोर्ड में आकर्षक पद मिल जाएंगे, तो क्या सख्त निगरानी के लिए जरूरी संस्थागत दूरी पहले ही कमजोर नहीं पड़ने लगती?
उस बहस का कभी समाधान नहीं हुआ. सिस्टम ने उसे आत्मसात किया और आगे बढ़ गया.
धीरे-धीरे गहराता गया नेटवर्क
समय के साथ यह पैटर्न और गहरा होता गया.
पूर्व वित्त सचिव, पूर्व SEBI अधिकारी, पूर्व RBI अधिकारी और रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स लगातार एक्सचेंजों, डिपॉजिटरीज और मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाओं के बोर्ड में आते रहे.
कुछ कूलिंग-ऑफ अवधि के बाद आए, कुछ लगभग तुरंत. हर नियुक्ति व्यक्तिगत रूप से सही ठहराई जा सकती थी. लेकिन सामूहिक रूप से उन्होंने एक ऐसा रेगुलेटरी इकोसिस्टम बना दिया, जिसमें निगरानी और संस्थागत निर्माण की सीमाएं धुंधली होती गईं.
मुद्दा कभी वैधता का नहीं था. मुद्दा केंद्रीकरण का था.
और इसके परिणाम सबसे स्पष्ट रूप से NSE में दिखाई दिए.
आनंद सुब्रमणियन मामला अपवाद नहीं, संस्कृति था
आनंद सुब्रमणियन प्रकरण को अक्सर उसके अजीब पहलुओं “हिमालयी योगी”, ईमेल्स और विचित्र आंतरिक शक्ति संरचनाओं के लिए याद किया जाता है.
लेकिन असली संस्थागत सबक कहीं और था.
इस घोटाले ने दिखाया कि भारत का सबसे शक्तिशाली एक्सचेंज वास्तविक निगरानी से कितना सुरक्षित हो चुका था. असामान्य नियुक्तियां सामान्य बना दी गई थीं. वेतन संरचनाओं पर सवाल नहीं उठे. संस्थागत प्रतिष्ठा की ढाल के पीछे गवर्नेंस प्रक्रियाएं धीरे-धीरे कमजोर होती गईं.
समस्या सिर्फ एक व्यक्ति या एक प्रबंधन टीम की नहीं थी. समस्या उस संस्कृति की थी, जहां शक्ति के करीब होना, प्रशासनिक परिचय और आंतरिक नेटवर्क, पारदर्शी प्रक्रियाओं और विशेषज्ञ क्षमता से ज्यादा प्रभावशाली दिखाई देते थे.
खुद को खुद ही रेगुलेट करने वाला सिस्टम
आज NSE का बोर्ड एक बार फिर प्रशासनिक व्यवस्था के भारी प्रभाव को दर्शाता है. इसके चेयरपर्सन श्रीनिवास इनजेती एक अनुभवी ब्यूरोक्रेट हैं, जिनके पास वित्त, फार्मास्यूटिकल्स और खेल प्रशासन समेत कई क्षेत्रों में दशकों का सरकारी अनुभव है. उनके पूर्ववर्ती गिरीश चंद्र चतुर्वेदी भी इसी व्यापक तंत्र से आए थे. उनके आसपास मौजूद गवर्नेंस संरचना अब तेजी से उस पुरानी संस्थागत संस्कृति जैसी दिखने लगी है, जिसका बचाव NSE को लगातार विवादों के बाद करना पड़ा था, जब उसकी कमजोरियां उजागर हुई थीं.
यह समानता शायद अनजाने में हो. लेकिन इसे नजरअंदाज करना मुश्किल है.
जो सामने आ रहा है, वह सिर्फ व्यक्तियों की कहानी नहीं है. यह संस्थागत प्रवृत्तियों की कहानी है.
भारत की वित्तीय गवर्नेंस संरचना प्रशासनिक निरंतरता पर क्षेत्रीय विशेषज्ञता से ज्यादा भरोसा करती दिखाई देती है. सिस्टम बार-बार उन लोगों की ओर लौटता है, जिन्हें वह सांस्कृतिक और प्रशासनिक रूप से समझता है, बजाय उन पेशेवरों के जो खुद बाजारों के भीतर विकसित हुए हैं.
यह प्रवृत्ति शायद कभी संभाली जा सकती थी. लेकिन अब इसे सही ठहराना मुश्किल होता जा रहा है.
क्योंकि आधुनिक बाजार संस्थागत अज्ञानता को बेहद तेजी से दंडित करते हैं.
जेन स्ट्रीट प्रकरण ने यह दिखाया कि रेगुलेटर्स अब कितनी जटिल चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. SEBI के निष्कर्षों के अनुसार, अत्यधिक जटिल ट्रेडिंग संरचनाओं ने कथित तौर पर Bank Nifty से जुड़े इंस्ट्रूमेंट्स में एक्सपायरी डायनेमिक्स को प्रभावित किया, जबकि ऑफसेटिंग डेरिवेटिव पोजिशंस के जरिए भारी मुनाफा कमाया गया. कोई SEBI के आदेश के हर पहलू से सहमत हो या नहीं, लेकिन इस मामले ने एक ऐसी वास्तविकता को रेखांकित किया, जिससे भारत अब बच नहीं सकता: आज बाजार में हेरफेर केवल साधारण ऑपरेटर नेटवर्क के जरिए नहीं होता. यह अत्यधिक जटिल रणनीतियों के जरिए होता है, जो लिक्विडिटी व्यवहार, वोलैटिलिटी पोजिशनिंग, ऑर्डर-फ्लो डायनेमिक्स और माइक्रोस्ट्रक्चरल असमानताओं पर आधारित होती हैं.
और यह संयोग नहीं है कि हाल के समय की सबसे तकनीकी रूप से उन्नत प्रवर्तन कार्रवाइयों में से एक अनंत नारायण के नेतृत्व में सामने आई — जो हाल के वर्षों में वैश्विक बैंकिंग और कैपिटल मार्केट्स में गहरा अनुभव रखने वाले कुछ वरिष्ठ रेगुलेटर्स में से एक थे.
नारायण डेरिवेटिव्स को नीति फाइलों में मौजूद अमूर्त अवधारणाओं की तरह नहीं, बल्कि वास्तविक कार्यरत सिस्टम की तरह समझते थे. इतने जटिल बाजारों की निगरानी पूरी तरह उन अधिकारियों द्वारा नहीं की जा सकती, जो उन्हें बाहर से सीख रहे हों. वह समझते थे कि ट्रेडर्स पोजिशन कैसे बनाते हैं, आर्बिट्राज डेस्क कैसे सोचते हैं, एक्सपायरी के दौरान ऑप्शंस बुक्स कैसे व्यवहार करती हैं और किस तरह हेरफेर वैध दिखने वाले फ्लो के भीतर छिप सकता है.
उनका जाना, और पूरे रेगुलेटरी तंत्र में प्रशासनिक नियुक्तियों को लगातार प्राथमिकता मिलना, एक असहज सवाल खड़ा करता है, जिसे भारत के बाजार अब ज्यादा समय तक टाल नहीं सकते: क्या आधुनिक वित्तीय बाजारों की निगरानी करने वाली संस्थाएं उन लोगों द्वारा चलाई जा रही हैं, जिन्हें इन बाजारों की सबसे गहरी परिचालन समझ हासिल है?
यह सवाल तब और तीखा हो जाता है, जब व्यापक रेगुलेटरी तंत्र की संरचना पर नजर डाली जाए.
नॉर्थ ब्लॉक से NSE बोर्ड तक: वही चेहरे, अलग कुर्सियां
SEBI, एक्सचेंजों और मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाओं में वही नेटवर्क लगातार दिखाई देते हैं. रिटायर्ड अधिकारी बोर्ड्स में चले जाते हैं. पूर्व रेगुलेटर्स उन्हीं संस्थाओं में दोबारा दिखाई देते हैं, जिनकी वे कभी निगरानी करते थे. सरकारी अनुभवी लोग गवर्नेंस संरचनाओं पर हावी रहते हैं, जबकि बाजार विशेषज्ञ अक्सर सलाहकार बनकर रह जाते हैं, निर्णयकर्ता नहीं. सिस्टम धीरे-धीरे खुद को ही भीतर से वैध ठहराने लगता है.
पिछले दो दशकों में भारत की आधुनिक वित्तीय रेगुलेटरी संरचना को आकार देने वाले कई लोग नॉर्थ ब्लॉक और वित्तीय रेगुलेटरी तंत्र के आपस में जुड़े प्रशासनिक और नीतिगत समूहों से निकले थे. के. पी. कृष्णन जैसे प्रभावशाली ब्यूरोक्रेट्स के आसपास विकसित हुए तंत्र ने केवल नीतिगत ढांचे ही नहीं बनाए, बल्कि एक स्थायी संस्थागत संस्कृति भी तैयार की — जहां वही प्रशासनिक नेटवर्क सरकारों और संकटों के गुजर जाने के बाद भी SEBI, एक्सचेंजों, रेगुलेटरी समितियों और वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर बोर्ड्स में बार-बार दिखाई देते रहे. यह निरंतरता इसलिए उल्लेखनीय नहीं है कि यह किसी समन्वय को साबित करती है, बल्कि इसलिए कि यह दिखाती है कि भारत के बाजारों की गवर्नेंस संरचना धीरे-धीरे कितनी केंद्रीकृत हो गई.
अगर इसी नजरिए से देखा जाए, तो NSE की गवर्नेंस के अलग-अलग चरणों में परिचित प्रशासनिक चेहरों की वापसी अब संयोग कम और संरचनात्मक वास्तविकता ज्यादा लगने लगती है.
यह जरूरी नहीं कि कोई साजिश हो. कुछ मायनों में यह साजिश से भी ज्यादा शक्तिशाली है, क्योंकि इसे किसी समन्वय की जरूरत नहीं पड़ती. यह परिचय, सहजता और संस्थागत आदतों के जरिए काम करता है.
और यही चीज इसे टिकाऊ बनाती है.
भारत के बाजार विकास के महत्वपूर्ण चरणों के दौरान वित्त मंत्रालय, SEBI और प्रमुख वित्तीय संस्थाओं तक फैले व्यापक प्रशासनिक प्रभाव नेटवर्क का प्रतीक कई बाजार चर्चाओं में के. पी. कृष्णन को माना जाने लगा. चाहे नीति निर्माण हो, बोर्ड प्रभाव हो या रेगुलेटरी पोजिशनिंग, एक छोटे प्रशासनिक समूह ने उन संस्थाओं पर असंगत रूप से ज्यादा प्रभाव स्थापित कर लिया, जिन्हें मूल रूप से स्वतंत्र और पेशेवर रूप से विविध गवर्नेंस संरचनाओं के साथ संचालित करने के लिए बनाया गया था.
विडंबना को नजरअंदाज करना मुश्किल है.
NSE को मूल रूप से बॉम्बे की पुराने ब्रोकर-प्रधान एक्सचेंज संस्कृति से अलग एक नई शुरुआत के रूप में बनाया गया था. इसे तकनीकी पारदर्शिता, संस्थागत आधुनिकता और गवर्नेंस सुधार का प्रतीक होना था. लेकिन समय के साथ यह कुछ और ही बन गया: एक ऐसी बाजार संस्था, जहां प्रशासनिक अभिजात वर्ग का प्रभाव इतना गहराई तक समा गया कि रेगुलेटर, निगरानीकर्ता और संस्था के बीच की रेखा अक्सर धुंधली दिखाई देने लगी.
और यही शौरी की नियुक्ति के पीछे की असली कहानी है.
सिर्फ वेतन नहीं. सिर्फ व्यक्ति नहीं. बल्कि वह संस्थागत प्रतीक, जिसका यह प्रतिनिधित्व करती है.
भारत के वित्तीय बाजार अब दुनिया के सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल हैं. लाखों नए खुदरा निवेशक तेजी से जटिल होते डेरिवेटिव बाजारों में प्रवेश कर रहे हैं, जहां दुनिया की सबसे उन्नत ट्रेडिंग फर्म्स मौजूद हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटिटेटिव एक्जीक्यूशन और मशीन-गति वाली लिक्विडिटी खुद ट्रेडिंग की प्रकृति को बदल रही है.
फिर भी इस बदलाव की निगरानी करने वाली गवर्नेंस संरचना अब भी उस नौकरशाही संस्कृति से गहराई से जुड़ी दिखाई देती है, जो प्रशासनिक वरिष्ठता को विशेषज्ञ बाजार समझ से ऊपर रखती है.
इतने तकनीकी रूप से जटिल बाजार की निगरानी केवल संस्थागत परिचय के भरोसे लंबे समय तक नहीं की जा सकती.
आखिरकार क्षमता का अंतर मायने रखने लगता है.
और जब ऐसा होता है, तो खतरा सिर्फ रेगुलेटरी शर्मिंदगी का नहीं होता. खतरा यह होता है कि बाजार की अखंडता की रक्षा के लिए बनाई गई संस्थाएं खुद इतनी सामाजिक और संरचनात्मक रूप से आपस में उलझ जाएं कि समय रहते अपनी कमजोरियों को पहचान ही न पाएं.
आज भारत के बाजार दुनिया के सबसे तकनीकी रूप से उन्नत ट्रेडिंग इकोसिस्टम में शामिल हैं. लेकिन उन्हें संचालित करने वाली संस्थाएं अब भी एक पुरानी प्रशासनिक प्रवृत्ति से प्रभावित दिखाई देती हैं, ऐसी प्रवृत्ति, जो अब भी नौकरशाही निरंतरता को तकनीकी क्षमता समझने की भूल करती है. सामान्य समय में यह अंतर शायद दिखाई न दे. लेकिन संकट, हेरफेर और सिस्टम पर दबाव के दौरान यह बेहद खतरनाक बन जाता है, जब रेगुलेटर्स को उन बाजारों का सामना करना पड़ता है, जो उन्हें नियंत्रित करने वाली संस्थाओं से कहीं तेजी से विकसित हो रहे होते हैं.
NSE को भारतीय वित्तीय व्यवस्था को आधुनिक बनाने और BSE की पुरानी क्लब-आधारित संरचना को तोड़ने के लिए बनाया गया था.
अब असहज सवाल यह है कि क्या उसकी जगह सिर्फ एक दूसरे तरह के क्लब ने ले ली है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
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