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बढ़ती यील्ड ने कॉरपोरेट्स को बैंकों की ओर मोड़ा, बॉन्ड फाइनेंसिंग का फायदा घटा

बैंकों की औसत लेंडिंग दर (WALR) में बदलाव धीरे-धीरे हुआ. यह FY24–FY25 में 9.7–9.8% तक पहुंचने के बाद मार्च 2026 तक घटकर करीब 9% पर आ गई. इसी वजह से बॉन्ड यील्ड और बैंक लोन दरों के बीच का अंतर तेजी से घटा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 hours ago

भारतीय कॉरपोरेट्स और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFCs) अब तेजी से बैंक कर्ज की ओर रुख कर रही हैं. इसकी मुख्य वजह पूंजी बाजार में बढ़ती यील्ड है, जिससे बॉन्ड फाइनेंसिंग का लागत लाभ काफी हद तक कम हो गया है. यह जानकारी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी CareEdge Ratings की एक रिपोर्ट में सामने आई है. रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी बॉन्ड यील्ड में तेज वृद्धि ने वित्तीय स्थितियों को अधिक सख्ती से प्रभावित किया है, जबकि बैंक लेंडिंग दरों में यह बदलाव अपेक्षाकृत धीमा रहा है. इसी कारण कंपनियां अपने फंडिंग विकल्पों में संतुलन बदल रही हैं.

सरकारी बॉन्ड यील्ड में तेज बढ़ोतरी

मार्च 2021 में जहां 1 साल की सरकारी प्रतिभूति (G-Sec) यील्ड लगभग 3.8% और 10 साल की यील्ड करीब 6.4% थी, वहीं मार्च 2026 तक यह बढ़कर लगभग 7% के आसपास पहुंच गई. इस बढ़ोतरी ने यील्ड कर्व को फ्लैट कर दिया है, जिससे सभी तरह के कर्ज की लागत बढ़ गई है. खासकर अल्पकालिक दरों में तेज वृद्धि देखी गई है.

बैंक लोन बनाम बॉन्ड, घटता अंतर

बैंकों की औसत लेंडिंग दर (WALR) में बदलाव धीरे-धीरे हुआ. यह FY24–FY25 में 9.7–9.8% तक पहुंचने के बाद मार्च 2026 तक घटकर करीब 9% पर आ गई. इसी वजह से बॉन्ड यील्ड और बैंक लोन दरों के बीच का अंतर तेजी से घटा है.

1. AAA रेटेड कंपनियों के लिए अंतर, 490 बेसिस पॉइंट (FY21) से घटकर 168 बेसिस पॉइंट (FY26)
2. NBFCs के लिए अंतर, 473 से घटकर 156 बेसिस पॉइंट

A-रेटेड कंपनियों के लिए स्थिति और खराब हुई है, जहां बॉन्ड से उधारी अब बैंक लोन से भी महंगी हो गई है.

फंडिंग पैटर्न में बड़ा बदलाव

बदलते रुझानों का असर बाजार में साफ दिखाई दे रहा है.

1. NBFCs और कॉरपोरेट्स द्वारा NCD (नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर) जारी करना FY23 में ₹1.30 लाख करोड़ तक पहुंचा, लेकिन FY26 में गिरकर ₹0.33 लाख करोड़ रह गया.
2. औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों को बैंक क्रेडिट FY21 के ₹2.5 लाख करोड़ से बढ़कर FY24 में ₹12.6 लाख करोड़ हुआ, हालांकि FY26 तक यह ₹9.3 लाख करोड़ पर आ गया.
3. NBFCs को मिलने वाला बैंक क्रेडिट भी FY21 के ₹0.1 लाख करोड़ से बढ़कर ₹3.1 लाख करोड़ तक पहुंच गया.

बाजार में बदलाव की वजह

रिपोर्ट के अनुसार FY23 इस बदलाव का टर्निंग पॉइंट था. उस समय बढ़ती ब्याज दरें, जोखिम बढ़ना और निवेशकों की सतर्कता के कारण बॉन्ड मार्केट कम आकर्षक हो गया. इसके अलावा, लिक्विडिटी की स्थिति भी महत्वपूर्ण रही. FY21 में सरप्लस लिक्विडिटी थी, लेकिन FY23 के बाद यह तंग हो गई, जिससे शॉर्ट-टर्म उधारी महंगी हो गई. कई मामलों में अल्पकालिक दरें लंबी अवधि की यील्ड से भी ऊपर चली गईं.

विशेषज्ञों की राय

CareEdge Ratings के सीनियर डायरेक्टर संजय अग्रवाल के अनुसार, यह बदलाव क्रेडिट गुणवत्ता में गिरावट नहीं बल्कि एक ट्रांजिशन फेज है. उन्होंने कहा कि यील्ड तेजी से रीप्राइस हुई है जबकि बैंक लोन दरें धीरे बदली हैं, जिससे कंपनियां बैंक फाइनेंसिंग की ओर शिफ्ट हो रही हैं. इससे लिक्विडिटी और रीफाइनेंसिंग जोखिमों में थोड़ी राहत मिली है.

वहीं, CareEdge Ratings के एसोसिएट डायरेक्टर सौरभ भलेराउ का कहना है कि यह बदलाव बैंकिंग सिस्टम के लिए क्रेडिट ग्रोथ बढ़ाता है, लेकिन इससे बैंक बैलेंस शीट पर जोखिम भी केंद्रित हो सकता है.

रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं और लिक्विडिटी कड़ी रहती है, तो बैंक कर्ज की ओर झुकाव जारी रह सकता है. खासकर कम रेटिंग वाले उधारकर्ताओं के लिए बॉन्ड बाजार से फंड जुटाना और मुश्किल हो सकता है.
 


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