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पहलगाम आतंकी हमला : PM मोदी ने पाकिस्तान पर चलाया सबसे शक्तिशाली हथियार

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा सिंधु जल संधि को रद्द करना एक रणनीतिक बदलाव का संकेत है, जो पाकिस्तान की आर्थिक जीवनरेखा को निशाना बनाता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

पालक शाह

विनाशकारी पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कथित तौर पर 1960 की सिंधु जल संधि (IWT) को रद्द करने का निर्णय लिया है, जो लंबे समय से भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी के जल के बंटवारे को नियंत्रित करती रही है. यह निर्णायक कदम पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को गंभीर झटका देने के लिए उठाया गया है, जो उसके कृषि और ऊर्जा क्षेत्रों को निशाना बनाता है और उसकी जल सुरक्षा को गंभीर रूप से कमजोर करता है. यह कदम पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराने के लिए एक रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक के रूप में देखा जा रहा है, जो सिंधु नदी पर उसकी निर्भरता का लाभ उठाकर अधिकतम आर्थिक क्षति पहुंचा सकता है.

पाकिस्तान की कृषि रीढ़ पर करारा वार

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था काफी हद तक कृषि पर निर्भर है, जो उसके GDP का 24 प्रतिशत हिस्सा बनाती है और ग्रामीण श्रमिकों को रोजगार देती है. सिंधु नदी देश की 80 प्रतिशत से अधिक उपजाऊ भूमि को सिंचित करती है, खासकर पंजाब और सिंध प्रांतों में, जहां गेहूं, चावल और कपास जैसी फसलें उगाई जाती हैं. संधि को रद्द करके भारत विशेष रूप से पूर्वी नदियों (सतलुज, ब्यास और रावी) से पाकिस्तान की जलधारा को काफी हद तक कम कर सकता है, जो भारत के नियंत्रण में हैं.

विशेषज्ञों का अनुमान है कि जल की उपलब्धता में उल्लेखनीय कमी से फसल उत्पादन 50 प्रतिशत तक घट सकता है, जिससे पाकिस्तान का कृषि उत्पादन नष्ट हो सकता है. पाकिस्तान एग्रीकल्चरल रिसर्च काउंसिल चेतावनी देता है कि इससे खाद्यान्न उत्पादन ढह सकता है, जिससे भारी कमी और महंगाई उत्पन्न हो सकती है. इस आर्थिक गिरावट का असर गंभीर होगा, और विश्व बैंक का अनुमान है कि पाकिस्तान के GDP में हर साल 5 से 7 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है, क्योंकि उसका कृषि क्षेत्र जल संकट के बोझ तले दब जाएगा.

ऊर्जा क्षेत्र को पंगु बनाना

सिंधु नदी पाकिस्तान के ऊर्जा ढांचे की भी रीढ़ है, जो टरबेला और मंगला जैसे जलविद्युत बांधों को शक्ति देती है, जो देश की लगभग 30 प्रतिशत बिजली का उत्पादन करते हैं. जल प्रवाह में कमी से बिजली उत्पादन बाधित होगा और पाकिस्तान ऊर्जा संकट में डूब जाएगा. विश्लेषकों का अनुमान है कि प्रतिदिन 16 घंटे तक बिजली कटौती हो सकती है, जिससे औद्योगिक उत्पादन ठप हो जाएगा और आर्थिक अस्थिरता बढ़ जाएगी.

उद्योग क्षेत्र, जो पहले से ही उच्च लागतों के दबाव में है, गंभीर बाधाओं का सामना करेगा, जिससे उत्पादन में कटौती और आपूर्ति श्रृंखला टूटने की आशंका है. यह ऊर्जा संकट पाकिस्तान की आर्थिक समस्याओं को और बढ़ाएगा और भारत द्वारा संधि रद्द करने के रणनीतिक झटके से उबरने की उसकी क्षमता को कमजोर कर देगा.

जल सुरक्षा को कमजोर करना

पाकिस्तान की जल सुरक्षा लगभग पूरी तरह से सिंधु नदी पर निर्भर है, जो उसके सतही जल का 70 प्रतिशत प्रदान करती है. संधि को रद्द करके भारत पाकिस्तान की जल उपलब्धता को गंभीर रूप से घटा सकता है, जिससे उसकी पुरानी सिंचाई और जल संग्रहण प्रणाली ध्वस्त हो सकती है. नहरें, बैराज और जलाशय, जो लंबे समय से उपेक्षित रहे हैं, अपनी क्षमता से अधिक दबाव में आ जाएंगे और पाकिस्तान जल प्रवाह को प्रभावी ढंग से प्रबंधित नहीं कर सकेगा.

भूतल जल भंडार पहले ही अत्यधिक दोहन का शिकार हैं और खारे पानी को मीठे में बदलने की तकनीकें महंगी और धीमी हैं. ऐसे में पाकिस्तान के पास कोई कारगर विकल्प नहीं बचता. यह कदम पाकिस्तान की कमजोरियों को उजागर करेगा, उसकी जल-आधारित अर्थव्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देगा और उसकी आधारभूत संरचना को टूटने की कगार पर ला खड़ा करेगा.

भारत की भू-राजनीतिक विजय

सिंधु जल संधि (IWT) को रद्द करना पाकिस्तान की पहलगाम आतंकी हमले में कथित भूमिका के प्रति भारत की सीधी प्रतिक्रिया है, जिससे दोनों परमाणु-सशस्त्र पड़ोसियों के बीच तनाव और बढ़ गया है. सिंधु नदी को निशाना बनाकर भारत ने ऐसा हथियार चुना है जो बिना सीधी सैन्य टक्कर के अधिकतम आर्थिक क्षति पहुंचा सकता है. यह कदम पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता को और बढ़ा सकता है, जिससे उसकी सरकार आर्थिक पतन से जूझने पर मजबूर हो जाएगी और अंतरराष्ट्रीय आलोचना से ध्यान भटका सकेगी.

पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र या विश्व बैंक से कूटनीतिक हस्तक्षेप की मांग कर सकता है, लेकिन सिंधु जल पर भारत की रणनीतिक बढ़त उसे एक निर्णायक स्थिति में ला देती है। इस भू-राजनीतिक तनाव का असर वैश्विक शक्तियों तक फैल सकता है, जिसमें चीन जो पाकिस्तान का सहयोगी है, संभवतः भारत की कार्रवाई का विरोध कर सकता है, हालांकि कूटनीतिक समाधान में वर्षों लग सकते हैं, जिससे पाकिस्तान को तात्कालिक नुकसान झेलना पड़ेगा.

पाकिस्तान के पास नहीं है कोई रास्ता बचाव का

इस संकट के प्रभाव को कम करने के पाकिस्तान के विकल्प बेहद सीमित हैं. नए बांधों या जलाशयों का निर्माण दशकों और अरबों डॉलर के निवेश की मांग करता है, जो आर्थिक रूप से संकटग्रस्त पाकिस्तान वहन नहीं कर सकता. जल संरक्षण के उपाय सिंधु नदी के प्रवाह की क्षति की भरपाई के लिए अपर्याप्त हैं, और काबुल नदी या खारे पानी को मीठे में बदलने वाले संयंत्र जैसे वैकल्पिक स्रोत निकट भविष्य में व्यावहारिक नहीं हैं. जलवायु परिवर्तन, जो पिघलते ग्लेशियरों और अनियमित मानसूनों को प्रभावित करता है, इस संकट को और जटिल बना देता है, यह सुनिश्चित करता है कि पाकिस्तान का जल संकट एक दीर्घकालिक आर्थिक दलदल में तब्दील हो जाए.


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