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NPPA ने बढ़ाई इन 8 दवाओं की कीमत, अस्थमा से लेकर टीबी के इलाज में आती हैं काम
नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने आठ दवाओं की अधिकतम कीमतों को बढ़ा दिया है. यह फैसला मैन्युफैक्चर्स के आवेदन के बाद लिया गया है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago
नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी ( NPPA) ने आठ दवाओं की अधिकतम कीमतों में संशोधन किया है. इससे इन दवाओं की कीमतों में पहले से अधिक बढ़ोतरी हो गई है, जिसका असर सीधा आम जनता की जेब पर पड़ने वाला है. बता दें, नई अधिकतम कीमतें (ceiling price) तय करने को लेकर अथॉरिटी को कई मैन्युफैक्चर्स से आवेदन मिले थे. इसमें सक्रिय फार्मास्युटिकल अवयवों की बढ़ी लागत, उत्पादन की लागत में बढ़ोतरी जैसे कारणों का हवाला दिया गया था.
इन बीमारियों के इलाज में काम आती हैं दवा
एनपीपीए का दावा है कि जिन 8 दवाओं की कीमतों में संशोधन किया गया है, उनमें से ज्यादातर कम लागत वाली दवाएं हैं. अस्थमा, ग्लूकोमा, थैलेसीमिया, टीबी, मानसिक स्वास्थ्य विकारों के इलाज ये दवाएं काम आती है. अब इन 8 दवाओं के 11 शेड्यूल फॉर्मूलेशन ड्रग्स की अधिकतम कीमतों में उनकी वर्तमान कीमतों के मुकाबले 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी को मंजूरी दी गई है.
क्या होती है शेड्यूल्ड ड्रग्स?
शेड्यूल्ड ड्रग्स का मतलब है, ऐसी दवाएं जिनके लिए प्रिस्क्रिप्शन की जरूरत होती है और इन्हें काउंटर पर नहीं खरीदा जा सकता. भारत में ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स, 1945 के तहत दवाओं को अलग-अलग अनुसूचियों में बांटा गया है. इन अनुसूचियों में से एक अनुसूची एच है. अनुसूची एच में शामिल दवाओं को योग्य डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के बिना नहीं खरीदा जा सकता.
इन दवाओं की बढ़ी है कीमत
एनपीपीए ने जिन फॉर्मूलेशन के लिए अधिकतम कीमतों में संशोधन किया गया है. उनमें Benzyl Penicillin 10 lakh IU injection, Atropine injection 06.mg/ml; इंजेक्शन के लिए Streptomycin powder 750 mg व 1000 mg; Salbutamol tablet 2 mg and 4 mg, respirator solution 5 mg/ml; Pilocarpine 2% drops; Cefadroxil tablet 500 mg, इंजेक्शन के लिए Desferrioxamine 500 mg ; और Lithium tablets 300 mg शामिल हैं. इससे पहले एनपीपीए की ओर से 2019 और 2021 में 21 और 9 फॉर्मूलेशन की कीमत में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई थी.
क्यों बढ़ती है दवाओं की कीमत?
आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची 2015 के बाद 2022 में अपडेट हुई थी. दवाओं की अधिकतम कीमतों में कमी भी होती है और बढ़ोतरी भी होती है. जिन दवाओं के उत्पादन की कीमत बढ़ जाती है और अथॉरिटी को लगता है कि अगर उत्पादन कम हो जाएगा तो उस हिसाब से कंपनियों की मांगों पर समीक्षा होती है और कई मामलों में दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी भी होती है.
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