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डिसइन्वेस्टमेंट पर नहीं हो रही सरकार के 'मन' की, लक्ष्य से बहुत कम हुई कमाई
चुनावी मौसम में मोदी सरकार कोई रिस्क मोल लेना नहीं चाहती, इसलिए विनिवेश की प्रक्रिया को धीमा कर दिया है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago
सरकारी संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपना मोदी सरकार (Modi Government) की प्राथमिकता में शुमार है. टेक्निकल शब्द में इसे विनिवेश या डिसइन्वेस्टमेंट (Disinvestment) कहते हैं. हालांकि, तमाम कोशिशों के बावजूद सरकार वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए विनिवेश के लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाई है. एक रिपोर्ट बताती है कि इस फाइनेंशियल ईयर में सरकार को विनिवेश से अब तक 8,000 करोड़ रुपए मिले हैं, जो पूरे वर्ष के लिए निर्धारित 51,000 करोड़ रुपए के लक्ष्य का केवल 16 प्रतिशत है. कुछ संपत्तियों के लिए सरकार को सही खरीदार नहीं मिल पाया है, तो कुछ मामलों में उसने चुनावी नुकसान की आशंका के चलते खुद कदम रोक लिए हैं.
IDBI पर अटकी हुई है बात
IDBI बैंक के डिसइन्वेस्टमेंट का ऐलान सरकार काफी पहले कर चुकी है, लेकिन अब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 'उपयुक्त और उचित' मानदंडों के अनुपालन सहित विभिन्न कारणों से IDBI में सरकारी हिस्सेदारी बेचने की योजना में देरी हुई है. माना जा रहा है कि वैश्विक स्तर पर बदल रहे हालातों और घरेलू स्तर की चुनौतियों के मद्देनजर इस प्रक्रिया में और देरी हो सकती है. बता दें कि आईडीबीआई बैंक में बहुमत हिस्सेदारी हासिल करने के लिए Kotak Mahindra Bank, कनाडा निवासी Prem Watsa के निवेश वाला CSB Bank और Emirates NBD द्वारा प्रारंभिक बोलियां दाखिल की जा चुकी हैं. सरकार का लक्ष्य IDBI बैंक में 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचना है, जिसमें 30.48 प्रतिशत सरकार के पास और 30.34 प्रतिशत LIC के पास है.
यहां भी हैं कई चुनौतियां
IDBI Bank के अलावा, सरकार कॉनकोर और शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया में अपनी हिस्सेदारी बेचने की चुनौतियों से जूझ रही है. रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि केंद्र के स्वामित्व वाली खनन कंपनी NMDC की सहायक कंपनी, छत्तीसगढ़ स्थित एनएमडीसी स्टील (NSL) में बहुमत हिस्सेदारी के लिए वित्तीय बोलियां 2024 तक के लिए स्थगित कर दी गई हैं. सरकार को 50.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचकर कम से कम 11,000 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है. सरकार की इस महत्वकांक्षी योजना का काफी विरोध हो चुका है. लिहाजा, चुनावी मौसम में मोदी सरकार कोई रिस्क मोल लेना नहीं चाहती, इसलिए विनिवेश की प्रक्रिया को धीमा कर दिया है. यदि चुनावों के परिणाम उम्मीद अनुरूप आते हैं, तो फिर इस दिशा में तेजी से बढ़ा जाएगा.
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