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लौह अयस्क होगा महंगा, स्क्रैप बनेगा स्टील इंडस्ट्री का सबसे बड़ा कच्चा माल: डॉ. अशोक पांडा

सेल के सीएमडी डॉ. अशोक कुमार पांडा ने कहा कि स्टील किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. इसका प्रत्यक्ष योगदान भले ही 7-8 प्रतिशत के आसपास हो, लेकिन यह पूरे औद्योगिक विकास को गति देता है.

रितु राणा 1 month ago

भारत का स्टील उद्योग अब केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसका भविष्य स्क्रैप आधारित स्टील निर्माण, सर्कुलर इकोनॉमी, ग्रीन टेक्नोलॉजी और डीकार्बोनाइजेशन पर निर्भर करेगा. आने वाले वर्षों में आयरन ओर महंगा हो सकता है, जबकि स्क्रैप सबसे महत्वपूर्ण कच्चे माल के रूप में उभरेगा. साथ ही इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) तकनीक, नवीकरणीय ऊर्जा और आधुनिक तकनीकें भारतीय स्टील उद्योग की दिशा तय करेंगी. यह बात एम-जंक्शन (mjunction) द्वारा आयोजित 13वें भारतीय स्टील मार्केट (Steelathon) सम्मेलन में स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक (CMD) डॉ. अशोक कुमार पांडा ने अपने संबोधन में कही.

उन्होंने कहा कि हमारी जिम्मेदारी केवल स्टील का उत्पादन करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि स्टील का हर टन उत्पादक से उपभोक्ता, उपभोक्ता से रिसाइक्लर और फिर नए स्टील के रूप में उत्पादन चक्र में वापस लौटे. यही वास्तविक सर्कुलर इकोनॉमी का मॉडल है और इसी दिशा में उद्योग को आगे बढ़ना होगा.

स्टील सेक्टर 'सनशाइन' नहीं, 'सनराइज' इंडस्ट्री

SAIL CMD ने कहा कि कई लोग स्टील उद्योग को 'सनशाइन इंडस्ट्री' कहते हैं क्योंकि इसमें प्रतिस्पर्धा तीव्र है, लागत का दबाव रहता है और मुनाफा सीमित होता है. लेकिन उनके अनुसार यह वास्तव में 'सनराइज इंडस्ट्री' है, क्योंकि इसमें विकास की अपार संभावनाएं हैं और आने वाले वर्षों में यह भारत की आर्थिक प्रगति का प्रमुख आधार बनने वाला है.

उन्होंने कहा कि स्टील किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. इसका प्रत्यक्ष योगदान भले ही 7-8 प्रतिशत के आसपास हो, लेकिन यह पूरे औद्योगिक विकास को गति देता है. कोविड-19 महामारी के दौरान जब अर्थव्यवस्था ठहर गई थी, तब स्टील उद्योग ने उत्पादन के साथ-साथ मेडिकल ऑक्सीजन उपलब्ध कराकर भी देश की जरूरतों को पूरा किया. 

उन्होंने कहा कि सरकार की पूरी विकास योजना में स्टील एक प्रमुख घटक है. इसलिए स्टील उत्पादन बढ़ाने के साथ रेलवे, जलमार्ग, सड़क और लॉजिस्टिक्स को भी समान गति से विकसित करना होगा.

भारत में स्टील की मांग दुनिया से तेज बढ़ रही

उन्होंने कहा कि विकसित देशों में स्टील की मांग स्थिर या घट रही है, जबकि भारत में यह करीब 7-8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है. प्रति व्यक्ति स्टील खपत अभी भी विकसित देशों की तुलना में कम है, इसलिए आने वाले वर्षों में मांग में तेज वृद्धि की संभावना है.

उन्होंने बताया कि भारत की स्टील उत्पादन क्षमता करीब 180-190 मिलियन टन तक पहुंच चुकी है और उद्योग 300 मिलियन टन क्षमता के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है. हालांकि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा. रेलवे, सड़क, जलमार्ग, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन जैसे बुनियादी ढांचे को भी समान गति से विकसित करना होगा.

लौह अयस्क पर निर्भरता घटानी होगी

उन्होंने कहा कि फिलहाल भारत में अधिकांश स्टील उत्पादन ब्लास्ट फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस (BF-BOF) तकनीक से होता है, जहां मुख्य कच्चा माल लौह अयस्क (Iron Ore)  है. अभी तक लौह अयस्क अपेक्षाकृत सस्ता रहा है, लेकिन भविष्य में टैक्स, रॉयल्टी और अन्य शुल्कों के कारण इसकी लागत बढ़ सकती है. ऐसे में स्टील उद्योग को वैकल्पिक कच्चे माल की ओर बढ़ना होगा.

स्क्रैप बनेगा भविष्य का सबसे अहम कच्चा माल

SAIL CMD ने कहा कि जिस स्क्रैप को कभी बेकार समझा जाता था, वही अब स्टील उद्योग का सबसे मूल्यवान संसाधन बनने जा रहा है. भविष्य में स्क्रैप केवल कबाड़ नहीं रहेगा, बल्कि स्टील उत्पादन का प्रमुख कच्चा माल होगा. उन्होंने कहा कि ऑटोमोबाइल स्क्रैपिंग जैसी नीतियां घरेलू स्तर पर स्क्रैप की उपलब्धता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएंगी.

उन्होंने यह भी कहा कि स्क्रैप का महत्व केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है. पूरी दुनिया में आयरन ओर का तेजी से खनन हो रहा है और भविष्य में प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा. ऐसे में स्क्रैप रिसाइक्लिंग संसाधनों की सुरक्षा और दीर्घकालिक स्टील उत्पादन के लिए भी जरूरी होगी.

ग्रीन स्टील के लिए EAF तकनीक होगी अहम

उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) आधारित स्टील उत्पादन भविष्य में तेजी से बढ़ेगा क्योंकि इससे कार्बन उत्सर्जन काफी कम होता है. हालांकि फिलहाल इसकी लागत अधिक है, लेकिन सस्ती बिजली, नवीकरणीय ऊर्जा और नई तकनीकों के विस्तार से यह उत्पादन पद्धति अधिक प्रतिस्पर्धी बन जाएगी.

उन्होंने कहा कि EAF तकनीक की सबसे बड़ी लागत बिजली है. यदि उद्योग को सस्ती और विश्वसनीय बिजली उपलब्ध होती है तो ग्रीन स्टील का उत्पादन तेजी से बढ़ सकेगा.

कार्बन उत्सर्जन कम करना सबसे बड़ी चुनौती

उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर डीकार्बोनाइजेशन अब स्टील उद्योग की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है. यूरोप सहित कई देशों में कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे नियम लागू किए जा रहे हैं. ऐसे में भारतीय स्टील उद्योग को उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ कार्बन फुटप्रिंट भी कम करना होगा.

उन्होंने कहा कि बेहतर परिचालन, नई तकनीक, ईंधन की खपत कम करना, स्वच्छ कच्चे माल का उपयोग और रिसाइक्लिंग इस लक्ष्य को हासिल करने के प्रमुख साधन होंगे.

SAIL CMD ने कहा कि तकनीक के विकास के साथ उद्योग में 'वेस्ट' की परिभाषा बदल रही है. पहले कम ग्रेड वाले आयरन ओर और स्टील स्लैग को बेकार माना जाता था, लेकिन आज नई तकनीकों की मदद से यही संसाधन उपयोगी कच्चे माल में बदल चुके हैं. उन्होंने कहा कि ब्लास्ट फर्नेस स्लैग का उपयोग सीमेंट उद्योग में, जबकि स्टील स्लैग का उपयोग सड़क निर्माण और अन्य औद्योगिक कार्यों में हो रहा है. भविष्य में लगभग हर औद्योगिक उप-उत्पाद का दोबारा उपयोग संभव होगा.

AI और सप्लाई चेन तय करेंगे उद्योग का भविष्य

उन्होंने कहा कि भविष्य का स्टील उद्योग केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा. इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), फाइनेंस, ट्रेडिंग, स्टील एवं स्क्रैप ट्रेड, स्लैग ट्रेड, वैल्यू अनलॉकिंग, सप्लाई चेन मैनेजमेंट और पारदर्शी बाजार व्यवस्था जैसी पूरी वैल्यू चेन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.

उन्होंने कहा कि स्टीलाथॉन सम्मेलन का उद्देश्य इसी पूरे इकोसिस्टम पर चर्चा करना है ताकि स्टील, स्क्रैप और स्लैग की निर्बाध सप्लाई चेन विकसित की जा सके और भारत वैश्विक स्टील उद्योग में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को और मजबूत कर सके. यह पॉइंट आर्टिकल में नहीं आया था.

मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को भी मजबूती मिलेगी: विनय वर्मा

एम-जंक्शन के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी विनय वर्मा ने स्वागत भाषण में कहा, "अब स्क्रैप को कचरा नहीं माना जाता, बल्कि यह भविष्य का स्टील है."

उन्होंने कहा, "भारत में स्टील की मांग लगातार बढ़ रही है. ऐसे में स्क्रैप केवल एक उप-उत्पाद नहीं रहेगा, बल्कि रणनीतिक कच्चे माल के रूप में उभरेगा. जितना अधिक स्टील स्क्रैप हम वापस हासिल करेंगे, उतनी ही हमारी आयरन ओर और आयातित स्क्रैप पर निर्भरता कम होगी. इससे भारत के मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को भी मजबूती मिलेगी."

उन्होंने कहा, एम-जंक्शन का उद्देश्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से स्क्रैप उत्पन्न करने वालों और स्टील निर्माताओं को जोड़ना है, ताकि पारदर्शिता बढ़े, बेहतर मूल्य खोज हो और पूरी वैल्यू चेन अधिक मजबूत बन सके."

 


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