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रिलायंस में लंबी पोजीशन, जियो में शॉर्ट: दलाल स्ट्रीट पर जिस ट्रेड की चर्चा है
भारत का पहला 10 लाख करोड़ रुपये के मूल्यांकन वाला आईपीओ लिस्टिंग के करीब है. ऐसे में बाजार के कुछ खिलाड़ी इस बात पर दांव लगा रहे हैं कि मूल कंपनी रिलायंस, उसकी सहायक कंपनी जियो से बेहतर प्रदर्शन करेगी. प्रॉस्पेक्टस से पता चलता है कि इस दांव के पीछे क्या वजह है और यह दांव चर्चा के मुकाबले लगाना कितना मुश्किल है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
पलक शाह
जियो प्लेटफॉर्म्स के 30,000 करोड़ रुपये के आईपीओ के खुलने में एक सप्ताह बाकी है. मुंबई और अहमदाबाद के डीलिंग रूम में एक ट्रेड की चर्चा बार-बार हो रही है: रिलायंस में लॉन्ग पोजीशन और जियो में शॉर्ट पोजीशन.
इसका विचार सरल है. 1,119 रुपये के इश्यू प्राइस पर जियो में रिलायंस की लगभग 65 प्रतिशत हिस्सेदारी का मूल्य करीब 6.6 लाख करोड़ रुपये है, जो रिलायंस के 15.84 लाख करोड़ रुपये के बाजार मूल्य का लगभग 42 प्रतिशत है. भारत में होल्डिंग कंपनियों के शेयर आमतौर पर उन सूचीबद्ध कंपनियों के मुकाबले डिस्काउंट पर कारोबार करते हैं, जिनमें उनकी हिस्सेदारी होती है. इस जोड़ी पर दांव लगाने वाले ट्रेडरों को उम्मीद है कि जियो की लिस्टिंग से रिलायंस के शेयर सस्ते या जियो के शेयर महंगे नजर आएंगे और दोनों के मूल्यांकन के बीच का अंतर रिलायंस के पक्ष में कम होगा.
यह दांव लगाना मुश्किल क्यों है
जियो में शॉर्ट पोजीशन लेना सुनने में जितना आसान लगता है, वास्तव में उतना है नहीं. भारत में बिना शेयर उधार लिए शॉर्ट सेलिंग की अनुमति नहीं है और किसी नए सूचीबद्ध शेयर में कई महीनों तक फ्यूचर्स और ऑप्शंस उपलब्ध नहीं होते. व्यावहारिक रूप से, लिस्टिंग के दिन जियो में शॉर्ट पोजीशन लेने का मतलब आईपीओ में मिले शेयरों को तेजी से बेचना या इंट्राडे ट्रेडिंग करना है, न कि बड़ी शॉर्ट पोजीशन बनाए रखना.
कौन बेच सकता है और कब
2020 के निवेशकों के जल्द बाहर निकलने की चर्चाओं के सामने भी प्रॉस्पेक्टस एक बाधा है. रिलायंस के अलावा अन्य निवेशकों के पास आईपीओ से पहले मौजूद शेयरों पर आवंटन की तारीख से छह महीने की लॉक-इन अवधि लागू है. इसमें केवल कुछ पंजीकृत वेंचर और वैकल्पिक निवेश फंडों को छूट दी गई है. इश्यू में लगभग 8,000 करोड़ रुपये का निवेश करने वाले एंकर निवेशक अपने आधे शेयर 30 दिन बाद और बाकी शेयर 90 दिन बाद बेच सकते हैं.
इसलिए शेयरों की आपूर्ति की पहली लहर, जो कीमत पर दबाव डाल सकती है, शुरुआती दिनों में आईपीओ पाने वाले निवेशकों से और नवंबर के आखिरी हिस्से से एंकर निवेशकों से आने की संभावना है. पहले सप्ताह में सिल्वर लेक या मुबाडाला जैसे निवेशकों की ओर से बिक्री की उम्मीद नहीं है.
कोई सुरक्षा कवच नहीं
इस इश्यू में कीमत को सहारा देने की कोई व्यवस्था भी नहीं है. जियो के प्रॉस्पेक्टस में स्पष्ट रूप से कहा गया है, “इस इश्यू के तहत कोई ग्रीन शू विकल्प नहीं है.” यह वह व्यवस्था होती है, जिसके तहत बैंकर गिरती हुई लिस्टिंग कीमत को सहारा देने के लिए शेयर खरीद सकते हैं. इसके अभाव में कारोबार के शुरुआती दिनों में कीमत पूरी तरह मांग पर निर्भर करेगी.
इससे घरेलू वेल्थ मैनेजरों पर ध्यान केंद्रित हो गया है, जो अमीर ग्राहकों के बीच इस इश्यू का प्रचार कर रहे हैं. ग्रे मार्केट प्रीमियम लगभग 50 रुपये है, जो इश्यू प्राइस से 5 प्रतिशत से भी कम अधिक है. इससे संकेत मिलता है कि फिलहाल बाजार को लिस्टिंग के दिन शेयर में बड़ी तेजी की उम्मीद नहीं है.
किन बातों पर नजर रखें
28 अक्टूबर को होने वाली लिस्टिंग से पता चलेगा कि यह ट्रेड सफल होता है या नहीं. अगर जियो अपनी कीमत बनाए रखता है और रिलायंस के शेयरों का मूल्यांकन बढ़ता है, तो लॉन्ग-शॉर्ट ट्रेड करने वाले निवेशकों को फायदा होगा. अगर पहले सप्ताह में जियो गिरता है और रिलायंस अपनी कीमत बनाए रखता है, तब भी यह दांव सफल रहेगा. दोनों ही स्थितियों में, स्टॉक एक्सचेंजों के बल्क और ब्लॉक डील के आंकड़ों से पता चलेगा कि शुरुआती कुछ दिनों में किसने शेयर बेचे.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
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