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लोकपाल की कानूनी बाजीगरी: तकनीकी आधार पर माधबी बुच को क्लीन चिट देना एक खतरनाक मिसाल

लोकपाल का यह फैसला सिर्फ बुच को छूट देना नहीं है; यह जवाबदेही से बचने के लिए त्रासदी का एक ऐसा खाका है, जो कानूनी भाषा की चादर में लिपटी हुई है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

पलक शाह 

116 पन्नों में फैली कानून और नौकरशाही की हैरान कर देने वाली बाजीगरी में, लोकपाल (Lokpal) ने पूर्व सेबी (SEBI) चेयरपर्सन माधबी पुरी बुच के खिलाफ गंभीर शिकायतों को निराधार बताते हुए तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया. यह फैसला केवल बुच को मुक्त नहीं करता, यह भारत के विनियामक ढांचे में एक बड़ा छेद कर देता है, जिससे हर ऐसा गुनहगार जो कैलेंडर और वकील रखता हो, आसानी से बच निकल सकता है. अगर सेबी भी यही कमजोर मानक अपनाता है, तो 99.99 प्रतिशत वित्तीय अपराधी बिना किसी खरोंच के निकल जाएंगे और बाजार की विश्वसनीयता चूर-चूर हो जाएगी.

बुच के खिलाफ लगे आरोप मामूली नहीं थे. उन पर सेबी की भूमिका निभाते हुए गंभीर हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) के आरोप लगे थे, एक ऐसा पद जो पूर्ण निष्पक्षता की मांग करता है. फिर भी, लोकपाल का आदेश ठोस मुद्दों से बचने की मिसाल पेश करता है. आदेश में क़ानून की समयसीमा (स्टैच्यूट ऑफ लिमिटेशन) का सहारा लेते हुए कहा गया कि अगर कोई अनुचित लाभ हुआ भी हो, तो वह या तो बुच के सेबी कार्यकाल से पहले का था या फिर शिकायत दर्ज होने की सात साल की सीमा से बाहर का था. यह इस सच्चाई को नजरअंदाज करता है कि हितों के टकराव समय के साथ खत्म नहीं होते; वे संस्थाओं में विश्वास को दीमक की तरह खोखला करते हैं.

बुच के आईसीआईसीआई बैंक के ESOPs का मामला लें, जिन्हें उन्होंने सेबी के कार्यकाल के दौरान भुना कर 10.3 करोड़ रुपये कमाए. लोकपाल ने इसे यूं ही टाल दिया, यह कहते हुए कि ये विकल्प 2011 से पहले दिए गए थे, इसलिए यह अब प्रासंगिक नहीं हैं. इस बात को नजरअंदाज करते हुए कि इन विकल्पों को उस समय भुनाना जब आप वित्तीय क्षेत्र, खासकर आईसीआईसीआई जैसे बैंकों को नियंत्रित कर रहे हों, स्पष्ट हितों के टकराव को दर्शाता है. आदेश का तर्क मूलतः यह कहता है: जब तक आप अपने इनाम कार्यभार संभालने से पहले सेट कर लें, तब तक सब जायज है. यह निगरानी नहीं है; यह सिस्टम को चकमा देने का खुला निमंत्रण है.

फिर था अगोरा एडवायजरी, बुच की कंसल्टेंसी फर्म, जो कथित रूप से तब भी राजस्व अर्जित करती रही जब वह सेबी की चेयरपर्सन थीं. लोकपाल ने इसके संचालन को लेकर उठी चिंताओं को खारिज कर दिया और इसके निष्क्रिय (डॉर्मेंट) होने के दावे को स्वीकार कर लिया, जबकि इसके विपरीत साक्ष्य मौजूद थे. अगर एक चेयरपर्सन निजी फर्म से संबंध बनाए रखते हुए बाजार को नियंत्रित कर सकती हैं, तो दूसरों को क्या रोक रहा है कि वे ऐसे ही "साइड बिज़नेस" चलाएं जो प्रभाव का संकेत देते हों? इस मुद्दे पर आदेश की चुप्पी बेहद चिंताजनक है, और यह एक ऐसी मिसाल स्थापित करता है जो भविष्य में नियामकों को बिना जवाबदेही के "मूनलाइटिंग" की छूट दे सकती है.

लोकपाल की तर्कशक्ति ने सुप्रीम कोर्ट के उस निष्कर्ष पर भी भरोसा किया जिसमें कहा गया था कि सेबी द्वारा कोई "नियामकीय विफलता" नहीं हुई थी, मानो इससे व्यक्तिगत हितों के टकराव स्वतः समाप्त हो जाते हों. यह ऐसा ही है जैसे कोई कहे कि शेफ ने सूप में जहर नहीं मिलाया, इसलिए यह ठीक है कि वह सामग्री बेचने वालों से मुनाफा कमा रहा है. क्या किसी बंदूक के धुएं के न होने से नैतिक गंध खत्म हो जाती है? और भी बुरा यह कि लोकपाल ने शिकायतकर्ताओं को अखबारों में छपी खबरों जैसे “कथित” स्रोतों पर भरोसा करने के लिए डांट लगाई, यह नजरअंदाज करते हुए कि मजबूत सिस्टम में अक्सर ऐसी खबरें ही जांच की शुरुआत करती हैं. शिकायत के स्तर पर पुख्ता सबूतों की मांग करके, लोकपाल ने मानक इतना ऊँचा कर दिया है कि अब सिर्फ वही व्हिसलब्लोअर शिकायत कर पाएंगे जिनके पास फाइलों का पुलिंदा हो और जान जोखिम में डालने का साहस भी.

सबसे ज्यादा परेशान करने वाला पहलू यह है कि लोकपाल ने शिकायतकर्ताओं पर “दुर्भावनापूर्ण मंशा” से काम करने का आरोप लगाया, यह दावा करते हुए कि उन्होंने कथित तौर पर अवैध रूप से प्राप्त टैक्स रिकॉर्ड के आधार पर यह कहानी बनाई. लोकपाल का शिकायतों के मूल विषय पर ध्यान देने के बजाय शिकायतकर्ताओं की रणनीति को निशाना बनाना, ध्यान भटकाने का एक परिचित तरीका है. अगर सेबी भी यही तरीका अपनाए, तो हर इनसाइडर ट्रेडर या बाजार में हेराफेरी करने वाला यह कह सकता है कि उसे गलत तरीके से उजागर किया गया और वह आसानी से बच निकलेगा. आदेश ने तो यहां तक कर दिया कि शिकायतकर्ता सार्वजनिक रूप से कोई भी सबूत साझा न कर सकें, इससे पूरी प्रक्रिया को गोपनीयता की चादर में ढंक दिया गया और ताकतवरों को जांच की निगाहों से बचा लिया गया.

 


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