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देसी ट्विटर पर लगने वाला है ताला, आखिर क्यों सफल नहीं हो पाया Koo? 

देसी ट्विटर के नाम से मशहूर Koo को लेकर बुरी खबर सामने आई है. अधिग्रहण की बातचीत विफल होने के बाद अब उस पर ताला लगने वाला है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

ट्विटर से मुकाबले के लिए सोशल मीडिया स्टार्टअप Koo की शुरुआत हुई थी. देसी ट्विटर कहे जाने वाले 'कू' को जोरशोर से प्रमोट किया गया और कुछ सेलेब्रिटीज भी इससे जुड़े. लेकिन इन सबके बावजूद Koo खास प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहा और अब उस पर ताला लगने जा रहा है. पिछले कुछ समय से Koo के अधिग्रहण को लेकर बातचीत चल रही थी, जो अब असफल हो गई है. इसी के साथ कू के जीवित रहने की संभावनाएं भी खत्म हो गई हैं.  

फाउंडर्स ने बताई मजबूरी
Koo के को-फाउंडर अप्रमेय राधाकृष्ण और मयंक बिदावतका ने अपने लिंक्डइन पोस्ट में इस बारे में जानकारी दी है. उन्होंने लिखा है - हमने कई बड़ी इंटरनेट कंपनियों, समूहों और मीडिया घरानों के साथ साझेदारी की संभावना तलाशी, लेकिन हमें मनमाफिक परिणाम नहीं मिले. इनमें से अधिकांश ने यूजर जनरेटेड कंटेंट और सोशल मीडिया कंपनी के वाइल्ड नेचर को ध्यान में रखते हुए अपने कदम पीछे खींच लिए, तो कुछ ने पार्टनरशिप साइन करने के करीब पहुंचने के बाद अपनी प्राथमिकता बदल दी. 

बहुत ज्यादा  है लागत
उन्होंने आगे लिखा है कि इस सबके बावजूद हम ऐप को चालू रखना चाहते थे, लेकिन इसमें टेक्नोलॉजी सर्विसेज की लागत बहुत अधिक आती है. इसलिए हमें न चाहते हुए भी ये कठिन निर्णय लेना पड़ रहा है. टाइगर ग्लोबल के निवेश वाले कू स्टार्टअप अब तक 6.5 करोड़ डॉलर की फंडिंग जुटा चुका है. Koo में इन्वेस्ट करने वालों में एक्सेल, 3one4 कैपिटल, नवल रविकांत, बालाजी श्रीनिवासन, कलारी कैपिटल आदि शामिल हैं. 

2020 में हुआ था लॉन्च
कू साल 2020 में लॉन्च हुआ था और यह ट्विटर जैसी पहली भारतीय माइक्रोब्लॉगिंग साइट थी. Koo को 10 भाषाओं के साथ बाजार में उतारा गया था, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इससे जुड़ सकें. लॉन्च के बाद से ऐप के लगभग 6 करोड़ डाउनलोड हो चुके हैं. Koo ने भारत के बाद नाइजीनिया और ब्राजील में भी अपनी सेवाएं शुरू की थीं. लेकिन माइक्रोब्लॉगिंग साइट को चलाये रखने के लिए उसे जितने पैसों की ज़रूरत थी, उसके इंतजाम नहीं हो सका. फंडिंग नहीं मिलने से स्टार्टअप मुश्किल में आ गया और कर्मचारियों की छंटनी भी करनी पड़ी. कहा तो यहां तक जाता है कि Koo के फाउंडर्स को कर्मचारियों की सैलरी का भुगतान भी अपनी जेब ​से करना पड़ा है. 

इस वजह से हुआ नुकसान
Koo को देसी ट्विटर कहा जाता है, ऐसे में इसके सामने सबसे बड़ी चुनौती ट्विटर पर पहले से मौजूद यूजर्स को अपने साथ लाने की थी. माइक्रोब्लॉगिंग की दुनिया में ट्विटर एक मजबूत नाम है. ट्विटर को भी वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ा, लेकिन उसका खजाना Koo की अपेक्षा काफी बड़ा है, इसलिए उसका संचालन चलता रहा. Koo को शुरुआत में अच्छी फंडिंग मिली, लेकिन वह बाद में निवेशकों को आकर्षित करने में नाकाम रहा, इसकी सबसे बड़ी वजह रही ग्रोथ की संभावनाओं का स्पष्ट न होना.  एक्सपर्ट्स मानते हैं कि Koo को ट्विटर के विकल्प के रूप में पेश करना सबसे बड़ी गलती थी. इसके चलते उसकी तुलना ट्विटर से की जाने लगी. उसे लेकर निवेशकों की अपेक्षा भी ट्विटर सरीखी हो गई, लेकिन परिणाम वैसे नहीं मिले. इसके चलते बाद में Koo को निवेश मिलना बंद हो गया.


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