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जिन्ना के बंगले का होगा पुनरुद्धार, जानिए कहां है ये ऐतिहासिक संपत्ति, कितनी है इसकी कीमत?

जिन्ना हाउस को डिप्लोमैटिक सेंटर बनाना न सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत का पुनरुद्धार होगा, बल्कि इसे भारत-पाक विभाजन की विरासत से जुड़ी नई पहचान भी देगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 11 months ago

मुंबई के सबसे महंगे इलाकों में शुमार मालाबार हिल्स स्थित ‘जिन्ना हाउस’ को लेकर जल्द ही एक बड़ा फैसला लिया जा सकता है. यह बंगला पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का था, जिन्हें भारत में विभाजन का जिम्मेदार ठहराया जाता है, जबकि पाकिस्तान में उन्हें ‘कायदे आजम’ कहा जाता है. इस बंगले को लेकर वर्षों से दो राय बनी हुई है. कुछ लोग इसे ढहाने की मांग करते हैं तो कुछ इसे एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित रखने के पक्ष में हैं. आइए जानते हैं इस  ऐतिहासिक भवन की क्या कीमत है और इसके पुनरुद्धार को लेकर क्या योजना है?

विदेश मंत्रालय के अधीन है संपत्ति

इस बंगले की देखरेख फिलहाल विदेश मंत्रालय के पास है मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब इस ऐतिहासिक इमारत को डिप्लोमैटिक एन्क्लेव के तौर पर विकसित किया जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली में हैदराबाद हाउस है. इसकी आधिकारिक स्वीकृति जल्द मिलने की संभावना है. 2018 में यह संपत्ति भारत सरकार द्वारा विदेश मंत्रालय को सौंपी गई थी, जबकि इससे पहले यह भारतीय संस्कृति संबंध परिषद के पास थी.

जिन्ना ने दो लाख रुपये में बनवाया था बंगला

इस बंगले का असली नाम ‘साउथ कोर्ट’ है लेकिन आज यह आम तौर पर ‘जिन्ना हाउस’ के नाम से जाना जाता है. इसे जिन्ना ने 1936 में इंग्लैंड से लौटने के बाद अपने लिए बनवाया था. इस बंगले का डिजाइन क्लॉड बैटले ने तैयार किया था, जो उस समय इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्किटेक्ट्स के प्रमुख थे. निर्माण के लिए इटली से कारीगर बुलाए गए और इमारत में इटालियन स्टाइल का वास्तुशिल्प अपनाया गया. तब इसे दो लाख रुपये की लागत से बनाया गया था, जब एक रुपये की कीमत एक अमेरिकी डॉलर के बराबर होती थी.

बंगले की वर्तमान कीमत 

यह भव्य बंगला करीब ढाई एकड़ में फैला है और समुद्र के बिल्कुल सामने स्थित है. आज इसकी अनुमानित कीमत 1500 करोड़ रुपये से अधिक मानी जाती है. हालांकि, इटालियन मार्बल से सजी इसकी दीवारें अब क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं और इसे पुनरुद्धार की आवश्यकता है. इसे संरक्षित करते हुए उपयोग में लाने की योजना इस दिशा में बड़ा कदम हो सकती है. भारत विभाजन के बाद यह बंगला ‘शत्रु संपत्ति’ घोषित कर दिया गया था, जैसा उन तमाम संपत्तियों के साथ हुआ जिनके मालिक पाकिस्तान चले गए थे. हालांकि, बताया जाता है कि पंडित नेहरू इस बंगले को जिन्ना को लौटाना चाहते थे. एक समय विचार था कि किसी यूरोपीय को उनकी सहमति से यहां किराये पर रहने दिया जाए, लेकिन जिन्ना की 1948 में मृत्यु हो गई और यह विचार अधूरा रह गया. 1949 में भारत सरकार ने इस बंगले को अपने अधिकार में ले लिया.

बेटी दीना वाडिया की कानूनी लड़ाई

जिन्ना की बेटी दीना वाडिया ने इस बंगले को वापस पाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी. जिन्ना ने 1939 में अपनी वसीयत में अपनी बहन फातिमा जिन्ना को अपनी संपत्ति का वारिस घोषित किया था, क्योंकि वे दीना की पारसी से शादी से नाराज थे. विभाजन के बाद फातिमा भी पाकिस्तान चली गईं, जिससे यह संपत्ति शत्रु संपत्ति की श्रेणी में आ गई. दीना वाडिया का दावा था कि वे कानूनी वारिस हैं और उनके अनुसार जिन्ना की संपत्ति पर हिंदू उत्तराधिकार कानून लागू होना चाहिए क्योंकि उनके पूर्वज हिंदू थे.


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