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अमेरिका की सख्ती के बीच भारत का मास्टरस्ट्रोक, सस्ते तेल पर रोक से पहले ही भर लिया भंडार

भारतीय तेल कंपनियों ने इस वेवर विंडो का तेजी से उपयोग करते हुए रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीद लिया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस दौरान करीब 30 मिलियन बैरल तेल का ऑर्डर दिया गया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 5 months ago

वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बड़ा बदलाव सामने आया है, जहां अमेरिका ने रूस और ईरान से सस्ते कच्चे तेल की खरीद पर दी जा रही छूट खत्म करने का फैसला किया है. इस फैसले से अंतरराष्ट्रीय सप्लाई और कीमतों पर असर पड़ने की आशंका है. हालांकि, भारत ने पहले ही रणनीतिक कदम उठाते हुए पर्याप्त तेल आयात कर अपने भंडार को मजबूत कर लिया है.

अमेरिका ने खत्म की सैंक्शन छूट

अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने रूस और ईरान से तेल खरीद पर दी गई अस्थायी छूट को आगे न बढ़ाने का निर्णय लिया है. अमेरिकी ट्रेजरी अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि मार्च की शुरुआत में दी गई ‘जनरल लाइसेंस’ सुविधा अब जारी नहीं रहेगी. इस कदम का सीधा असर वैश्विक तेल सप्लाई पर पड़ सकता है.

तनाव के बीच मिली थी अस्थायी राहत

फरवरी के अंत में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के पास हालात बिगड़ने की आशंका के चलते अमेरिका ने अस्थायी राहत दी थी. इसका मकसद वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखना था. इसी अवधि को ‘वेवर विंडो’ कहा गया, जिसका कई देशों ने फायदा उठाया.

भारत ने मौके का उठाया पूरा फायदा

भारतीय तेल कंपनियों ने इस वेवर विंडो का तेजी से उपयोग करते हुए रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीद लिया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस दौरान करीब 30 मिलियन बैरल तेल का ऑर्डर दिया गया, जिससे देश का स्टॉक काफी मजबूत हो गया.

मार्च में रूस से भारत का तेल आयात करीब 1.98 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया, जो जून 2023 के बाद सबसे ऊंचा स्तर था. हालांकि अप्रैल में यह आंकड़ा कुछ घटा, जिसकी वजह रिफाइनरी मेंटेनेंस रही.

7 साल बाद ईरान से तेल आयात

इस अवधि में भारत ने एक और अहम कदम उठाते हुए सात साल बाद ईरान से भी कच्चा तेल आयात किया. करीब 4 मिलियन बैरल तेल भारत लाया गया, जिसे पूर्वी और पश्चिमी तट के बंदरगाहों पर उतारा गया. इंडियन ऑयल, रिलायंस इंडस्ट्रीज और भारत पेट्रोलियम जैसी कंपनियों ने इस सप्लाई को अपने सिस्टम में सफलतापूर्वक शामिल किया.

भारत की ऊर्जा जरूरत और रणनीति

भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है और इसके लिए होर्मुज जलडमरूमध्य पर काफी निर्भर है. ऐसे में किसी भी वैश्विक संकट का सीधा असर देश पर पड़ सकता है. यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतों को संतुलित किया था. लेकिन अब अमेरिकी दबाव और नीतिगत बदलाव के चलते यह विकल्प सीमित हो सकता है.

कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय भारत

भारत ने इस छूट को बढ़ाने की मांग की थी, लेकिन अमेरिका ने इसे स्वीकार नहीं किया. इसके बावजूद कूटनीतिक बातचीत जारी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत कर वैश्विक ऊर्जा सप्लाई और होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर जोर दिया.

आगे की चुनौतियां और तैयारी

छूट खत्म होने के बाद भारत को महंगे तेल विकल्पों की ओर जाना पड़ सकता है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय रिफाइनरियां नई परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार हैं. सरकार और तेल कंपनियों ने मिलकर यह सुनिश्चित किया है कि वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद देश की ऊर्जा सप्लाई और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर न पड़े.
 


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