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भारत पर ₹5 लाख करोड़ का इंफ्रा बोझ: विकास के लिए अनुबंध समझौतों में तात्कालिक सुधार की आवश्यकता : रिपोर्ट

Primus Partners ने एक रिपोर्ट लॉन्च की है, जिसमें इंफ्रा प्रोजेक्ट में देरी और लागत में वृद्धि पर पुराने पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप रियायत समझौतों के महत्वपूर्ण प्रभाव पर प्रकाश डाला गया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र (Infrastructure Sector) एक महत्वपूर्ण चुनौती का सामना कर रहा है. देश भर के प्रमुख प्रोजेक्ट्स में से 40% से अधिक प्रोजेक्ट्स में देरी हो रही है, जिससे 5 लाख करोड़ रुपये की भारी लागत वृद्धि हो रही है. इन देरी का एक प्रमुख कारण पुरानी पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) अनुबंध समझौतों की असमर्थता है, जो आज के जटिल नियामक वातावरण और बदलती परियोजना आवश्यकताओं के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं. यह जानकारी Primus Partners की एक ताजा रिपोर्ट में सामने आई है. तो आइए इस रिपोर्ट पर एक नजर डालते हैं.

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2024 तक केंद्रीय सरकार के 1800 से अधिक प्रोजेक्ट्स में से लगभग 800 प्रोजेक्ट्स ₹150 करोड़ या उससे अधिक के मूल्य के हैं, जो निर्धारित समय सीमा से पीछे चल रहे हैं. ये आंकड़े इस बात को दर्शाते हैं कि अनुबंध समझौतों की समीक्षा और सुधार की तत्काल आवश्यकता है, क्योंकि वर्तमान समझौतों में नियामक चुनौतियों, लागत वृद्धि और जोखिमों का उचित विभाजन करने की क्षमता नहीं है.

क्यों आवश्यक है सुधार?
उद्योग के विशेषज्ञों और सभी संबंधित पक्षों का कहना है कि पब्लिक-प्राइवेट सहयोग की नींव अर्थात अनुबंध समझौतों को बदलने की आवश्यकता है. इन सुधारों के लिए प्रमुख क्षेत्र हैं:
• स्पष्ट नियामक दिशा-निर्देश: अनुबंधों में यह स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए कि नियामक अनुमोदन और पर्यावरणीय मंजूरियों के लिए जिम्मेदार कौन है। साथ ही, नियामक अड़चनों के कारण होने वाली देरी के लिए स्पष्ट समय-सीमा और उचित मुआवजे का प्रावधान होना चाहिए.
• लचीले वित्तीय मॉडल: राजस्व-साझाकरण ढांचे को बदलती बाजार स्थितियों के अनुसार अनुकूलित किया जाना चाहिए, जबकि परियोजनाओं की वित्तीय स्थिरता की सुरक्षा भी की जानी चाहिए.
• संतुलित जोखिम विभाजन: सार्वजनिक और निजी दोनों पक्षों के लिए एक पारदर्शी और उचित तंत्र होना चाहिए, जो अप्रत्याशित परिस्थितियों से उत्पन्न होने वाले जोखिमों को साझा करे.
• लचीलापन की गुंजाइश: आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को बदलती तकनीकी, पर्यावरणीय और बाजार स्थितियों के अनुसार अधिक अनुकूलनशीलता की आवश्यकता होती है, जिसके लिए अधिक गतिशील समझौतों की संरचना की आवश्यकता है.

अनुभव से सीखना
रिपोर्ट के अनुसार वास्तविक दुनिया के उदाहरण दिखाते हैं कि कैसे कठोर और पुराने समझौते परियोजनाओं को पटरी से उतार सकते हैंजबकि अधिक लचीले ढांचे उन्हें सही दिशा में लाने में मदद कर सकते हैं.
• नियामक जोखिमों को संबोधित करना: ग्रामीण विद्युतीकरण परियोजना मामले में यह सामने आया कि अनुबंधों में नियामक मंजूरी की कमी के कारण जोखिम बढ़ गए थे. यह उदाहरण इस बात को उजागर करता है कि हमें सामान्य प्रावधानों से आगे बढ़ते हुए, नियामक अनिश्चितताओं के लिए स्पष्ट तंत्र स्थापित करने की आवश्यकता है. यह विशेष रूप से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण है.
• परियोजना संरचना और व्यवहार्यता का प्रभाव: शहरी वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन परियोजना में कठोर अनुबंध शर्तों और बाहरी हस्तक्षेप के कारण समस्याएँ आईं, जो इस बात को स्पष्ट करती है कि परियोजना के सभी हितधारकों को प्रारंभिक चरण में शामिल करना और अनुबंधों में लचीलापन रखना आवश्यक है.

आगे का रास्ता: एक साथ काम करना
भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर संकट को हल करने के लिए सरकार, निजी क्षेत्र और वित्तीय संस्थानों के बीच मिलकर काम करना जरूरी है. पुराने अनुबंधों को अद्यतन करने के लिए खुले संवाद और इच्छा जरूरी है, ताकि बड़े पैमाने पर परियोजनाएं समय पर और प्रभावी तरीके से पूरी की जा सकें.

एक वरिष्ठ उद्योग विशेषज्ञ ने कहा "अगर भारत अपने महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर लक्ष्यों को हासिल करने के प्रति गंभीर है, तो हमें इन समझौतों की संरचना को फिर से सोचना होगा. परामर्शात्मक दृष्टिकोण और लचीले अनुबंध ढांचे को अपनाकर, हम देरी को कम कर सकते हैं, लागतों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित कर सकते हैं, और सभी पक्षों के लिए एक स्थिर वातावरण बना सकते हैं," भारत के महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं को आगे बढ़ाते हुए, इन सुधारों को अपनाना जरूरी है, यह न केवल भविष्य की देरी और लागत वृद्धि को रोकने के लिए, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक विकास की नींव रखने के लिए भी आवश्यक है.


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