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शेयर बाजार ने बनाए कई रिकॉर्ड, लेकिन हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में आ गई कमी, क्या है वजह?

देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी देखने को मिली है. इसके साथ ही भारत के गोल्ड रिज़र्व में भी पिछले सप्ताह गिरावट आई है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

हमारा शेयर बाजार (Stock Market) जहां नई-नई ऊंचाइयां छू रहा है, वहीं विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) में कमी देखने को मिली है. 28 जून को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 1.71 अरब डॉलर घटा है. यह अब 651.99 अरब डॉलर पर पहुंच गया है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बताया है कि पिछले सप्ताह भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आई है. इसके पहले हफ्ते में विदेशी मुद्रा भंडार 653.711 अरब डॉलर रहा था. 

गोल्ड रिज़र्व भी घटा
रिजर्व बैंक के मुताबिक, इस अवधि में मुद्रा भंडार का अहम हिस्सा मानी जाने वाली विदेशी मुद्रा आस्तियां (FCA) भी 1.25 अरब डॉलर घटकर 572.88 अरब डॉलर रहीं. इसी तरह, हमारे गोल्ड रिज़र्व में भी कमी देखने को मिली है. यह 42.7 करोड़ डॉलर घटकर 56.53 अरब डॉलर पहुंच गया है. जबकि विशेष आहरण अधिकार (एसडीआर) 3.5 करोड़ डॉलर कम होकर 18.01 अरब डॉलर रहा.

कमी के कई कारण
विदेशी मुद्रा भंडार में आई इस कमी के कई कारण हो सकते हैं. इनमें व्यापार घाटा, विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप और विदेशी निवेश में कमी भी शामिल है. हाल ही में रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास (Shaktikanta Das) ने कहा था कि आरबीआई अपने रिजर्व में बढ़ोतरी करता रहेगा जिससे भविष्य में किसी भी प्रकार की उठापटक या संकट के दौरान घरेलू हितों के लिए इसका इस्तेमाल किया जा सके. 

देश की हेल्थ का मीटर  
अब चलिए यह भी जान लेते हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार आखिर क्या होता है और इस भंडार का भरा रहना क्यों ज़रूरी है, विदेशी मुद्रा भंडार का पर्याप्त संख्या में होना हर देश के लिए महत्वपूर्ण है. इसे देश की हेल्थ का मीटर कहा जाए तो गलत नहीं होगा. इसमें विदेशी करेंसीज, गोल्ड रिजर्व, SDR, IMF के पास जमा राशि और ट्रेजरी बिल्स आदि आते हैं और इन्हें केंद्रीय बैंक या अन्य मौद्रिक संस्थाएं संभालती हैं. इन संस्थाओं का काम पेमेंट बैलेंस की निगरानी करना, मुद्रा की विदेशी विनिमय दर पर नज़र रखना और वित्तीय बाजार स्थिरता बनाए रखना है. विदेशी मुद्रा भंडार में दूसरे देशों के केंद्रीय बैंकों की ओर से जारी की जाने वाली मुद्राएं शामिल होती हैं. अधिकांश विदेशी मुद्रा भंडार में सबसे बड़ा भाग US डॉलर के रूप में होता है.

इसलिए है महत्वपूर्ण
किसी भी देश के लिए विदेशी मुद्रा भंडार काफी महत्वपूर्ण होता है और इसका इस्तेमाल देश की देनदारियों को पूरा करने के साथ ही कई कामों में किया जाता है. वैसे, दुनिया के अधिकतर देश अपना विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर में रखना पसंद करते हैं, क्योंकि अधिकांश व्यापार डॉलर में ही होता है. लेकिन इसमें सीमित संख्या में ब्रिटिश पाउंड, यूरो और जापानी येन भी हो सकते हैं. विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे पहला उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि रुपया तेजी से नीचे गिरता है या पूरी तरह से दिवालिया हो जाता है तो RBI के पास बैकअप फंड मौजूद हो. इसके साथ ही गिरते रुपए को संभालने के लिए आरबीआई भारतीय मुद्रा बाजार में डॉलर को बेच सकता है. यदि किसी देश का विदेशी मुद्रा भंडार अच्छी स्थिति में है, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि भी निखरती है, क्योंकि उस स्थिति में व्यापारिक देश अपने भुगतान के बारे में सुनिश्चित हो सकते हैं.

कमी से कई नुकसान 
विदेशी मुद्रा भंडार कम होने से कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है. इससे देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ता है. इससे देश के लिए आयात बिल का भुगतान करना मुश्किल हो जाता है. इस भंडार के भरे रहने से संकट के समय भी देश एक आरामदायक स्थिति का अनुभव कर सकता है. सरकार और आरबीआई किसी भी बाहरी या अंदरुनी वित्तीय संकट से निपटने में सक्षम हो जाते हैं. RBI देश के विदेशी मुद्रा भंडार के कस्टोडियन या मैनेजर के रूप में कार्य करता है. उसे कार्य सरकार से साथ मिलकर तैयार किए गए पॉलिसी फ्रेमवर्क के अनुसार करना होता है. रिजव बैंक रुपए की स्थिति को मजबूत रखने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करता है. एक रिपोर्ट के अनुसार, देश का 64% विदेशी मुद्रा भंडार विदेशों में ट्रेजरी बिल आदि के रूप में होता है और यह मुख्य रूप से अमेरिका में रखा होता है.
 


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