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आखिर चीन से कैसे खिलौनों के निर्माण में आगे निकल रहा है भारत ? 

सरकार के आत्‍मनिर्भर भारत का उदाहरण खिलौना इंडस्‍ट्री में देखा जा सकता है. इस उद्योग में आज देश इसके सबसे बड़े उत्‍पादक चीन से आगे निकल चुका है जिससे मैन्‍युफैक्‍चरिंग में भी बढ़ोतरी हुई है. 

ललित नारायण कांडपाल 2 years ago

किसी जमाने में दिल्‍ली का सदर बाजार जो चीन से आने वाले खिलौनों से पटा रहता था लेकिन आज तस्‍वीर बदल चुकी है. पिछले साल स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से भारत के बच्चों को सलाम करते हुए कहा था कि मैं 5 से 7 साल के छोटे बच्चों को सलाम करना चाहता हूं. उन्‍होंने कहा था कि देश की चेतना जागी है. मैंने अनगिनत परिवारों से सुना है कि 5-7 साल के बच्चे अपने माता-पिता से कहते हैं कि वे विदेशी खिलौनों से नहीं खेलना चाहते हैं.  

इस क्षेत्र में दिखी है आत्‍मनिर्भरता 
भारत में मौजूदा समय में स्मार्टफोन क्षेत्र के बाद, टॉय इंडस्‍ट्री ऐसी है जो सरकार की आत्‍मनिर्भर भारत की स्‍टोरी का शोपीस बन सकती है. इसके तहत आज हम अपने लिए और दुनिया के लिए खिलौने बना रहे हैं. इस इंडस्‍ट्री के लिए सबसे बेहतर ये रहा है कि सरकार ने इसे प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना में शामिल किया है जो इस उद्योग की लंबे समय से चली आ रही मांग में शामिल है.

भारत सरकार बाजी मार रहा है
प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के खिलाफ एक ऐसे क्षेत्र में धीमी गति से युद्ध छेड़ा जिसमें उसका हमारे देश में एकाधिकार का था. देश की हर दुकान में आने वाले खिलौने चीन से ही आया करते थे. चीन के सामान से भारत की हर दुकान पटी हुई थी. खिलौनों की दुकानें उन पहले क्षेत्रों में से एक थीं जहां सस्ते चीनी सामान ने लगभग एकाधिकार बनाया.

कैसे भारत ने मारी बाजी 
पीएम मोदी ने जल्दी ही महसूस कर लिया था कि सस्ते प्लास्टिक और कपड़े के खिलौनों का निर्माण भारत में उतना मुश्किल नहीं है, जितना कि इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए, जिसमें इनपुट, कच्चे माल, तकनीक और प्रशिक्षित श्रम की आवश्यकता होती है, और ये सब कम आपूर्ति में मौजूद था. इसलिए भारत सरकार ने खिलौना निर्माताओं को महत्त्वाकांक्षी बनने के लिए प्रेरित किया. (उन्होंने अपने मन की बात रेडियो प्रसारण में कई बार खिलौना उद्योग को बढ़ावा देने का प्रयास किया. एक दशक से भी कम समय में, मोदी के खिलौना प्रचारवाद ने परिणाम दिखाने शुरू कर दिए.

भारत ने बढ़त हासिल करना शुरू कर दिया है. चीनी आयात सिकुड़ रहा है और स्थानीय विनिर्माण बढ़ रहा है. सिर्फ पांच साल पहले, दिल्ली का सदर बाजार, एक बड़ा खिलौना केंद्र, एक वास्तविक चीनी बाजार था क्योंकि अधिकांश खिलौने चीन से आयात किए जाते थे. बेचे गए खिलौनों में से केवल 20% देश में बने थे. बाकी में चीन की 75% हिस्सेदारी थी. सदर बाजार से अब चाइनीज लेबल गायब हो रहे हैं. कुछ साल पहले तक भारत खिलौनों का शुद्ध आयातक था.

सरकार की भूमिका रही है अहम 
भारत ने अपने खिलौनों के व्यापार को कैसे बदल दिया? इसका सच तो यह है कि भारत का खिलौना बाजार के चीन या दूसरे देशों के मुकाबले नॉन कॉम्‍पिटिटिव बना हुआ है. खिलौना के निर्यात में हुई बढ़ोतरी काफी हद तक सरकार के मजबूत संरक्षणवादी उपायों के कारण हुई है. भारत का खिलौना उद्योग अभी भी अपने दम पर चीन के सामने टिक नहीं पा रहा है. साथ ही, भारत का निर्यात तब बढ़ा जब महामारी के दौरान चीन का विशाल उद्योग सुस्त पड़ रहा था. लेकिन जैसे-जैसे चीनी अर्थव्यवस्था महामारी की मंदी से बाहर निकल रही है, इसका निर्माण इंजन एक साल में वापस पटरी पर आने लगा. 

सरकार ने आयात पर बढ़ाई ड्यूटी 
सरकार की ओर से इस इंडस्‍ट्री को बढ़ावा देने के लिए टॉयकैथॉन 2021 में, क्राउड-सोर्स इनोवेटिव टॉयज और गेम्स आइडियाज की एक पहल का आयोजन किया गया. पीएम मोदी ने कहा था कि 100 बिलियन डॉलर के ग्लोबल टॉय मार्केट में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 1.5 बिलियन डॉलर थी, जबकि चीन की हिस्सेदारी 55-70% होने का अनुमान है. फरवरी 2020 में सरकार ने खिलौनों पर आयात शुल्क 20 फीसदी से बढ़ाकर 60 फीसदी कर दिया. अब यह बढ़कर 70 फीसदी हो गया है. उच्च शुल्क, जिसने यह सुनिश्चित किया है कि चीनी आयात बहुत कम व्यापारिक समझ में आता है, ने भारतीय उद्योग के विकास और पैमाने को प्राप्त करने के लिए एक जगह बनाई.
 


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