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कर्नाटक बैंक में गवर्नेंस संकट गहराया, वोटिंग पैटर्न ने खड़े किए गंभीर सवाल
मतदान में गड़बड़ियों और अदृश्य प्रभावों के बीच संकट से जूझता बैंक, मजबूरी में प्रतिभा की तलाश
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 months ago
पलक शाह
कर्नाटक बैंक में सबसे खुलासा करने वाला संकट न तो किसी बोर्डरूम में सामने आया और न ही किसी कॉर्नर ऑफिस में. यह चुपचाप शेयरधारकों के एक बैलेट के जरिए सामने आया. इसमें कॉरपोरेट गवर्नेंस पर मुखर रुख रखने वाले एक स्वतंत्र निदेशक दूसरे कार्यकाल के लिए जरूरी वोट हासिल करने में नाकाम रहे, जबकि चेयरमैन को लगभग सर्वसम्मति से समर्थन मिल गया. तब से यह नतीजा 101 साल पुराने मंगलुरु स्थित इस बैंक के भीतर हो रहे एक बड़े बदलाव का प्रतीक बन गया है कि बिना प्रमोटर वाले बैंक में असली ताकत किसके हाथ में है और उसका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है.
30 जून से 29 जुलाई के बीच हुए शेयरधारकों के पोस्टल बैलेट में दो स्वतंत्र निदेशकों को 18 अगस्त 2025 को उनके कार्यकाल की समाप्ति के बाद पुनर्नियुक्ति के लिए रखा गया था. चेयरमैन पी. प्रदीप कुमार पांजा को 19 अगस्त से शुरू होने वाले नए तीन साल के कार्यकाल के लिए 97 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले. वहीं जस्टिस ए. वी. चंद्रशेखर को केवल 74.08 प्रतिशत वोट समर्थन में मिले, जो कॉरपोरेट गवर्नेंस और सेबी लिस्टिंग नियमों के तहत दूसरे कार्यकाल के लिए जरूरी 75 प्रतिशत विशेष प्रस्ताव से कम थे. नतीजतन यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका.
आंकड़ों ने सतह के नीचे की एक और तीखी कहानी बयां की. पूर्व हाईकोर्ट जज और उन चुनिंदा निदेशकों में शामिल जस्टिस चंद्रशेखर, जो खुले तौर पर गवर्नेंस और बोर्ड स्तर के अनुपालन के मुद्दे उठाते रहे हैं, उन्हें अपनी सीट गंवानी पड़ी, जबकि प्रॉक्सी एडवाइजरी फर्म्स इनगवर्न, स्टेकहोल्डर्स एम्पावरमेंट सर्विसेज और IiAS ने सर्वसम्मति से उनके पक्ष में सिफारिश की थी. सार्वजनिक फाइलिंग से पता चलता है कि कई लाख शेयरों के विरोधी वोट, जिनका नेतृत्व एक प्रमुख घरेलू म्युचुअल फंड और बड़े व्यक्तिगत शेयरधारकों ने किया, 28 और 29 जुलाई को मतदान के अंतिम दिनों में एक साथ पड़े. यह म्युचुअल फंड अहमदाबाद के कारोबारी लॉबी के करीब माना जाता है और उसने पहले एक ऐसी कंपनी में बड़ा निवेश किया था, जो बाद में शॉर्ट सेलर रिपोर्ट का शिकार बनी.
बाजार के जानकारों का कहना है कि जिस बड़े संस्थागत निवेशक ने चेयरमैन को निर्णायक समर्थन दिया, उसने चंद्रशेखर को वैसा समर्थन नहीं दिया. बिना प्रमोटर वाले बैंक में, जहां कोई भी एक शेयरधारक स्वाभाविक संतुलनकारी भूमिका नहीं निभाता, यह अंतर बेहद स्पष्ट और शिक्षाप्रद रहा.
गवर्नेंस पर नजर रखने वालों को सिर्फ नतीजे ने नहीं, बल्कि उस संस्थागत निवेशक की भूमिका ने ज्यादा परेशान किया है, जिसका फिड्यूशियरी दायित्व सार्वजनिक शेयरधारकों के हितों की रक्षा करना है. प्रॉक्सी सलाह के बावजूद चेयरमैन का समर्थन करना और गवर्नेंस पर सवाल उठाने वाले निदेशक को समर्थन न देना, फंड की वोटिंग शक्ति के ऐसे इस्तेमाल को दर्शाता है, जो उसके स्टूवर्डशिप के मूल भाव के विपरीत प्रतीत होता है. वास्तव में ऐसी केंद्रित संस्थागत ताकत केवल प्रस्तावों को प्रभावित नहीं करती, बल्कि बोर्ड की संरचना को भी आकार देती है, यह तय करती है कि कौन सी आवाजें बनी रहेंगी और किन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा. फंड ने अब तक सार्वजनिक रूप से कोई स्टूवर्डशिप तर्क नहीं बताया है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि उसकी वोटिंग और प्रॉक्सी सलाह में इतना अंतर क्यों रहा.
एनएसडीएल के प्लेटफॉर्म के जरिए हुई ई-वोटिंग प्रक्रिया, जिसकी निगरानी स्क्रूटिनाइजर सीएस लेखा अशोक ने की, औपचारिक रूप से बिना किसी प्रक्रियात्मक खामी के पूरी हुई. इसके बावजूद विशेष प्रस्ताव के असफल होने से पैदा हुए गवर्नेंस परिणामों को अब तक संबोधित नहीं किया गया है. जस्टिस चंद्रशेखर की पुनर्नियुक्ति खारिज होने के बाद भी अगली असाधारण आम बैठक के नोटिस में किसी नए स्वतंत्र निदेशक की नियुक्ति या बोर्ड में बनी रिक्ति को भरने का कोई एजेंडा शामिल नहीं किया गया. इस चुप्पी ने यह सवाल और गहरा कर दिया है कि बैंक में गवर्नेंस से जुड़े नतीजों को कैसे संभाला जा रहा है या टाला जा रहा है.
यह अनसुलझा बोर्डरूम तनाव अब उस बैंक पर हावी है, जो पहले से ही नेतृत्व संकट से जूझ रहा है.
इससे कुछ हफ्ते पहले, जून 2025 के अंत में, एमडी और सीईओ श्रीकृष्णन हरि हर शर्मा और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर शेखर राव ने कार्यकाल के बीच में ही इस्तीफा दे दिया था. सूत्रों के मुताबिक, बोर्ड के साथ लंबे समय से चल रहे और बढ़ते गवर्नेंस विवाद इसके पीछे थे. हालांकि आधिकारिक तौर पर इस्तीफों का कारण मुंबई और बेंगलुरु स्थानांतरण जैसे व्यक्तिगत कारण बताए गए, लेकिन कई सूत्रों ने पुष्टि की कि ये इस्तीफे ऑडिटर की टिप्पणियों और ‘एम्फेसिस ऑफ मैटर’ ऑब्जर्वेशन के बाद हुए गंभीर गवर्नेंस मतभेदों का नतीजा थे, जिनके बाद रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के परामर्श से यह फैसला लिया गया.
विडंबना यह है कि उनके 18 महीने के कार्यकाल में कागजों पर शानदार प्रदर्शन दिखा. अग्रिम 27 प्रतिशत बढ़कर 77,959 करोड़ रुपये हो गए. जमा 20 प्रतिशत बढ़कर 1,04,807 करोड़ रुपये पहुंच गए. ग्रॉस एनपीए घटकर 3.08 प्रतिशत रह गए. बाजार पूंजीकरण दोगुना होकर 6,637 करोड़ रुपये हो गया. लेकिन अनधिकृत खर्चों को लेकर ऑडिटर की आपत्तियों ने इस बदलाव की कहानी को फीका कर दिया और कर्नाटक से जुड़ी संस्थागत परंपराओं तथा आक्रामक आधुनिकीकरण के बीच की गहरी दरार को उजागर कर दिया. राज्य में मौजूद लगभग 600 शाखाएं अब भी बैंक के करीब 70 प्रतिशत कारोबार का स्रोत हैं.
इस खालीपन को भरने के लिए बैंक अब अपने शीर्ष प्रबंधन को स्थिर करने की कोशिश कर रहा है. सूत्रों के अनुसार, कर्नाटक बैंक सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर एम. वी. राव यानी माटम वेंकट राव को शामिल करने की संभावना तलाश रहा है, जिनका वहां का कार्यकाल भी कथित तौर पर बोर्ड स्तर के गवर्नेंस मतभेदों से जुड़ा रहा है. अहम बात यह है कि राव को बोर्ड सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर के रूप में लाने पर विचार किया जा रहा है, जो इस संवेदनशील समय में बैंक के सतर्क रुख को दर्शाता है.
बोर्ड की सर्च कमेटी ने धीमी गति अपनाई है, जबकि अंतरिम सीओओ राघवेंद्र एस. भट्ट, जिनकी मैनेजिंग डायरेक्टर के रूप में नियुक्ति को बाद में आरबीआई ने मंजूरी दी, 2 जुलाई से जिम्मेदारी संभाले हुए हैं. जब भट्ट के अधीन राव की संभावित नियुक्ति को लेकर सवाल किया गया, तो प्रबंधन की ओर से बस इतना कहा गया कि प्रक्रिया जारी है और इस पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती. शीर्ष स्तर पर हुए इस्तीफों के बाद पहले ही 7 से 8 प्रतिशत गिर चुके शेयर इस अनिश्चितता को दर्शाते हैं, जो इस समुदाय से जुड़े पुराने निजी बैंक को घेरे हुए है.
बाजार में अब फुसफुसाहट है कि वही घरेलू म्युचुअल फंड हालिया घटनाक्रमों को आकार देने में असामान्य रूप से बड़ी भूमिका निभा रहा है. यह फंड पहले भी बिना प्रमोटर वाले बैंकों में बोर्डरूम लड़ाइयों में अपना प्रभाव दिखा चुका है और कर्नाटक बैंक में इसके अंतिम समय के वोटिंग पैटर्न पुराने मामलों से मिलते-जुलते हैं, जहां नतीजे आखिरी क्षणों में बदलते दिखे. यह फंड अहमदाबाद स्थित कारोबारी लॉबी के करीब माना जाता है और उसने पहले एक ऐसे कॉरपोरेट के क्यूआईपी में बड़ा निवेश किया था, जिसे बाद में नुकसानदेह शॉर्ट सेलर रिपोर्ट का सामना करना पड़ा.
जब कर्नाटक बैंक अपनी 101वीं वर्षगांठ के करीब पहुंच रहा है, जो कभी कन्नड़ गर्व और कर्नाटिक सौहार्द का प्रतीक था, उसकी कहानी अब आधुनिकीकरण की सफलता से हटकर संस्थागत नाजुकता की ओर मुड़ गई है. एक गवर्नेंस पर मुखर निदेशक का बाहर होना, उनके स्थान पर किसी का न आना, वरिष्ठ नियुक्तियों में सतर्कता, और प्रभावशाली शेयरधारकों का सुर तय करना, इन सबने बैंक को अदृश्य नियंत्रण लीवरों के सामने असहाय बना दिया है. नियामक सार्वजनिक रूप से खामोश हैं. इस प्रतिष्ठित बैंक के लिए असली परीक्षा अब यह है कि क्या अदृश्य हाथों की पकड़ और मजबूत होने से पहले उसकी साख को बहाल किया जा सकता है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के निडर लेखक हैं. मुंबई में लगभग दो दशकों की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव के साथ, पालक ने खुद को एक अडिग सच की खोज करने वाले पत्रकार के रूप में स्थापित किया है, जो पैसे, सत्ता और नियमन के गठजोड़ की तहों में गहराई तक जाते हैं. उनके लेख भारत के सबसे प्रतिष्ठित वित्तीय अखबारों जैसे The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line में प्रकाशित हुए हैं जहां उनकी तीखी रिपोर्टिंग ने नरेटिव गढ़े और कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स को हिला कर रख दिया.
19 साल की उम्र में ही अपराध पत्रकारिता की ओर खिंचाव महसूस करने वाले पालक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के मुंबई के गिरोह युद्ध अब एक और अधिक चिकने, लेकिन कहीं अधिक खतरनाक संगठित अपराध यानी कॉर्पोरेट टावरों में रची जाने वाली सफेदपोश साजिशों में बदल चुके हैं. यह अहसास ही उन्हें फाइनेंशियल जर्नलिज्म की ओर ले गया, जहां उन्होंने भारत की ‘सफेद धन’ अर्थव्यवस्था की जटिल चालों को वर्षों तक समझा और उजागर किया है. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामक खामियों तक, पलक का काम हाई-फाइनेंस की चमक-दमक से पर्दा हटाकर दिखाता है कि असली धागे खींच कौन रहा है.)
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