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भारत में शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर पर 2037 तक 80 लाख करोड़ रुपये निवेश की जरूरत: रिपोर्ट

रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2017-18 से अब तक केवल 17 भारतीय शहरों ने म्यूनिसिपल बॉन्ड जारी किए हैं और कुल 45.4 अरब रुपये जुटाए हैं. इससे यह संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में अभी काफी संभावनाएं मौजूद हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 5 months ago

भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और आर्थिक विकास को समर्थन देने के लिए वर्ष 2037 तक शहरी बुनियादी ढांचे में करीब 80 लाख करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता होगी. यह बात ब्रिकवर्क रेटिंग्स (Brickwork Ratings) की एक नई रिपोर्ट में कही गई है. रिपोर्ट के अनुसार, अगर शहरी वित्तपोषण के लिए नया बाजार आधारित मॉडल अपनाया जाता है, तो अगले पांच वर्षों में करीब 4 लाख करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित किया जा सकता है.

शहरी क्षेत्रों का GDP में बढ़ेगा योगदान

“फ्रॉम ग्रांट्स टू मार्केट्स. हाउ अर्बन चैलेंज फंड (UCF) विल रीशेप अर्बन फाइनेंस इन इंडिया” शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2036 तक भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में शहरी क्षेत्रों की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. ऐसे में टिकाऊ शहरी वित्तपोषण देश की प्राथमिकता बन जाएगा.

Urban Challenge Fund से बदलेगा फंडिंग मॉडल

ब्रिकवर्क रेटिंग्स के अनुसार, केंद्र सरकार समर्थित 1 लाख करोड़ रुपये का अर्बन चैलेंज फंड (UCF) शहरी विकास के पारंपरिक अनुदान आधारित मॉडल से हटकर बाजार से जुड़े वित्तपोषण की दिशा में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है.

इस ढांचे के तहत शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को किसी भी परियोजना के लिए केंद्र सरकार की सहायता पाने से पहले कम से कम 50 प्रतिशत फंडिंग बाजार स्रोतों से जुटानी होगी. इसमें म्यूनिसिपल बॉन्ड, बैंक लोन और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) जैसे विकल्प शामिल होंगे.

रिपोर्ट के मुताबिक, परियोजना लागत का 25 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार देगी, जबकि बाकी राशि राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों को जुटानी होगी.

म्यूनिसिपल बॉन्ड मार्केट को मिलेगा बढ़ावा

ब्रिकवर्क रेटिंग्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मनु सहगल ने कहा कि UCF भारत के म्यूनिसिपल फाइनेंस इकोसिस्टम को मजबूत कर सकता है और खासतौर पर म्यूनिसिपल बॉन्ड मार्केट में भागीदारी बढ़ाने में मदद करेगा.

रिपोर्ट के अनुसार, यह मॉडल अगले पांच वर्षों में लगभग 4 लाख करोड़ रुपये के शहरी निवेश को बढ़ावा दे सकता है. साथ ही इससे स्थानीय सरकारों में वित्तीय अनुशासन, पारदर्शिता और क्रेडिट योग्यता में सुधार होगा.

छोटे शहरों के सामने बनी रहेंगी चुनौतियां

हालांकि रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि छोटे शहरों में संस्थागत क्षमता की कमी के कारण इस योजना के क्रियान्वयन में चुनौतियां बनी रह सकती हैं. खासतौर पर टियर-2 और टियर-3 शहरों के लिए क्रेडिट रेटिंग की भूमिका बेहद अहम हो जाएगी, क्योंकि उन्हें लंबी अवधि के लिए पूंजी बाजार तक पहुंच बनानी होगी. रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल बैंक लोन पर निर्भर रहने से शहर राज्य सरकार की गारंटी पर निर्भर बने रहते हैं और फंडिंग के स्रोतों में विविधता नहीं आ पाती.

अब तक केवल 17 शहरों ने जारी किए म्यूनिसिपल बॉन्ड

रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2017-18 से अब तक केवल 17 भारतीय शहरों ने म्यूनिसिपल बॉन्ड जारी किए हैं और कुल 45.4 अरब रुपये जुटाए हैं. इससे यह संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में अभी काफी संभावनाएं मौजूद हैं.

ब्रिकवर्क रेटिंग्स ने कहा कि हाल के वर्षों में म्यूनिसिपल बॉन्ड में निवेशकों का भरोसा बढ़ा है. RBI की रेपो रेट के मुकाबले यील्ड स्प्रेड घटकर वित्त वर्ष 2026 में करीब 155 बेसिस पॉइंट रह गया है, जबकि वित्त वर्ष 2020 में यह लगभग 480 बेसिस पॉइंट था. इससे जोखिम को लेकर निवेशकों की चिंता में कमी आई है.

छोटे शहरों और पूर्वोत्तर राज्यों में अवसर

रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के 4,223 छोटे शहरी निकायों और पूर्वोत्तर राज्यों के शहरों में बाजार आधारित कर्ज की पहुंच बेहद सीमित है. ऐसे में यहां विकास की बड़ी संभावना मौजूद है. UCF के तहत 5,000 करोड़ रुपये की क्रेडिट रिपेमेंट गारंटी स्कीम निवेशकों का भरोसा बढ़ाने में मदद करेगी. इसके जरिए छोटे स्थानीय निकायों को पहली बार मिलने वाले कर्ज पर गारंटी दी जाएगी, जिससे निवेश योग्य शहरी संस्थाओं की संख्या बढ़ सकती है.

ब्रिकवर्क रेटिंग्स अब तक 105 शहरी स्थानीय निकायों की रेटिंग कर चुकी है, जिनमें सबसे अधिक झारखंड और उत्तर प्रदेश के निकाय शामिल हैं.

शासन व्यवस्था और सुधार सबसे बड़ी चुनौती

रिपोर्ट में कई संरचनात्मक चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया गया है. इनमें कमजोर प्रशासनिक क्षमता, सुधारों को लागू करने में देरी, संपत्ति कर और यूजर चार्ज सुधारों से जुड़ी राजनीतिक संवेदनशीलता तथा वित्तीय रिपोर्टिंग मानकों की कमियां शामिल हैं.

इसके अलावा, परियोजनाओं में देरी होने से केंद्र और राज्यों से मिलने वाली फंडिंग प्रभावित हो सकती है. खराब डेटा गुणवत्ता के कारण नगर निकायों की क्रेडिट रेटिंग प्रक्रिया भी जटिल हो सकती है.

रिपोर्ट के मुताबिक, UCF की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि शहर अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को कितना मजबूत बनाते हैं, ऑडिटेड वित्तीय खुलासों में कितना सुधार करते हैं और दीर्घकालिक कर्ज चुकाने के लिए टिकाऊ राजस्व स्रोत विकसित कर पाते हैं.


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