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विदेशी खर्च से गोल्ड निवेश तक, बदल रही भारतीय परिवारों की आर्थिक आदतें: रिपोर्ट

हाल ही में जारी कई रिपोर्ट्स के अनुसार, भू-राजनीतिक तनाव से तेल और सोने की कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे आयात दबाव बढ़ता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 months ago

भारत की अर्थव्यवस्था इस समय एक बड़े व्यवहारिक बदलाव के दौर से गुजर रही है. सरकार की नीतिगत अपील, सोने के बढ़ते आयात, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव और बैंकों के सतर्क रुख से संकेत मिल रहे हैं कि देश वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ती आयात निर्भरता के बीच आर्थिक संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है.

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्नेर मोदी ने लोगों से विदेशों में “डेस्टिनेशन वेडिंग” आयोजित करने से बचने और देश के भीतर ही शादी समारोह आयोजित करने की अपील की थी. गुजरात में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अमीर भारतीयों के बीच विदेशों में छुट्टियां मनाने और शादियां करने का चलन तेजी से बढ़ा है, जिससे विदेशी मुद्रा का बड़ा बहिर्गमन होता है. उन्होंने कहा कि देश के पर्यटन स्थलों को भी ऐसे आयोजनों के लिए चुना जा सकता है.

बढ़ते आयात दबाव के बीच सरकार की चिंता

रुबिक्स डेटा साइसेंज (Rubix Data Sciences) की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री की हालिया अपील, ईंधन की बचत, गैर-जरूरी विदेशी यात्रा कम करने, सोने की खरीद सीमित रखने और आयातित वस्तुओं पर निर्भरता घटाने को बाहरी आर्थिक दबावों के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है.

रिपोर्ट के अनुसार कच्चा तेल, सोना, खाद्य तेल और उर्वरकों जैसे जरूरी आयात FY26 में बढ़कर 240 अरब डॉलर से ज्यादा हो गए, जबकि FY25 में यह आंकड़ा 222 अरब डॉलर था. ये भारत के कुल आयात का लगभग 31 प्रतिशत हिस्सा हैं. कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने और भारत की 88 प्रतिशत तेल आयात निर्भरता के कारण आयात बिल लगातार बढ़ रहा है.

इसी दौरान भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 27 फरवरी के 728 अरब डॉलर से घटकर 1 मई तक 690.7 अरब डॉलर रह गया, यानी करीब दो महीनों में 5 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई.

सोने का आयात बना चिंता का कारण

रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल FY26 में ही भारत का गोल्ड इंपोर्ट लगभग 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो सालाना आधार पर 24 प्रतिशत ज्यादा है. इससे चालू खाते के घाटे (CAD) पर दबाव बढ़ा है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने 2026 में भारत का CAD लगभग 84.5 अरब डॉलर यानी GDP के करीब 2 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है.

SBI रिपोर्ट: कीमत बढ़ी, लेकिन खरीद मात्रा घटी

भारीतय स्टेट बैंक (State Bank of India) की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार सोने के आयात में मूल्य और मात्रा के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला है. FY25 में जहां गोल्ड इंपोर्ट का मूल्य 57.9 अरब डॉलर था, वहीं FY26 में यह बढ़कर 72.4 अरब डॉलर पहुंच गया. हालांकि आयात की मात्रा लगातार दूसरे साल करीब 5 प्रतिशत घटी है. इससे संकेत मिलता है कि आयात बिल बढ़ने की मुख्य वजह सोने की ऊंची कीमतें हैं, न कि खरीद की मात्रा.

एसबीआई ने यह भी कहा कि भारत में आयातित सोने का करीब 38 प्रतिशत हिस्सा ज्वेलरी के रूप में दोबारा निर्यात कर दिया जाता है, जिससे कुछ हद तक दबाव कम होता है.

गोल्ड ड्यूटी बढ़ाने के असर पर चेतावनी

हाल ही में सरकार ने सोने पर कस्टम ड्यूटी 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दी है. SBI ने चेतावनी दी है कि इतिहास बताता है कि ऐसी बढ़ोतरी से घरेलू और विदेशी बाजारों के दामों में अंतर बढ़ता है, जिससे तस्करी और ग्रे मार्केट इंपोर्ट को बढ़ावा मिल सकता है.

गहनों से निवेश की ओर बढ़ रहा झुकाव

केयरएज (CareEdge Ratings) की रिपोर्ट बताती है कि भारत में सोने की खपत का पैटर्न तेजी से बदल रहा है. पहले जहां कुल गोल्ड डिमांड में ज्वेलरी की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत रहती थी, वहीं CY25 में यह घटकर 60 प्रतिशत से नीचे आ गई.

दूसरी ओर ETF, गोल्ड बार और गोल्ड कॉइन जैसे निवेश माध्यमों की मांग बढ़ी है और निवेश श्रेणी की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई है.

रिपोर्ट के मुताबिक रिकॉर्ड कीमतों के बावजूद भारत में ज्वेलरी खरीद मूल्य के लिहाज से 10 प्रतिशत बढ़कर 4.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई, लेकिन खरीद की मात्रा में 15 प्रतिशत गिरावट दर्ज हुई. इससे साफ है कि लोग अब हल्के और कम कैरेट वाले आभूषणों की ओर बढ़ रहे हैं.

गोल्ड लोन और बैंकिंग सेक्टर में भी बदलाव

CareEdge ने कहा कि गोल्ड लोन सिक्योरिटाइजेशन में तेज उछाल आया है. H2FY26 में इसका आकार बढ़कर 18,500 करोड़ रुपये हो गया, जबकि FY25 में यह 5,000 करोड़ रुपये था. इससे संकेत मिलता है कि सोना अब केवल उपभोग की वस्तु नहीं रह गया, बल्कि वित्तीय संपत्ति और कर्ज के लिए गारंटी के रूप में भी इस्तेमाल बढ़ रहा है.

हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बैंकिंग सिस्टम फिलहाल मजबूत स्थिति में है. दिसंबर 2025 तक बैंकों का ग्रॉस NPA करीब 1.9 प्रतिशत और नेट NPA ऐतिहासिक निचले स्तर 0.41 प्रतिशत पर रहा.

RBI पर बढ़ा मुद्रा स्थिरता का दबाव

रिपोर्ट के अनुसार विदेशी पूंजी प्रवाह कमजोर रहने और वैश्विक तनाव बढ़ने से रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को स्पॉट और फॉरवर्ड मार्केट दोनों में सक्रिय हस्तक्षेप करना पड़ा है.

CareEdge का अनुमान है कि अगर कच्चा तेल औसतन 90 डॉलर प्रति बैरल पर बना रहता है तो FY27 में भारत का CAD बढ़कर GDP के 2.1 प्रतिशत तक पहुंच सकता है. हालांकि मजबूत सर्विस एक्सपोर्ट के कारण इसे फिलहाल नियंत्रण में माना जा रहा है.

बदल रहा है भारतीय परिवारों का आर्थिक व्यवहार

तीनों रिपोर्टों को मिलाकर देखें तो एक स्पष्ट तस्वीर सामने आती है, भू-राजनीतिक तनाव से तेल और सोने की कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे आयात दबाव बढ़ता है. सरकार लोगों की खर्च और निवेश आदतों को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है, जबकि उपभोक्ता गहनों की बजाय निवेश वाले सोने की ओर बढ़ रहे हैं.

इसके साथ ही बैंकिंग सिस्टम और RBI भी वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए सतर्क रुख अपना रहे हैं. यानी भारत में अब घरेलू खर्च, निवेश और सरकारी नीति के बीच गहरा संबंध बनता जा रहा है, जो सीधे देश के बाहरी आर्थिक संतुलन से जुड़ गया है.
 


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